दिल्ली विरोध प्रदर्शन: सुप्रीम कोर्ट ने सरकार को अवमानना का कारण बताओ नोटिस जारी किया

सुप्रीम कोर्ट ने दिल्ली विरोध प्रदर्शनों के दौरान अदालती आदेशों की अवहेलना पर सरकार को कारण बताओ नोटिस जारी किया है। कोर्ट ने बैरिकेड्स हटाने, इंटरनेट बहाल करने और मेट्रो स्टेशनों को खुला रखने का निर्देश देते हुए 13 अक्टूबर तक जवाब मांगा है।

सुप्रीम कोर्ट ने दिल्ली में चल रहे विरोध प्रदर्शनों और उससे जुड़ी व्यवस्थाओं को लेकर कड़ा रुख अपनाते हुए सरकार को अदालत की अवमानना मामले में कारण बताओ नोटिस जारी किया है। सुनवाई के दौरान अदालत ने पिछले आदेशों के उल्लंघन पर गहरी नाराजगी जताई और सरकार से इस पूरे मामले पर मंगलवार 13 अक्टूबर तक जवाब तलब किया है। दिल्ली प्रोटेस्ट से जुड़ी सभी याचिकाओं को एक साथ जोड़कर सुप्रीम कोर्ट में इस मामले की विस्तृत सुनवाई की जा रही है।

अदालती आदेश की अवहेलना और चेतावनी

सुनवाई के दौरान सुप्रीम कोर्ट ने संबंधित अधिकारियों को 9 अक्टूबर को दिए गए अपने पुराने आदेश की याद दिलाई। इस आदेश में स्पष्ट रूप से कहा गया था कि मेट्रो ट्रेनों को अचानक बंद न किया जाए और आम जनता की आवाजाही में किसी भी प्रकार की बाधा उत्पन्न न की जाए। बेंच ने सवाल किया कि आदेशों की खुलेआम अवहेलना करने के लिए संबंधित अधिकारियों के खिलाफ अवमानना का मामला क्यों नहीं चलाया जाना चाहिए। अदालत ने कहा कि जिस तरह से निर्देशों की अनदेखी की गई है, उसे देखते हुए सरकार से जवाब मांगना अनिवार्य हो गया है।

इंटरनेट और मेट्रो सेवाओं पर विशेष निर्देश

नागरिकों के मौलिक अधिकारों की रक्षा करते हुए सुप्रीम कोर्ट ने केंद्र सरकार को संविधान के अनुच्छेद 19(2) के तहत मेट्रो का नियमित संचालन सुनिश्चित करने का आदेश दिया है। इसके साथ ही कोर्ट ने निर्देश दिया कि दिल्ली के विभिन्न हिस्सों से बैरिकेड्स हटाए जाएं ताकि लोगों को आने-जाने में असुविधा न हो। अदालत ने इंटरनेट सेवाओं को भी तुरंत बहाल करने का निर्देश दिया है। धारा 163 लागू करने की सूचना सार्वजनिक न किए जाने के मुद्दे पर जस्टिस बागची ने टिप्पणी की कि ऐसी सूचनाएं व्यक्तिगत तौर पर नहीं दी जातीं, लेकिन प्रशासन को नियमों का पालन करना चाहिए।

दिग्गज वकीलों की दलीलें और कोर्ट की टिप्पणी

इस महत्वपूर्ण सुनवाई में देश के कई बड़े कानूनी विशेषज्ञों ने हिस्सा लिया। जस्टिस बागची ने बताया कि उन्होंने सॉलिसिटर जनरल तुषार मेहता का पक्ष सुना है और पूर्व अटॉर्नी जनरल केके वेणुगोपाल भी एक याचिकाकर्ता की ओर से ऑनलाइन माध्यम से जुड़े। वरिष्ठ वकील कपिल सिब्बल ने इस मामले की विशेष सुनवाई के लिए सुप्रीम कोर्ट का आभार व्यक्त किया, जिस पर जस्टिस बागची ने बेहद शालीनता से उत्तर दिया कि अदालत हमेशा देश की सेवा के लिए तत्पर है। कोर्ट ने यह भी स्पष्ट किया कि इस मामले से जुड़ी नई याचिकाओं पर सोमवार को सुनवाई की जाएगी।

