अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप ने रविवार को घोषणा की कि वह होर्मुज जलडमरूमध्य (Strait of Hormuz) को फिर से खुलवाने और सुरक्षित करने के लिए सात देशों के साथ चर्चा कर रहे हैं। ईरान द्वारा इस महत्वपूर्ण समुद्री मार्ग पर लगाए गए प्रतिबंध के बाद वैश्विक स्तर पर तेल और गैस की कीमतों में भारी वृद्धि देखी गई है। ट्रंप ने अंतरराष्ट्रीय समुदाय से इस संकट के समाधान के लिए सैन्य हस्तक्षेप की अपील की है। राष्ट्रपति के अनुसार, अमेरिका ने दशकों तक इस क्षेत्र की सुरक्षा की जिम्मेदारी निभाई है, लेकिन अब अन्य देशों को अपनी ऊर्जा सुरक्षा के लिए आगे आना चाहिए।
अंतरराष्ट्रीय सहयोग की अपील और नाटो पर चेतावनी
राष्ट्रपति ट्रंप ने चीन, फ्रांस, जापान, दक्षिण कोरिया, ब्रिटेन और अन्य प्रमुख अर्थव्यवस्थाओं से होर्मुज जलडमरूमध्य में अपने युद्धपोत भेजने का आग्रह किया है। उन्होंने स्पष्ट किया कि इस मार्ग को खुला रखना केवल अमेरिका की जिम्मेदारी नहीं है। इसी संदर्भ में उन्होंने उत्तर अटलांटिक संधि संगठन (NATO) के सदस्य देशों को भी कड़ा संदेश दिया। ट्रंप ने कहा कि यदि नाटो देश सुरक्षा संबंधी जिम्मेदारियों और अमेरिकी चिंताओं को अनदेखा करना जारी रखते हैं, तो संगठन का भविष्य खतरे में पड़ सकता है और उन्होंने इस मिशन की तुलना यूक्रेन और नाटो को दी जाने वाली अमेरिकी सहायता से की और इसे वैश्विक स्थिरता के लिए आवश्यक बताया।
ऊर्जा निर्भरता और सुरक्षा का आर्थिक पक्ष
ट्रंप ने आंकड़ों का हवाला देते हुए कहा कि अमेरिका अपनी तेल जरूरतों का केवल 1% हिस्सा इस क्षेत्र से प्राप्त करता है, जबकि चीन जैसे देशों की लगभग 90% तेल आपूर्ति इसी मार्ग पर निर्भर है। उन्होंने तर्क दिया कि जिन देशों को इस जलमार्ग से सबसे अधिक लाभ होता है, उन्हें इसकी सुरक्षा का खर्च और सैन्य जोखिम भी उठाना चाहिए और राष्ट्रपति के अनुसार, अमेरिका अब उन युद्धों और सुरक्षा अभियानों का बोझ अकेले नहीं उठाएगा जिनसे अन्य देशों को सीधा आर्थिक लाभ मिलता है। उन्होंने कहा कि ईरान की सैन्य शक्ति अब काफी कम हो गई है, जिससे अन्य देशों के लिए हस्तक्षेप करना आसान हो गया है।
सहयोगी देशों की प्रतिक्रिया और क्षेत्रीय रुख
ट्रंप के दावों के बावजूद, कई सहयोगी देशों ने इस सैन्य अभियान में शामिल होने के प्रति हिचकिचाहट दिखाई है। ऑस्ट्रेलिया ने स्पष्ट कर दिया है कि वह ट्रंप के अनुरोध के बावजूद होर्मुज जलडमरूमध्य में अपना नौसेना जहाज नहीं भेजेगा। वहीं, सऊदी अरब, संयुक्त अरब अमीरात (UAE) और कतर जैसे खाड़ी देशों ने भी ईरान के खिलाफ किसी भी प्रत्यक्ष सैन्य कार्रवाई में शामिल होने के बजाय रक्षात्मक नीति अपनाने का विकल्प चुना है। ट्रंप ने यह भी बताया कि ब्रिटेन के प्रधानमंत्री के साथ उनकी बातचीत में शुरुआती हिचकिचाहट देखी गई थी, हालांकि बाद में ब्रिटेन ने जहाज भेजने की पेशकश की।
ईरान की सैन्य क्षमता पर अमेरिकी दावे
राष्ट्रपति ट्रंप ने दावा किया कि अमेरिकी कार्रवाइयों के कारण ईरान की नौसेना और वायु सेना काफी कमजोर हो गई है। उनके अनुसार, ईरान के पास अब बहुत कम संख्या में मिसाइलें और ड्रोन बचे हैं। ट्रंप ने कहा कि अमेरिकी सेना ने उन ठिकानों को निशाना बनाया है जहां ईरान अपने ड्रोन और हथियारों का निर्माण करता है। उन्होंने विश्वास व्यक्त किया कि अमेरिकी सेना दुनिया की सबसे शक्तिशाली सेना है और वह इस क्षेत्र में सुरक्षा बहाल करने में सक्षम है। ट्रंप ने यह भी उल्लेख किया कि ईरान की नई हथियार बनाने की क्षमता को प्रभावी ढंग से बाधित कर दिया गया है।
रणनीतिक हमले और भविष्य की वार्ता की स्थिति
अमेरिकी राष्ट्रपति ने जानकारी दी कि उनकी सेना ने ईरान के महत्वपूर्ण ठिकानों पर हमले किए हैं, जिनमें खर्ग द्वीप (Kharg Island) भी शामिल है। खर्ग द्वीप ईरान का सबसे बड़ा तेल डिपो माना जाता है और इसकी रणनीतिक महत्ता अत्यधिक है। ट्रंप ने कहा कि इन हमलों का उद्देश्य ईरान की आर्थिक और सैन्य रीढ़ को कमजोर करना था। वार्ता के संबंध में उन्होंने कहा कि ईरान पहले बातचीत के लिए उत्सुक था, लेकिन वर्तमान परिस्थितियों में उन्हें नहीं लगता कि वे अभी तैयार हैं। हालांकि, उन्होंने संभावना जताई कि भविष्य में ईरान को समझौते की मेज पर आना पड़ेगा।
