विदेश मंत्री जयशंकर की ईरानी समकक्ष से वार्ता, पश्चिम एशिया में शांति की अपील

विदेश मंत्री एस जयशंकर ने ईरानी विदेश मंत्री सैयद अब्बास अराघची से फोन पर बात कर पश्चिम एशिया के तनावपूर्ण हालात पर चर्चा की। भारत ने ईरान के सर्वोच्च नेता अयातुल्ला अली खामेनेई के निधन पर शोक व्यक्त किया है और क्षेत्र में कूटनीति तथा बातचीत के माध्यम से समाधान निकालने पर जोर दिया है।

पश्चिम एशिया में बढ़ते भू-राजनीतिक तनाव के बीच भारत के विदेश मंत्री एस जयशंकर ने गुरुवार को ईरानी विदेश मंत्री सैयद अब्बास अराघची के साथ टेलीफोन पर विस्तृत चर्चा की। आधिकारिक जानकारी के अनुसार, इस बातचीत का मुख्य केंद्र क्षेत्र में तेजी से बिगड़ते सुरक्षा हालात और संघर्ष को रोकने के कूटनीतिक प्रयास रहे। जयशंकर ने सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म एक्स पर इस संवाद की पुष्टि करते हुए बताया कि उन्होंने अपने ईरानी समकक्ष के साथ मौजूदा स्थिति पर विचारों का आदान-प्रदान किया है और इसके अतिरिक्त, भारतीय विदेश मंत्री ने ओमान के विदेश मंत्री सैय्यद बद्र बिन हमद बिन हमूद अलबुसैदी से भी संपर्क साधा, जो इस क्षेत्र में भारत की सक्रिय कूटनीतिक भागीदारी को दर्शाता है।

यह कूटनीतिक पहल ईरान के सर्वोच्च नेता अयातुल्ला अली खामेनेई के निधन के बाद उपजी परिस्थितियों के बीच हुई है। भारत सरकार ने इस घटना पर आधिकारिक रूप से शोक व्यक्त किया है। विदेश सचिव विक्रम मिस्री ने नई दिल्ली स्थित ईरानी दूतावास का दौरा किया और वहां रखी शोक पुस्तिका में भारत की ओर से संवेदनाएं दर्ज कीं। विदेश मंत्रालय द्वारा जारी तस्वीरों में विदेश सचिव को ईरानी राजदूत मोहम्मद फतहली के साथ चर्चा करते हुए देखा गया। आधिकारिक विवरण के अनुसार, खामेनेई का निधन 28 फरवरी को एक सैन्य कार्रवाई के दौरान हुआ था, जिसके बाद से पूरे क्षेत्र में अस्थिरता का माहौल बना हुआ है।

क्षेत्रीय स्थिरता के लिए कूटनीतिक प्रयासों का विस्तार

भारत ने पश्चिम एशिया में जारी संघर्ष को समाप्त करने के लिए निरंतर बातचीत और कूटनीति के मार्ग को अपनाने का आह्वान किया है और विदेश मंत्रालय के अधिकारियों के अनुसार, भारत का मानना है कि किसी भी विवाद का समाधान सैन्य बल के बजाय मेज पर बैठकर निकाला जाना चाहिए। विदेश मंत्री जयशंकर की ईरानी और ओमानी समकक्षों से बातचीत इसी रणनीति का हिस्सा है और भारत इस क्षेत्र में शांति बनाए रखने के लिए सभी प्रमुख हितधारकों के साथ संपर्क में है। आधिकारिक बयानों में स्पष्ट किया गया है कि हिंसा के विस्तार से न केवल क्षेत्रीय सुरक्षा बल्कि वैश्विक शांति को भी गंभीर खतरा पैदा हो सकता है। भारत ने इस बात पर जोर दिया है कि वर्तमान संकट को टालने के लिए अंतरराष्ट्रीय समुदाय को एकजुट होकर प्रयास करने चाहिए।

