भारतीय रिजर्व बैंक (RBI) की मौद्रिक नीति समिति (MPC) की तीन दिवसीय बैठक के नतीजे बुधवार, 8 अप्रैल को घोषित किए जाएंगे। वित्त वर्ष 2026-27 की यह पहली नीतिगत समीक्षा बैठक ऐसे समय में हो रही है जब वैश्विक स्तर पर, विशेष रूप से पश्चिम एशिया में भू-राजनीतिक तनाव बना हुआ है। गवर्नर शक्तिकांत दास की अध्यक्षता वाली छह सदस्यीय समिति इस बैठक में रेपो रेट को लेकर अपना रुख स्पष्ट करेगी। बाजार विशेषज्ञों और अर्थशास्त्रियों के अनुसार, केंद्रीय बैंक का प्राथमिक उद्देश्य खुदरा महंगाई को 4% के लक्ष्य के भीतर रखना और आर्थिक विकास की गति को बनाए रखना है।
महंगाई दर के अनुमानों में बदलाव की संभावना
आरबीआई इस नीतिगत समीक्षा में वित्त वर्ष 2026-27 के लिए उपभोक्ता मूल्य सूचकांक (CPI) आधारित महंगाई का अपना नया अनुमान जारी करेगा। 7% के बीच रह सकती है। 7% से अधिक थी। खाद्य पदार्थों और कीमती धातुओं की कीमतों में हुई वृद्धि ने इस आंकड़े को प्रभावित किया है। पश्चिम एशिया में जारी संघर्ष के कारण आपूर्ति श्रृंखला में आने वाली बाधाओं को देखते हुए आरबीआई अपने तिमाही अनुमानों में संशोधन कर सकता है। 2% महंगाई का अनुमान लगाया था।
जीडीपी विकास दर और आर्थिक परिदृश्य
वित्त वर्ष 2026-27 के लिए सकल घरेलू उत्पाद (GDP) विकास दर पर आरबीआई का रुख बाजार के लिए अत्यंत महत्वपूर्ण होगा। वैश्विक अनिश्चितताओं और कच्चे तेल की ऊंची कीमतों के बीच, विकास दर के अनुमानों में नरमी देखी जा सकती है। 6% के अनुमान से कम है। 9% और 7% की वास्तविक जीडीपी वृद्धि का अनुमान व्यक्त किया था। नीतिगत बयान में इस बात पर स्पष्टता मिलने की उम्मीद है कि क्या घरेलू मांग और विनिर्माण क्षेत्र में मजबूती इन वैश्विक चुनौतियों का सामना करने में सक्षम होगी।
कच्चे तेल की कीमतों का दबाव
भारत अपनी ऊर्जा आवश्यकताओं का लगभग 80% हिस्सा आयात के माध्यम से पूरा करता है, इसलिए कच्चे तेल की कीमतों में उतार-चढ़ाव सीधे तौर पर घरेलू अर्थव्यवस्था को प्रभावित करता है। पश्चिम एशिया में तनाव शुरू होने के बाद ब्रेंट क्रूड की कीमतें 100 डॉलर प्रति बैरल के स्तर को पार कर गई हैं। इससे पहले अर्थशास्त्रियों ने तेल की कीमतें 65 डॉलर प्रति बैरल के आसपास रहने का अनुमान लगाया था, जिसे अब संशोधित कर 85 डॉलर से 90 डॉलर प्रति बैरल कर दिया गया है। वर्तमान में कीमतें अनुमानित स्तर से काफी ऊपर बनी हुई हैं। आरबीआई की टिप्पणी इस बात पर केंद्रित हो सकती है कि तेल की ये ऊंची कीमतें राजकोषीय घाटे और मुद्रास्फीति के प्रबंधन को किस प्रकार प्रभावित करेंगी।
रुपये की स्थिरता और विदेशी मुद्रा प्रबंधन
विदेशी मुद्रा बाजार में रुपये की स्थिति हाल के दिनों में चर्चा का विषय रही है। 23 के अपने अब तक के सबसे निचले स्तर पर पहुंच गया था। हालांकि, आरबीआई द्वारा ऑफशोर नॉन-डिलीवरेबल फॉरवर्ड्स (NDF) बाजारों में सट्टेबाजी को रोकने के लिए उठाए गए कदमों के बाद इसमें सुधार देखा गया और यह ₹93 के स्तर पर वापस आया। विशेषज्ञों के अनुसार, यदि कच्चे तेल की कीमतें 100 डॉलर प्रति बैरल के ऊपर बनी रहती हैं, तो रुपये पर दबाव फिर से बढ़ सकता है। केंद्रीय बैंक की मौद्रिक नीति में मुद्रा प्रबंधन और विनिमय दर को स्थिर रखने के लिए भविष्य की रणनीति का उल्लेख किया जा सकता है।
बैंकिंग सिस्टम में लिक्विडिटी प्रबंधन
बैंकिंग प्रणाली में तरलता (Liquidity) की स्थिति पर भी बाजार की नजर रहेगी और फिच रेटिंग्स की रिपोर्ट के अनुसार, एडवांस टैक्स भुगतान और जीएसटी आउटफ्लो के कारण बैंकिंग सिस्टम में लिक्विडिटी सरप्लस घटकर ₹16,785 करोड़ रह गया है, जो जनवरी के बाद का सबसे निचला स्तर है। 4 लाख करोड़ सिस्टम में डाले थे। इसके अतिरिक्त, आरबीआई ने बैंकों को निर्देश दिया है कि वे प्रत्येक कारोबारी दिन के अंत में अपनी नेट ओपन पोजीशन (NOP) को 100 मिलियन डॉलर या उससे कम रखें। इस निर्देश का पालन करने के लिए बैंकों के पास 10 अप्रैल तक का समय है, जिससे बाजार में डॉलर की तरलता बढ़ने और रुपये को स्थिरता मिलने की उम्मीद है।
