ईरान-अमेरिका सीजफायर: पाकिस्तान की भूमिका पर बड़ा खुलासा, व्हाइट हाउस के निर्देश पर काम

ईरान और अमेरिका के बीच प्रस्तावित सीजफायर में पाकिस्तान की भूमिका को लेकर तीन अंतरराष्ट्रीय मीडिया रिपोर्ट्स ने बड़े खुलासे किए हैं। रिपोर्ट्स के अनुसार, पाकिस्तान ने स्वतंत्र मध्यस्थ के बजाय अमेरिका के निर्देशों पर काम किया। इसमें प्रधानमंत्री शहबाज शरीफ के सोशल मीडिया पोस्ट को व्हाइट हाउस द्वारा ड्राफ्ट किए जाने जैसे तथ्य शामिल हैं।

ईरान और अमेरिका के बीच होने वाले संभावित युद्धविराम (सीजफायर) को लेकर अंतरराष्ट्रीय कूटनीति के गलियारों में एक बड़ी हलचल देखी जा रही है। तीन अलग-अलग मीडिया रिपोर्ट्स में यह दावा किया गया है कि इस पूरी प्रक्रिया में पाकिस्तान की भूमिका एक स्वतंत्र मध्यस्थ की नहीं, बल्कि पूरी तरह से संयुक्त राज्य अमेरिका के निर्देशों पर आधारित थी। इन खुलासों ने वैश्विक स्तर पर पाकिस्तान की कूटनीतिक स्वायत्तता पर सवाल खड़े कर दिए हैं। आधिकारिक सूत्रों और मीडिया रिपोर्ट्स के अनुसार, पाकिस्तान ने ईरान को सीजफायर का प्रस्ताव भेजने से लेकर सार्वजनिक बयानों तक, हर कदम पर व्हाइट हाउस के प्रोटोकॉल का पालन किया है।

फाइनेंशियल टाइम्स की रिपोर्ट और अमेरिकी रणनीति

फाइनेंशियल टाइम्स की एक विस्तृत रिपोर्ट के अनुसार, अमेरिका ने अंतिम समय में पाकिस्तान को ईरान के साथ बातचीत के लिए आगे किया। रिपोर्ट में दावा किया गया है कि अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप ने पहले 7 अप्रैल तक ईरान पर सैन्य कार्रवाई की चेतावनी दी थी, लेकिन व्हाइट हाउस के वरिष्ठ अधिकारी कूटनीतिक समाधान की तलाश में थे। अमेरिका ने स्वयं सीजफायर का प्रस्ताव तैयार किया और पाकिस्तान को इसे तेहरान तक पहुँचाने का निर्देश दिया और पाकिस्तान को इस भूमिका के लिए इसलिए चुना गया क्योंकि वह ईरान का पड़ोसी देश है और वर्तमान संघर्ष के दौरान ईरान ने पाकिस्तान पर कोई हमला नहीं किया था, जिससे वह एक विश्वसनीय संदेशवाहक बन सकता था।

न्यूयॉर्क टाइम्स का खुलासा: व्हाइट हाउस ने ड्राफ्ट किया पीएम का पोस्ट

न्यूयॉर्क टाइम्स की रिपोर्ट में एक और चौंकाने वाला दावा किया गया है। रिपोर्ट के मुताबिक, पाकिस्तान के प्रधानमंत्री शहबाज शरीफ ने सीजफायर को लेकर सोशल मीडिया पर जो पोस्ट साझा किया था, उसे वास्तव में व्हाइट हाउस ने तैयार और स्वीकृत किया था। इस दावे को तब और मजबूती मिली जब प्रधानमंत्री के आधिकारिक हैंडल से साझा किए गए संदेश के साथ 'ड्राफ्ट मैसेज ऑफ पाकिस्तान' जैसे शब्द भी गलती से पोस्ट हो गए। रिपोर्ट बताती है कि पाकिस्तान की हर गतिविधि और संचार की निगरानी सीधे वाशिंगटन से की जा रही थी। पाकिस्तान ने सीजफायर वार्ता के दौरान उन्हीं निर्देशों का पालन किया जो उसे अमेरिकी अधिकारियों से प्राप्त हुए थे।

चीन की भागीदारी और पाकिस्तान का संपर्क

जब ईरान प्रारंभिक तौर पर सीजफायर के प्रस्तावों पर सहमत नहीं हो रहा था, तब अमेरिका के कहने पर ही इस्लामाबाद ने बीजिंग से संपर्क साधा। अमेरिका में पाकिस्तान के राजदूत ने स्वीकार किया है कि इस पूरी प्रक्रिया में चीन की भूमिका अत्यंत महत्वपूर्ण रही है। चीन की मध्यस्थता और पाकिस्तान के माध्यम से आए अमेरिकी प्रस्ताव के बाद ही ईरान बातचीत की मेज पर आने के लिए तैयार हुआ। यह कूटनीतिक त्रिकोण—अमेरिका, पाकिस्तान और चीन—ईरान को युद्धविराम के लिए मनाने की रणनीति का हिस्सा था। पाकिस्तान ने यहाँ एक ऐसे पुल का काम किया जिसका नियंत्रण पूरी तरह से पश्चिमी शक्तियों के हाथ में था।

इस्लामाबाद में प्रस्तावित उच्च स्तरीय बैठक

शनिवार को पाकिस्तान की राजधानी इस्लामाबाद में ईरान और अमेरिका के बीच एक महत्वपूर्ण शांति बैठक प्रस्तावित है। इस बैठक में अमेरिका का प्रतिनिधित्व उप राष्ट्रपति जेडी वेंस करेंगे, जबकि ईरान की ओर से संसद के अध्यक्ष मोहम्मद बाघेर गालिबफ के शामिल होने की संभावना है। पाकिस्तान के इतिहास में यह पहली बार है जब इस्लामाबाद में इस स्तर की कोई अंतरराष्ट्रीय युद्धविराम बैठक आयोजित की जा रही है और विशेषज्ञों के अनुसार, अमेरिका के इस कदम के पीछे दो मुख्य उद्देश्य हैं: पहला, पाकिस्तान के माध्यम से ईरान पर दबाव बनाना और दूसरा, दक्षिण एशिया में पाकिस्तान की कूटनीतिक प्रासंगिकता को फिर से स्थापित करना।

ईरान की प्रतिक्रिया और कूटनीतिक तनाव

हालांकि ईरान ने आधिकारिक तौर पर पाकिस्तान की भूमिका पर कोई कड़ा बयान नहीं दिया है, लेकिन लेबनान में हालिया इजराइली हमलों के बाद तेहरान के रुख में तल्खी देखी गई है और ईरान के विदेश मंत्री अब्बास अराघची ने पाकिस्तान के प्रधानमंत्री के सोशल मीडिया पोस्ट को साझा करते हुए अमेरिका पर निशाना साधा। उन्होंने आरोप लगाया कि दुनिया देख रही है कि कैसे अमेरिका सीजफायर की शर्तों का उल्लंघन कर रहा है और ईरान का यह रुख संकेत देता है कि वह पाकिस्तान के माध्यम से आ रहे संदेशों को पूरी तरह से अमेरिकी एजेंडा मान रहा है। लेबनान पर हमलों को रोकने की बात जो पाकिस्तानी प्रस्ताव में शामिल थी, उस पर अमल न होना इस तनाव का मुख्य कारण बना हुआ है।