पाकिस्तान की अर्थव्यवस्था एक बार फिर गंभीर संकट के मुहाने पर खड़ी है। 5% तक का नकारात्मक प्रभाव पड़ सकता है। अधिकारियों और आर्थिक विशेषज्ञों के अनुसार, यदि यह संघर्ष छह महीने से अधिक समय तक जारी रहा, तो स्थिति और भी विकट हो सकती है और अनुमान है कि पाकिस्तान को अगले वित्त वर्ष में $12 अरब से $14 अरब तक का आर्थिक नुकसान उठाना पड़ सकता है। इस संकट का मुख्य कारण पेट्रोलियम आयात बिल में 25% से 30% की संभावित बढ़ोतरी और वैश्विक शिपिंग व बीमा प्रीमियम में होने वाली वृद्धि है।
जीडीपी और व्यापार संतुलन पर व्यापक प्रभाव
आर्थिक विशेषज्ञों के अनुसार, पाकिस्तान की अर्थव्यवस्था आयातित ईंधन पर अत्यधिक निर्भर है। हाफिज पाशा के आकलन के मुताबिक, कच्चे तेल की कीमतों में उछाल सीधे तौर पर व्यापार घाटे को बढ़ाएगा। यदि वैश्विक स्तर पर आपूर्ति श्रृंखला बाधित होती है, तो पाकिस्तान का आयात बिल अनियंत्रित हो सकता है। $12 अरब से $14 अरब का संभावित नुकसान देश के पहले से ही कमजोर विदेशी मुद्रा भंडार पर भारी दबाव डालेगा। शिपिंग लागत में वृद्धि और रसद संबंधी बाधाएं निर्यात को भी प्रभावित कर सकती हैं, जिससे व्यापार संतुलन और बिगड़ जाएगा। सरकारी आंकड़ों के अनुसार, पेट्रोलियम उत्पादों के आयात में होने वाली 25-30% की वृद्धि चालू खाता घाटे को खतरनाक स्तर तक ले जा सकती है।
रेमिटेंस में कमी और विदेशी मुद्रा का संकट
पाकिस्तान को मिलने वाले कुल रेमिटेंस (प्रवासी भारतीयों द्वारा भेजा गया धन) का लगभग 55% हिस्सा मध्यपूर्व के देशों से आता है। डॉन (Dawn) की एक रिपोर्ट के अनुसार, तेल पर निर्भर खाड़ी देशों की अर्थव्यवस्थाओं में यदि मंदी आती है, तो वहां विदेशी श्रमिकों की मांग में भारी गिरावट आ सकती है। विशेषज्ञों का मानना है कि ऐसी स्थिति में पाकिस्तान और बांग्लादेश के श्रमिकों पर सबसे पहले गाज गिर सकती है और इससे पाकिस्तान को मिलने वाले रेमिटेंस में $2 अरब से $4 अरब तक की कमी आने की आशंका है। रेमिटेंस में इस गिरावट के कारण चालू खाता घाटा, जो वर्तमान में $2 अरब के आसपास है, बढ़कर $6 अरब से $7 अरब तक पहुंच सकता है। यह स्थिति वित्त वर्ष 2026-27 में और अधिक गंभीर होने का अनुमान है।
महंगाई दर और ऊर्जा लागत में संभावित वृद्धि
तेल की कीमतों में होने वाली वृद्धि पाकिस्तान में महंगाई को फिर से दोहरे अंकों में धकेल सकती है। यदि अंतरराष्ट्रीय बाजार में तेल $120 प्रति बैरल के स्तर को छूता है, तो पाकिस्तान 2021-22 के उस दौर में लौट सकता है जब महंगाई दर लगभग 30% तक पहुंच गई थी। ईंधन की कीमतों में बढ़ोतरी का सीधा असर परिवहन लागत पर पड़ता है, जिससे खाद्य सामग्री और अन्य आवश्यक वस्तुओं की कीमतें बढ़ जाती हैं। ऊर्जा की ऊंची कीमतें औद्योगिक उत्पादन की लागत को भी बढ़ाएंगी, जिससे आम जनता की क्रय शक्ति में कमी आएगी और विशेषज्ञों के अनुसार, परिवहन क्षेत्र में ईंधन की मांग घटने से आर्थिक गतिविधियों में सुस्ती आने की संभावना है।
औद्योगिक उत्पादन और कृषि क्षेत्र की चुनौतियां
बढ़ती ऊर्जा कीमतें और आपूर्ति में बाधाएं पाकिस्तान के प्रमुख औद्योगिक क्षेत्रों को प्रभावित कर रही हैं। एलएनजी (LNG) आयात में संभावित रुकावटों के कारण खाद, निर्माण और कपड़ा उद्योग (टेक्सटाइल) पर संकट मंडरा रहा है। कपड़ा उद्योग, जो पाकिस्तान के निर्यात का मुख्य आधार है, उत्पादन लागत बढ़ने से अंतरराष्ट्रीय बाजार में प्रतिस्पर्धा खो सकता है और वहीं, कृषि क्षेत्र में खाद की कमी के कारण अगली फसल के चक्र में उत्पादकता कम होने की आशंका जताई गई है। परिवहन क्षेत्र में ईंधन की ऊंची कीमतों के कारण माल ढुलाई महंगी हो जाएगी, जिसका असर पूरे आपूर्ति तंत्र पर पड़ेगा।
ऊर्जा सुरक्षा और अंतरराष्ट्रीय वित्तीय संस्थानों की भूमिका
पाकिस्तान की आर्थिक स्थिरता वर्तमान में अंतरराष्ट्रीय मुद्रा कोष (IMF) के कार्यक्रमों पर टिकी हुई है। पूर्व योजनाकार कैसर बंगाली के अनुसार, आईएमएफ का समर्थन देश की अर्थव्यवस्था के लिए अनिवार्य है, भले ही वह छोटे योगदान के रूप में हो। 5 अरब तक बढ़ा देती है। यदि कीमतें $20 बढ़ती हैं, तो $3 अरब की अतिरिक्त विदेशी मुद्रा की आवश्यकता होगी। पूर्व स्टेट बैंक गवर्नर इशरत हुसैन ने सुझाव दिया है कि घरेलू ईंधन की कीमतों को वैश्विक बाजार के अनुसार दैनिक आधार पर समायोजित किया जाना चाहिए और कतर से आरएलएनजी (RLNG) आपूर्ति में बाधा आने पर पाकिस्तान को घरेलू गैस, कोयला, जलविद्युत, परमाणु और सौर ऊर्जा जैसे विकल्पों पर निर्भरता बढ़ानी होगी।
