भारतीय रिजर्व बैंक (RBI) की मौद्रिक नीति समिति (MPC) की आज होने वाली बैठक पर पूरे देश की नजरें टिकी हुई हैं। इस बैठक में ब्याज दरों को लेकर लिए जाने वाले फैसले का सीधा असर आम आदमी की ईएमआई और देश की आर्थिक दिशा पर पड़ेगा। कमजोर होते रुपये, बढ़ती महंगाई और सुस्त पड़ती आर्थिक वृद्धि के बीच विशेषज्ञों में इस बात को लेकर मतभेद हैं कि क्या ब्याज दरों में बढ़ोतरी की जाएगी या उन्हें स्थिर रखा जाएगा और भारतीय रिजर्व बैंक को इस समय महंगाई को नियंत्रित करने और विकास की गति को बनाए रखने के बीच एक कठिन संतुलन साधना होगा।
ब्याज दरों पर फैसले की घड़ी
भारतीय रिजर्व बैंक (RBI) की मौद्रिक नीति समिति आज ब्याज दरों पर अपना फैसला सुनाएगी। हाल के वर्षों में यह बैठक सबसे महत्वपूर्ण बैठकों में से एक मानी जा रही है, क्योंकि भारतीय अर्थव्यवस्था कई मोर्चों पर चुनौतियों का सामना कर रही है और rBI गवर्नर संजय महरोत्रा के सामने सबसे बड़ी चुनौती यह है कि वे महंगाई को काबू में रखें और साथ ही यह भी सुनिश्चित करें कि आर्थिक विकास की रफ्तार धीमी न पड़े। अर्थशास्त्रियों के बीच इस समय सबसे बड़ा सवाल यही है कि क्या RBI ब्याज दरों में बढ़ोतरी का सिलसिला शुरू करेगा।
रुपये की गिरावट और महंगाई का दबाव
बढ़ती महंगाई, कमजोर होता रुपया और ईंधन की कीमतों में हालिया बढ़ोतरी ने ब्याज दरों पर बहस को और तेज कर दिया है और कुछ विशेषज्ञों का मानना है कि RBI आज पहली बार रेपो रेट बढ़ाने का फैसला कर सकता है। आंकड़ों पर नजर डालें तो वर्ष 2026 में रुपया अमेरिकी डॉलर के मुकाबले 6 दशमलव 4 प्रतिशत तक कमजोर हुआ है। इस गिरावट के कारण रुपया एशिया की सबसे कमजोर प्रदर्शन करने वाली मुद्राओं की सूची में शामिल हो गया है। इसके साथ ही, ईंधन की कीमतों में हो रही बढ़ोतरी महंगाई पर लगातार दबाव बना रही है। ऐसे में कुछ अर्थशास्त्रियों का तर्क है कि रुपये को संभालने और विदेशी मुद्रा बाजार को समर्थन देने के लिए ब्याज दरें बढ़ाना आवश्यक हो सकता है। हालांकि, कई विशेषज्ञ यह भी मानते हैं कि केवल मुद्रा को संभालने के लिए दरें बढ़ाना सही रणनीति नहीं होगी, क्योंकि इसका आर्थिक विकास पर नकारात्मक असर पड़ सकता है।
आर्थिक विकास दर पर मंडराते खतरे
देश की आर्थिक गतिविधियों पर भी कई तरह के खतरे मंडरा रहे हैं। पश्चिम एशिया में जारी तनाव और अल नीनो की आशंका के कारण आने वाले समय में आर्थिक गतिविधियों पर दबाव बढ़ सकता है। वित्त मंत्रालय की मई 2026 की आर्थिक समीक्षा रिपोर्ट में भी उपभोग मांग में नरमी आने की चेतावनी दी गई है। रिपोर्ट के अनुसार, सामान्य से कमजोर मानसून और आर्थिक गतिविधियों में संभावित सुस्ती आने वाले महीनों में मांग को प्रभावित कर सकती है। रेटिंग एजेंसी क्रिसिल और यस बैंक ने वित्त वर्ष 2026-27 के लिए भारत की आर्थिक वृद्धि दर 6 दशमलव 6 प्रतिशत रहने का अनुमान लगाया है, जो पिछले वर्ष की 7 दशमलव 6 प्रतिशत की वृद्धि दर से काफी कम है।
महंगाई और विशेषज्ञों का अनुमान
विशेषज्ञों का एक वर्ग यह भी मानता है कि महंगाई फिलहाल RBI द्वारा निर्धारित दायरे से बाहर नहीं गई है। एचडीएफसी बैंक की अर्थशास्त्री साक्षी गुप्ता के अनुसार, जून और अगस्त की नीति बैठकों में RBI ब्याज दरों को स्थिर रख सकता है, क्योंकि पश्चिम एशिया संकट का वास्तविक प्रभाव अभी पूरी तरह से स्पष्ट नहीं हुआ है। हालांकि, यदि अक्टूबर तक महंगाई का दबाव लगातार बना रहता है, तो RBI ब्याज दरों में बढ़ोतरी पर गंभीरता से विचार कर सकता है। फिलहाल एचडीएफसी बैंक ने वित्त वर्ष 2026-27 के लिए 6 दशमलव 7 प्रतिशत की विकास दर और 5 दशमलव 1 प्रतिशत की महंगाई दर का अनुमान जताया है।
घरेलू महंगाई उम्मीदों का विश्लेषण
RBI की नजर 5 जून को जारी होने वाले घरेलू महंगाई उम्मीद सर्वे पर भी टिकी रहेगी। हालिया आंकड़ों के अनुसार, आम लोगों की मौजूदा महंगाई धारणा बढ़कर 7 दशमलव 2 प्रतिशत हो गई है। वहीं, अगले तीन महीने के लिए महंगाई की उम्मीद 8 दशमलव 5 प्रतिशत और एक साल के लिए 8 दशमलव 8 प्रतिशत तक पहुंच गई है। विशेषज्ञों का कहना है कि यदि लोगों की महंगाई संबंधी अपेक्षाएं इसी तरह बढ़ती रहीं, तो RBI के लिए ब्याज दरों में बढ़ोतरी का फैसला लेना आसान हो सकता है। फिलहाल पूरे बाजार की नजर शुक्रवार को आने वाले MPC के फैसले पर टिकी है, जो अर्थव्यवस्था की भविष्य की दिशा तय करेगा।
