सामाजिक और जलवायु कार्यकर्ता सोनम वांगचुक की भूख हड़ताल आज शुक्रवार को अपने 20वें दिन में प्रवेश कर चुकी है। इतने दिनों से अन्न का त्याग करने के कारण उनकी सेहत अब बेहद गंभीर और नाजुक दौर में पहुंच गई है और डॉक्टरों और विशेषज्ञों ने चेतावनी दी है कि लंबे समय तक भूखे रहने की वजह से अब उनके शरीर के आंतरिक अंगों पर बुरा असर पड़ना शुरू हो सकता है। इस भूख हड़ताल के दौरान उनके वजन में 9 किलोग्राम से अधिक की भारी गिरावट दर्ज की गई है, लेकिन इसके बावजूद वह अपना अनशन खत्म करने को तैयार नहीं हैं।
दिल्ली हाई कोर्ट की चिंता और निर्देश
सोनम वांगचुक की गिरती सेहत को लेकर दिल्ली हाई कोर्ट ने बीते गुरुवार को गहरी चिंता व्यक्त की। अदालत ने स्पष्ट रूप से कहा कि हर नागरिक का जीवन अत्यंत मूल्यवान होता है और उसे बचाने के लिए सरकार को हर संभव प्रयास करने चाहिए और हाई कोर्ट ने केंद्र सरकार को कड़े निर्देश दिए हैं कि सरकारी डॉक्टरों की एक टीम रोजाना उनके स्वास्थ्य की जांच करे और उनकी क्लीनिकल मॉनिटरिंग लगातार जारी रखी जाए। कोर्ट ने कहा कि सेहत पर नजर बनाए रखना सरकार की जिम्मेदारी है क्योंकि जीवन अनमोल है।
वांगचुक का अडिग फैसला और संसद मार्च
अपनी बिगड़ती हालत के बीच वांगचुक ने बुधवार देर रात एक वीडियो संदेश जारी किया। इस संदेश में उन्होंने राजनीतिक दलों के नेताओं और अपने समर्थकों की अपीलों को दरकिनार करते हुए भूख हड़ताल जारी रखने का ऐलान किया। उनका तर्क है कि सरकार की ओर से किसी ठोस जवाब या बातचीत के बिना हड़ताल खत्म करना जनता के बीच गलत संदेश भेजेगा। इसके साथ ही उन्होंने लोगों से 20 जुलाई को कॉकरोच जनता पार्टी द्वारा प्रस्तावित संसद मार्च में बढ़-चढ़कर हिस्सा लेने की अपील की है।
क्या सरकार अपनाएगी इरोम शर्मिला वाला तरीका?
सोनम वांगचुक की जिद और विपक्ष के बढ़ते समर्थन के बीच सरकार के सामने उनकी जान बचाने की बड़ी चुनौती है। ऐसे में यह सवाल उठ रहा है कि क्या सरकार उन्हें जीवित रखने के लिए वही रास्ता अपनाएगी जो मणिपुर की आयरन लेडी इरोम शर्मिला के मामले में अपनाया गया था। इरोम शर्मिला ने आफस्पा (AFSPA) कानून के खिलाफ लगातार 16 साल तक भूख हड़ताल की थी।
इरोम शर्मिला का ऐतिहासिक संघर्ष और आफस्पा
इरोम शर्मिला ने नवंबर 2000 में मणिपुर से सशस्त्र बल विशेषाधिकार अधिनियम (AFSPA) को हटाने की मांग को लेकर अपना आंदोलन शुरू किया था। यह कानून सुरक्षा बलों को उग्रवाद से निपटने के लिए असाधारण शक्तियां देता है। इस आंदोलन की शुरुआत 2 नवंबर 2000 को मालोम में हुई एक घटना के बाद हुई थी, जहां असम राइफल्स के जवानों की गोलीबारी में बस स्टॉप पर खड़े 10 आम नागरिक मारे गए थे। इस हत्याकांड के विरोध में शर्मिला 5 नवंबर को भूख हड़ताल पर बैठ गई थीं।
नाक के जरिए भोजन और 16 साल का अनशन
जब शर्मिला ने खाना खाने से मना कर दिया, तो पुलिस ने इसे आत्महत्या की कोशिश मानकर उन्हें न्यायिक हिरासत में ले लिया। उनकी जान बचाने के लिए 21 नवंबर 2000 को, यानी आंदोलन के 17वें दिन, उन्हें नाक के जरिए नली डालकर जबरन तरल भोजन (Nasogastric Intubation) देना शुरू किया गया। अगले 16 सालों तक वह अस्पताल के एक कमरे में रहीं, जहां हथियारबंद गार्ड और डॉक्टरों की टीम तैनात रहती थी। उन्हें दिन में 3 बार तक नाक में पाइप डालकर पोषक तत्व और दवाइयां दी जाती थीं। करीब 3 फीट लंबी इस ट्यूब के जरिए उन्हें जिंदा रखा गया। अंततः अगस्त 2016 में उन्होंने अपनी हथेली पर शहद चखकर दुनिया की सबसे लंबी भूख हड़ताल को समाप्त किया था। उन्होंने आखिरी बार अपनी मर्जी से 4 नवंबर 2000 को खाना खाया था।
