UPI पेमेंट पर लगेगा चार्ज? 2000 रुपये से ऊपर के भुगतान पर मर्चेंट फीस की तैयारी

केंद्र सरकार बड़े कॉरपोरेट और व्यावसायिक प्रतिष्ठानों के लिए 2000 रुपये से अधिक के यूपीआई भुगतान पर मर्चेंट डिस्काउंट रेट (MDR) लगाने पर विचार कर रही है। यह शुल्क 0 रुपये 50 पैसे प्रतिशत से कम हो सकता है और इसका उद्देश्य डिजिटल भुगतान इकोसिस्टम को आर्थिक रूप से टिकाऊ बनाना है।

भारत में डिजिटल क्रांति की रीढ़ बन चुके यूपीआई (UPI) को लेकर एक बड़ी खबर सामने आ रही है। हालिया रिपोर्टों के अनुसार, केंद्र सरकार बड़े कॉरपोरेट और व्यावसायिक प्रतिष्ठानों के लिए 2000 रुपये से अधिक के यूपीआई पेमेंट्स पर मर्चेंट फीस यानी मर्चेंट डिस्काउंट रेट (MDR) लगाने के विकल्प पर गंभीरता से विचार कर रही है। अगर यह प्रस्ताव मंजूर होता है, तो यह देश के डिजिटल पेमेंट इकोसिस्टम में अब तक का सबसे बड़ा नीतिगत बदलाव साबित हो सकता है। सरकार का मुख्य उद्देश्य इस डिजिटल ढांचे को व्यावसायिक रूप से टिकाऊ बनाना है ताकि भविष्य की बढ़ती जरूरतों को कुशलतापूर्वक पूरा किया जा सके।

एमडीआर लागू करने के प्रस्ताव का विवरण

मनीकंट्रोल की एक रिपोर्ट के अनुसार, सरकार बड़े मर्चेंट्स को किए जाने वाले यूपीआई पेमेंट पर मर्चेंट डिस्काउंट रेट लागू करने की योजना बना रही है। यह प्रस्तावित फीस 0 रुपये 50 पैसे प्रतिशत से कम हो सकती है और इसे केवल 2000 रुपये से ज्यादा के ट्रांजैक्शन पर लागू करने की तैयारी है। एमडीआर वह शुल्क है जो बैंक रियल-टाइम डिजिटल ट्रांजैक्शन को प्रोसेस करने के बदले में लेते हैं। सरकार के एक वरिष्ठ अधिकारी ने मीडिया रिपोर्ट में पुष्टि की है कि इस प्रस्ताव पर गहन विचार-विमर्श चल रहा है और अगले दो हफ्ते के भीतर इस पर अंतिम फैसला होने की उम्मीद है। यह स्पष्ट किया गया है कि यह शुल्क केवल बड़े व्यापारियों और व्यवसायों पर ही लगाया जाएगा, जिससे आम जनता पर सीधा बोझ न पड़े।

इकोसिस्टम की स्थिरता पर जोर

सरकार के एक दूसरे अधिकारी ने साफ किया कि इस प्रस्ताव में ग्राहकों से यूपीआई इस्तेमाल करने के लिए पैसे लेने की कोई बात शामिल नहीं है। अधिकारी ने कहा कि एमडीआर का मकसद यूपीआई ट्रांजैक्शन के लिए ग्राहकों से पैसे लेना नहीं है, बल्कि मर्चेंट-साइड इकोनॉमिक्स और पेमेंट इकोसिस्टम की सस्टेनेबिलिटी यानी टिकाऊपन सुनिश्चित करना है। अधिकारियों के अनुसार, यूपीआई का विस्तार बहुत तेजी से हुआ है, लेकिन इसके लिए जरूरी इंफ्रास्ट्रक्चर को बनाए रखने में बैंकों और पेमेंट इकोसिस्टम से जुड़े अन्य भागीदारों की लागत भी लगातार बढ़ रही है। सरकार का मानना है कि इस मॉडल को समय के साथ व्यावसायिक रूप से टिकाऊ होना चाहिए ताकि सुरक्षा और तकनीक में निवेश जारी रह सके।

वर्तमान प्रोत्साहन योजना और सरकारी प्रयास

केंद्र सरकार अभी 2000 रुपये तक के कम वैल्यू वाले यूपीआई ट्रांजैक्शन के लिए बैंकों और दूसरे पेमेंट सिस्टम ऑपरेटरों को इंसेंटिव देती है। डिजिटल पेमेंट प्लेटफॉर्म को अलग-अलग वर्गों के बीच लोकप्रिय बनाने, वित्तीय लेनदेन को आधुनिक बनाने और वित्तीय समावेशन को बढ़ावा देने के लिए वित्त वर्ष 2022 में RuPay डेबिट कार्ड और कम वैल्यू वाले BHIM-UPI ट्रांजैक्शन को बढ़ावा देने के लिए इंसेंटिव स्कीम शुरू की गई थी। इस योजना का उद्देश्य यह सुनिश्चित करना था कि डिजिटल ट्रांजैक्शन की पहुंच देश के कोने-कोने तक हो और छोटे व्यापारियों को डिजिटल अर्थव्यवस्था से जोड़ा जा सके।

स्टैंडिंग कमिटी की रिपोर्ट और भविष्य की चुनौतियां

फाइनेंस पर बनी स्टैंडिंग कमिटी की 12 मार्च 2026 की एक रिपोर्ट में कहा गया है कि डिजिटल ट्रांजैक्शन को सस्ता और ज्यादा लोगों तक पहुंचाने के लिए जीरो एमडीआर लागू किया गया था। हालांकि, रिपोर्ट में चेतावनी दी गई थी कि एमडीआर न होने से यूपीआई इकोसिस्टम आर्थिक रूप से टिकाऊ नहीं रह गया है और कमिटी ने कहा कि भारत की जनसांख्यिकी, आर्थिक विकास और भौगोलिक पहुंच के कारण आने वाले सालों में यूपीआई का विस्तार दस गुना तक हो सकता है। अनुमान है कि यह प्लेटफॉर्म अगले पांच से सात सालों में 600 मिलियन और नए यूजर्स जोड़ सकता है और हर महीने 100 से 150 बिलियन ट्रांजैक्शन प्रोसेस कर सकता है। रिपोर्ट में यह भी उल्लेख किया गया है कि यूपीआई की विकास गति और स्ट्रक्चरल फंडिंग गैप के कारण इस स्तर तक पहुंचना चुनौतीपूर्ण हो रहा है, जिससे इंफ्रास्ट्रक्चर, सुरक्षा और मर्चेंट ऑनबोर्डिंग में निवेश सीमित हो जाता है।