विशेष / अंतरराष्ट्रीय पुरुष दिवस आज, भारत में इस दिन को एक महिला ने किया था प्रचलित

Zoom News : Nov 19, 2019, 10:43 AM

समाज और परिवार में पुरुषों को अक्सर बेसब्र, गुस्सैल और हिंसक दिखाया जाता है। फिल्में हों या किताबें, इतिहास में भी उनकी परिभाषा इसी तरह से लिखी गई है। इस सोच को बदलने के लिए वेस्टइंडीज के हिस्ट्री लेक्चरर डॉ. जीरोम तिलक सिंह ने 19 नवंबर 1999 को इंटरनेशनल मेन्स डे की शुरुआत की। भारत में इसकी शुरुआत 2007 में हुई, जिसका श्रेय हैदराबाद की लेखिका उमा चल्ला को जाता है। उमा के मुताबिक, जब हमारी संस्कृति में शिव और शक्ति दोनों बराबर हैं तो पुरुषों के लिए भी सेलिब्रेशन का इन दिन क्यों नहीं होना चाहिए। उमा से जानिए, इस इंटरनेशनल मेन्स डे की कहानी...

एक महिला शादी के बाद नौकरी अपने मनमुताबिक विकल्प के तौर पर चुनती है लेकिन पुरुष के साथ ऐसा नहीं होता। महिलाओं को हमेशा समस्या से जोड़कर निर्बल दिखाया जाता है, जबकि पुरुष और महिला दोनों की अपनी-अपनी खूबियां हैं। शिव से शक्ति को अलग नहीं किया जा सकता, इसलिए उन्हें अर्द्धनारीश्वर कहा जाता है। जब दोनों बराबर हैं, तो सेलिब्रेशन पुरुष के लिए भी होना चाहिए। इसी सोच के साथ मैंने अमेरिका में रहकर कैंपेन शुरू किया। भारत में आकर जमीनी स्तर पर इसकी शुरुआत करना मेरे लिए संभव नहीं था। इसलिए मैंने डिजिटल प्लेटफार्म पर आवाज उठाई और इस विषय पर लिखना जारी रखा।

2007 में भारत में पहली बार मना मेन्स डे

अभियान की शुरुआत में महिला अधिकारों के लिए पड़ने वाले लोगों के निगेटिव रिएक्शन मिले, लेकिन उनकी बातों को गंभीरता से नहीं लिया। उनका कहना था, यह समाज पुरुष प्रधान है, लेकिन मैं ऐसा नहीं मानती। दरअसल, उस दौर में मैंने देखा महिला और उनकी समस्याओं को ज्यादा उठाया जाता था और पुरुषों की गलत तस्वीर पेश की जा रही थी। समस्याएं दोनों ओर हैं लेकिन दिखाया सिर्फ महिलाओं के पक्ष में जा रहा था। महिला दिवस मनाना अच्छा है लेकिन सभी पुरुषों की गलत छवि दिखाना ठीक नहीं है। पुरुषों को महिलाओं पर हावी माना जाता है, यह सब उसकी जिम्मेदारियों का हिस्सा होता है, उसके त्याग का हिस्सा होता है। लिहाजा, मेरा अभियान जारी रहा। अंतत: 2007 में बेहद छोटे स्तर पर भारत में पहली बार इंटरनेशनल मेन्स डे मनाया गया। 

आपको बता दें कि 80 देशों में 19 नवंबर को अंतरराष्ट्रीय पुरुष दिवस मनाया जाता है और इसे युनेस्को का भी सहयोग प्राप्त है। इस बार अंतरराष्ट्रीय पुरुष दिवस की थीम है, "मेकिंग अ डिफरेंस फॉर मेन एंड बॉयज।"

कैसे मनाते हैं अंतरराष्ट्रीय पुरुष दिवस?

मेन्‍स डे पूरी तरह से पुरुषों का दिन है। विदेशों में तो इस दिन पुरुषों के लिए कई तरह के कार्यक्रमों का आयोजन किया जाता है। उन्‍हें पार्टी दी जाती है, घूमने के लिए भेजा जाता है। हालांकि, भारत की बात करें तो यहां अब धीरे-धीरे इस दिवस को मनाने का जोर पकड़ने लगा है। साथ ही सोशल मीडिया पर भी अंतरराष्ट्रीय पुरुष दिवस की धूम दिखती है। आप भी अपने परिवार के मेल सदस्यों और अपने मेल दोस्तों को अंतरराष्ट्रीय पुरुष दिवस की शुभकामनाएं और तोहफे देकर इस मौके को खास बना सकती हैं। आप भी उनको लंच या डिनर पर ले जाकर इस दिन को सेलिब्रेट कर सकती हैं। और इन सबसे ऊपर चाहे कोई भी दिन हो पुरुष और महिला दोनों को एक-दूसरे का सम्‍मान करना चाहिए।

अंतरराष्ट्रीय पुरुष दिवस का इतिहास

1923 में कई पुरुषों द्वारा 8 मार्च को मनाए जाने वाले अंतरराष्ट्रीय महिला दिवस की तर्ज पर अंतरराष्ट्रीय पुरुष दिवस मनाए जाने की मांग की गई थी। इसके चलते पुरुषों ने आंदोलन भी किया था। उस वक्त पुरुषों ने 23 फरवरी को अंतरराष्ट्रीय पुरुष दिवस मनाने की मांग की थी। इसके बाद 1968 में अमेरिकन जर्नलिस्ट जॉन पी. हैरिस ने एक आर्टिकल लिखते हुए कहा था कि सोवियत प्रणाली में संतुलन की कमी है। उन्होंने लिखा था कि सोवियत प्रणाली महिलाओं के लिए अंतरराष्ट्रीय दिवस मनाती है लेकिन पुरुषों के लिए वो किसी प्रकार का दिन नहीं मनाती। फिर 19 नवंबर 1999 में त्रिनिदाद और टोबैगो के लोगों द्वारा पहली बार अंतरराष्ट्रीय पुरुष दिवस मनाया गया। डॉ. जीरोम तिलकसिंह ने जीवन में पुरुषों के योगदान को एक नाम देने का बीड़ा उठाया था। उनके पिता के बर्थडे के दिन विश्व पुरुष दिवस मनाया जाता है। धीरे धीरे दुनियाभर में इसे 19 नवंबर को मनाया जाने लगा।