राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ (RSS) के सरसंघचालक डॉ और n. कार्यक्रम के दौरान Gen Z और Gen Alpha के युवाओं के साथ एक महत्वपूर्ण संवाद किया। इस कार्यक्रम में देश के 100 से अधिक शहरों से आए 15 से 19 वर्ष की आयु वर्ग के लगभग 2000 हाई स्कूल विद्यार्थी शामिल हुए। इस संवाद के दौरान संघ प्रमुख ने युवा पीढ़ी के प्रति अपना गहरा विश्वास व्यक्त किया और उन्हें आज के समय की सबसे ईमानदार और तार्किक पीढ़ी बताया।
Gen Z पर अटूट विश्वास और संवाद की आवश्यकता
कार्यक्रम में जब उनसे पूछा गया कि क्या सरकार को कुछ मुद्दों पर पहले बात कर लेनी चाहिए थी, तो डॉ और भागवत ने स्पष्ट रूप से कहा कि Gen Z से बात कर लेनी चाहिए थी। उन्होंने कहा कि आंदोलन भी संवाद का ही एक तरीका है और यदि किसी की बात नहीं सुनी जा रही है, तो वह आंदोलन का रास्ता चुन सकता है। उन्होंने युवाओं का बचाव करते हुए कहा कि उन्हें एंटी-नेशनल कहना बिल्कुल गलत है। डॉ. भागवत ने Gen Z और Gen Alpha को सबसे ईमानदार पीढ़ी बताते हुए कहा कि वह उन पर आंख मूंद कर यकीन करते हैं। उन्होंने यह भी स्वीकार किया कि पिछले आंदोलनों के दौरान बातचीत में कमी रही है और चूंकि ये युवा हमारी अगली पीढ़ी हैं और हमारे अपने हैं, इसलिए उनकी बात सुनी जानी चाहिए।
तार्किक जवाब और शिक्षा व्यवस्था में सुधार
संघ प्रमुख ने कहा कि Gen Z का असंतोष वास्तविक है और भारत की शिक्षा व्यवस्था में सुधार की भारी जरूरत है। उन्होंने बताया कि आज की युवा पीढ़ी को हर बात का तार्किक जवाब चाहिए। वे उस पुराने दौर की तरह नहीं हैं जहां बड़े लोगों की हर बात को बिना सवाल किए मान लिया जाता था और उन्होंने कहा कि ऐसा बिल्कुल नहीं है कि Gen Z को आंदोलन नहीं करना चाहिए; बल्कि जब वे कुछ कहते हैं, तो हमें उन्हें सुनना चाहिए। उन्होंने इस बात पर जोर दिया कि युवाओं के साथ अपनापन और विश्वास का रिश्ता होना चाहिए, तभी वास्तविक संवाद संभव है।
संवैधानिक मूल्य और लोकतांत्रिक परंपराएं
डॉ. मोहन भागवत ने भारतीय 'शास्त्र' परंपरा का उल्लेख करते हुए कहा कि इसमें केवल वाद-प्रतिवाद नहीं, बल्कि पूर्वपक्ष और उत्तरपक्ष की परंपरा होती है। उन्होंने समझाया कि हर व्यक्ति का अपना दृष्टिकोण होता है और जब अलग-अलग, यहां तक कि विपरीत मत भी सामने आते हैं, तभी किसी विषय का समग्र दृष्टिकोण बनता है और उन्होंने युवाओं से संविधान का पालन करने का आग्रह किया और डॉ. बाबासाहेब आंबेडकर के भाषणों को पढ़ने की सलाह दी, जो लोकतांत्रिक तरीके से अपनी बात रखने का मार्ग प्रशस्त करते हैं। उन्होंने कहा कि यदि दिल्ली में लोग आवाज उठा रहे हैं, तो वे केवल विरोध के लिए नहीं, बल्कि किसी तकलीफ या चिंता के कारण ऐसा कर रहे हैं।
सोशल मीडिया की जिम्मेदारी और डीपफेक का खतरा
सोशल मीडिया के मुद्दे पर संघ प्रमुख ने कहा कि नियम और अनुशासन तभी सफल होते हैं जब लोगों के दृष्टिकोण और व्यवहार में बदलाव आता है और उन्होंने कहा कि कानून समाज की स्वीकृति के आधार पर ही प्रभावी होते हैं। रोल मॉडल्स की चर्चा करते हुए उन्होंने कहा कि जिन लोगों को लाखों लोग फॉलो करते हैं, उनकी जिम्मेदारी और भी बढ़ जाती है। उन्हें यह सोचना चाहिए कि उनके संदेश का समाज पर क्या प्रभाव पड़ेगा। इसके साथ ही उन्होंने डीपफेक जैसी उन्नत तकनीक के खतरों के प्रति भी आगाह किया, जहां किसी की आवाज या चेहरे का गलत इस्तेमाल किया जा सकता है। उन्होंने युवाओं को सलाह दी कि वे सोशल मीडिया की हर जानकारी पर तुरंत विश्वास न करें और उसे विश्वसनीय स्रोतों से सत्यापित करें।
समलैंगिक विवाह और सामाजिक दृष्टिकोण
LGBTQIA+ समुदाय पर बात करते हुए डॉ. भागवत ने कहा कि वे भी समाज का हिस्सा हैं और भारतीय परंपरा में उनके लिए हमेशा स्थान रहा है। हालांकि, उन्होंने स्पष्ट किया कि भारतीय परंपरा में विवाह केवल दो लोगों के साथ रहने की सुविधा नहीं, बल्कि परिवार की नींव है और परिवार समाज की वह मूल इकाई है जहां अगली पीढ़ी का निर्माण होता है। उन्होंने कहा कि किसी भी स्थापित व्यवस्था में बदलाव से पहले समाज को तैयार करना जरूरी है। उन्होंने समलैंगिक साथियों के साथ सम्मानजनक व्यवहार की वकालत की और उनके लिए अलग कानूनी व्यवस्था पर विचार करने की बात कही, लेकिन इस पर व्यापक सामाजिक चर्चा को आवश्यक बताया।
बेरोजगारी और श्रम की प्रतिष्ठा
बेरोजगारी की समस्या पर डॉ. भागवत ने मानसिकता बदलने का आह्वान किया। उन्होंने कहा कि रोजगार का मतलब केवल नौकरी नहीं है, बल्कि इसमें उद्यमिता और कौशल आधारित कार्य भी शामिल हैं। उन्होंने समाज में 'श्रम की प्रतिष्ठा' की कमी पर चिंता जताई और उन्होंने उदाहरण दिया कि यदि किसी के पास 4 लाख रुपये नकद हों और किसी किसान के पास 4 लाख रुपये का अनाज हो, तो समाज नकद वाले को अधिक सम्मान देता है, जबकि पेट किसान के अनाज से भरता है। उन्होंने कहा कि हर कोई सरकारी नौकरी के पीछे भागता है, जिससे कई क्षेत्रों में काम होने के बावजूद काम करने वाले नहीं मिलते। उन्होंने एक छात्र का उदाहरण दिया जिसने 8वीं के बाद पढ़ाई छोड़ी और होटल में काम करने के बाद अपना पान और पंडाल का व्यवसाय शुरू किया और आज उसके पास 19 लाख रुपये की संपत्ति है। उन्होंने निष्कर्ष निकाला कि यदि हम काम को ऊंच-नीच के आधार पर देखना बंद कर दें और ईमानदारी से श्रम करने वालों का सम्मान करें, तो बेरोजगारी की समस्या काफी हद तक कम हो सकती है।