ऊर्जा सुरक्षा और तेल आपूर्ति पर मंडराता संकट

पश्चिम एशिया में तनाव बढ़ने से भारत की ऊर्जा सुरक्षा को लेकर चिंताएं गहरी हो गई हैं। भारत अपनी कच्चा तेल आवश्यकताओं का लगभग 85% आयात के माध्यम से पूरा करता है, जिसका एक बड़ा हिस्सा इसी क्षेत्र से आता है। अधिकारियों के अनुसार, होर्मुज जलडमरूमध्य (Strait of Hormuz) में किसी भी प्रकार की सैन्य गतिविधि या रुकावट वैश्विक तेल कीमतों में भारी उछाल ला सकती है। हालिया रिपोर्टों के अनुसार, कतरएनर्जी जैसी बड़ी कंपनियों द्वारा उत्पादन साइटों पर हमलों के बाद परिचालन रोकने से प्राकृतिक गैस की कीमतों पर भी दबाव देखा गया है। भारत सरकार स्थिति की बारीकी से निगरानी कर रही है क्योंकि ऊर्जा कीमतों में वृद्धि का सीधा असर घरेलू अर्थव्यवस्था और मुद्रास्फीति पर पड़ सकता है। आपूर्ति श्रृंखला में किसी भी व्यवधान को रोकने के लिए वैकल्पिक मार्गों और स्रोतों पर भी विचार किया जा रहा है।

भारतीय प्रवासियों की सुरक्षा और हितों का संरक्षण

पश्चिम एशिया में लगभग 1 करोड़ भारतीय नागरिक निवास करते हैं और कार्य करते हैं। भारत सरकार के लिए इन नागरिकों की सुरक्षा सर्वोच्च प्राथमिकता बनी हुई है। विदेश मंत्रालय के अनुसार, संघर्ष वाले क्षेत्रों में रहने वाले भारतीयों के हितों की रक्षा के लिए संबंधित देशों के दूतावासों को अलर्ट पर रखा गया है। जयशंकर की ईरानी विदेश मंत्री से बातचीत में भी भारतीय समुदाय की सुरक्षा का मुद्दा महत्वपूर्ण रहा है। भारत ने स्पष्ट किया है कि क्षेत्र में किसी भी बड़े युद्ध की स्थिति में बड़े पैमाने पर विस्थापन और सुरक्षा चुनौतियां पैदा हो सकती हैं, जो भारतीय अर्थव्यवस्था के लिए प्रेषण (Remittances) के प्रवाह को भी प्रभावित कर सकती हैं। सरकार ने नागरिकों को सुरक्षा प्रोटोकॉल का पालन करने और दूतावासों के संपर्क में रहने के निर्देश दिए हैं।

व्यापारिक मार्गों और समुद्री सुरक्षा की चुनौतियां

लाल सागर और अरब सागर के व्यापारिक मार्गों पर बढ़ते हमलों ने भारत की व्यापारिक चिंताएं बढ़ा दी हैं और भारत का एक महत्वपूर्ण निर्यात और आयात व्यापार इन्हीं समुद्री मार्गों से होकर गुजरता है। विदेश मंत्रालय के बयान के अनुसार, मर्चेंट शिपिंग पर होने वाले हमलों का भारत कड़ा विरोध करता है क्योंकि यह अंतरराष्ट्रीय व्यापार के सिद्धांतों के खिलाफ है। समुद्री सुरक्षा में किसी भी प्रकार की चूक से लॉजिस्टिक्स लागत में वृद्धि होती है और माल की डिलीवरी में देरी होती है। भारत ने अंतरराष्ट्रीय मंचों पर भी समुद्री डकैती और ड्रोन हमलों के खिलाफ आवाज उठाई है। अधिकारियों का कहना है कि यदि यह तनाव लंबे समय तक बना रहता है, तो भारतीय निर्यातकों को यूरोप और अमेरिका तक माल पहुंचाने के लिए लंबे और महंगे रास्तों का उपयोग करना पड़ सकता है, जिससे वैश्विक बाजार में भारतीय उत्पादों की प्रतिस्पर्धात्मकता प्रभावित हो सकती है।