पुलिस कार्रवाई और हिंसा के गंभीर आरोप

एक याचिकाकर्ता के वकील ने अदालत को बताया कि दिल्ली में कल नागरिकों को कहीं भी खड़े होने की अनुमति नहीं दी जा रही थी, जो उनके अधिकारों का सीधा उल्लंघन है। वरिष्ठ वकील गोपाल शंकरनारायणन ने पेनड्राइव के माध्यम से वीडियो साक्ष्य पेश किए, जिनमें वकीलों के खिलाफ की गई कार्रवाई के दृश्य शामिल थे। उन्होंने बताया कि शादान समेत कई लोगों को हिरासत में लिया गया और यह सब जंतर-मंतर के निर्धारित क्षेत्र से काफी बाहर हुआ। उन्होंने यह भी बताया कि सुप्रीम कोर्ट के बाहर अभी भी धारा 163 लागू है। शंकरनारायणन ने निहत्थे बच्चों के साथ मारपीट और लात मारने की घटनाओं को चौंकाने वाला बताया और कहा कि यह मामला अब न्यायपालिका के दरवाजे तक पहुंच गया है।

हिरासत के आंकड़े और व्यक्तिगत अनुभव

वकील मेनका गुरुस्वामी ने अपना व्यक्तिगत अनुभव साझा करते हुए बताया कि जब वे और अन्य वकील सीतलवाड चेंबर से रेड लाइट की ओर जा रहे थे, तो पुलिस ने उन्हें घेर लिया और एक महिला पुलिसकर्मी ने उनके साथ धक्का-मुक्की की। वकीलों ने दलील दी कि यह पूरा मामला अभिव्यक्ति की आजादी के मूल अधिकार से जुड़ा है। सुनवाई के दौरान यह दावा किया गया कि दिल्ली बॉर्डर और गुड़गांव समेत अन्य स्थानों से लगभग 6 से 7 हजार लोगों को हिरासत में लिया गया है। जस्टिस बागची ने इन दावों की गंभीरता को समझते हुए कहा कि पुलिस अधिकारियों को तब तक व्यक्तिगत कार्रवाई का अधिकार नहीं है जब तक प्रशासन का निर्णय न हो। उन्होंने आश्वासन दिया कि कोर्ट लोगों के जीवन और स्वतंत्रता के मुद्दे की तह तक जाएगा।

सरकार का पक्ष और हलफनामे का निर्देश

सॉलिसिटर जनरल तुषार मेहता ने सरकार का बचाव करते हुए कहा कि हिरासत में लिए गए लोगों के खिलाफ कानून के तहत कार्रवाई की गई थी। उन्होंने बताया कि हिरासत में लिए गए वकीलों को दोपहर 2 बजे तक छोड़ दिया गया था। एसजी ने आरोप लगाया कि प्रतिपक्ष के वकीलों ने राजनीतिक भाषण दिए हैं और सरकार ने केवल अनुपातिक सिद्धांत के आधार पर व्यवस्था बनाए रखने का प्रयास किया है। हालांकि, जस्टिस बागची ने एसजी से हलफनामे में यह स्पष्ट करने को कहा कि क्या 45 मेट्रो स्टेशनों पर आवाजाही बंद नहीं की गई थी। एसजी ने कहा कि कल रात 10 बजे से सभी स्टेशन खुले हैं। अंत में, सुप्रीम कोर्ट ने सरकार को अनुपालन हलफनामा दाखिल करने का निर्देश देते हुए कहा कि नागरिक अधिकारों का हनन नहीं होना चाहिए और मेट्रो स्टेशन जनता की जरूरत के अनुसार खुले रहने चाहिए।