जैसलमेर में श्रद्धा के साथ मनाया गया बछ बारस पर्व, महिलाओं ने की संतान की लंबी आयु की कामना

जैसलमेर जिले में बछ बारस का पर्व पारंपरिक उत्साह के साथ मनाया गया, जहां महिलाओं ने गाय और बछड़े की पूजा कर अपनी संतान की लंबी उम्र और सुख-समृद्धि की प्रार्थना की।

राजस्थान के जैसलमेर जिले में आज बछ बारस का पर्व पूरी श्रद्धा और पारंपरिक उल्लास के साथ मनाया जा रहा है। सुबह के शुरुआती घंटों से ही जिले भर में पूजा-अर्चना का दौर शुरू हो गया, जो दिनभर जारी रहने वाला है। इस विशेष अवसर पर महिलाएं अपनी संतानों की लंबी आयु, उनके उज्ज्वल भविष्य और परिवार की सुख-समृद्धि की मंगलकामना कर रही हैं। जैसलमेर की गलियों में सुबह से ही उत्सव का माहौल देखा गया, जहां महिलाएं पारंपरिक वेशभूषा में सज-धजकर इस धार्मिक अनुष्ठान का हिस्सा बनीं। घरों में भी इस पर्व को लेकर विशेष तैयारियां की गईं और महिलाओं ने विधि-विधान के साथ पूजा संपन्न की।

गाय और बछड़े की पूजा का महत्व

बछ बारस का यह पर्व राजस्थान की लोक संस्कृति और धार्मिक मान्यताओं का एक अभिन्न हिस्सा है। बुजुर्गों और जानकारों के अनुसार, यह व्रत मुख्य रूप से माताएं अपने पुत्रों की कुशलता और लंबी उम्र के लिए रखती हैं और इस दिन विशेष रूप से ऐसी गाय की पूजा करने का विधान है, जिसका बछड़ा साथ हो। धार्मिक मान्यता है कि गाय और बछड़े की संयुक्त रूप से पूजा करने से घर में शांति का वास होता है और संतान के जीवन में आने वाली बाधाएं दूर होती हैं। महिलाओं ने गाय और बछड़े को स्नान कराकर उन्हें तिलक लगाया और रोली व अन्य पूजन सामग्री अर्पित कर उनका आशीर्वाद लिया। इसके बाद महिलाओं ने गाय और बछड़े की परिक्रमा की, जो इस पूजा का एक अनिवार्य हिस्सा माना जाता है।

खान-पान के कड़े नियम और परंपराएं

बछ बारस के पर्व की सबसे विशिष्ट बात इस दिन पालन किए जाने वाले खान-पान के कड़े नियम हैं। परंपरा के अनुसार, महिलाएं इस पूरे दिन गाय के दूध से बनी किसी भी वस्तु का सेवन नहीं करती हैं। इसके अलावा, इस दिन गेहूं और लोहे के औजारों से काटी गई वस्तुओं के उपयोग से भी पूरी तरह परहेज किया जाता है। महिलाएं इस दिन मुख्य रूप से बाजरे की रोटी और अन्य पारंपरिक व्यंजनों का सेवन करती हैं। व्रत के दौरान कई महिलाएं भैंस या बकरी के दूध का उपयोग करती हैं। साथ ही, अंकुरित अनाज से तैयार किए गए व्यंजन भी इस पर्व के भोजन का एक महत्वपूर्ण हिस्सा होते हैं। इन नियमों का पालन अत्यंत अनुशासन के साथ किया जाता है ताकि व्रत की पवित्रता बनी रहे।

सामुदायिक उत्साह और नई पीढ़ी को सीख

जैसलमेर शहर के विभिन्न मोहल्लों में सुबह 5 बजे से ही रौनक दिखाई देने लगी थी। महिलाएं समूहों में एकत्रित होकर पूजा स्थलों पर पहुंचीं, जिससे सामाजिक समरसता का दृश्य भी देखने को मिला। इस दौरान बुजुर्ग महिलाओं ने नई पीढ़ी की बहुओं और बेटियों को बछ बारस से जुड़ी कथाओं और परंपराओं की विस्तृत जानकारी दी। पर्व के दौरान समय का भी विशेष महत्व रखा जाता है। लोक मान्यताओं के अनुसार, शाम को चरागाह से गायों के वापस लौटने से पहले ही महिलाओं को अपना भोजन कर लेना चाहिए। यही कारण है कि महिलाएं दिनभर की व्यस्तता के बीच समय का विशेष ध्यान रखती हैं और सूर्यास्त से पहले अपनी भोजन संबंधी परंपराएं पूरी कर लेती हैं।