अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप एक बार फिर अपने पुराने और विवादित एजेंडे को लेकर चर्चा में हैं। वेनेजुएला में हालिया सैन्य अभियान की सफलता से उत्साहित ट्रंप अब ग्रीनलैंड पर अमेरिकी नियंत्रण स्थापित करने के लिए किसी भी हद तक जाने को तैयार दिख रहे हैं। ट्रंप का मानना है कि ग्रीनलैंड की भौगोलिक स्थिति अमेरिका की राष्ट्रीय सुरक्षा के लिए अत्यंत महत्वपूर्ण है और इसे हासिल करना उनके कार्यकाल की सबसे बड़ी रणनीतिक जीत हो सकती है। हालांकि, डेनमार्क ने इस प्रस्ताव को सिरे से खारिज करते हुए वहां अपनी सैन्य उपस्थिति बढ़ा दी है, जिससे आर्कटिक क्षेत्र में युद्ध जैसी स्थिति पैदा होने का खतरा मंडराने लगा है।
ग्रीनलैंड पर कब्जे की जिद और सुरक्षा का तर्क
ट्रंप लंबे समय से ग्रीनलैंड को खरीदने या उस पर नियंत्रण पाने की इच्छा जताते रहे हैं और उनका तर्क है कि इस इलाके में चीन और रूस की बढ़ती गतिविधियां अमेरिका के लिए सीधा खतरा हैं। आर्कटिक क्षेत्र में बर्फ पिघलने के साथ ही नए व्यापारिक मार्ग और प्राकृतिक संसाधनों के भंडार खुल रहे हैं, जिस पर ट्रंप की पैनी नजर है। फ्लोरिडा में मीडिया से बात करते हुए ट्रंप ने स्पष्ट किया कि ग्रीनलैंड का अमेरिका के पास होना अनिवार्य है और उन्होंने कहा कि यूरोपीय संघ चाहे जितना भी विरोध करे, अमेरिका अपने हितों की रक्षा के लिए पीछे नहीं हटेगा। ट्रंप के इस रुख ने ट्रांस-अटलांटिक संबंधों में दरार पैदा कर दी है,। जो दशकों से अमेरिका और यूरोप के बीच मजबूती का आधार रहे हैं।
ट्रंप का टैरिफ बम: 8 देशों पर भारी टैक्स
डेनमार्क ने ट्रंप के बयानों को अपनी संप्रभुता पर हमला माना है और जवाब में डेनमार्क सरकार ने ग्रीनलैंड में अतिरिक्त सैनिकों की टुकड़ी रवाना कर दी है। ग्रीनलैंड की राजधानी नूक में स्थानीय निवासियों ने भी अमेरिका के खिलाफ बड़े पैमाने पर विरोध प्रदर्शन शुरू कर दिए हैं। डेनिश प्रधानमंत्री ने स्पष्ट किया है कि ग्रीनलैंड बिकाऊ नहीं है और इसकी रक्षा के लिए वे हर संभव कदम उठाएंगे। यूरोपीय संघ के अन्य देशों ने भी डेनमार्क का समर्थन किया है,। जिससे नाटो सैन्य गठबंधन के भीतर भी तनाव की स्थिति बन गई है। विशेषज्ञों का मानना है कि अगर ट्रंप अपनी जिद पर अड़े रहे, तो यह शीत युद्ध के बाद का सबसे बड़ा कूटनीतिक संकट बन सकता है।विरोध को दबाने के लिए ट्रंप ने अपने सबसे पुराने हथियार 'टैरिफ' का इस्तेमाल करने का ऐलान किया है। उन्होंने घोषणा की है कि जो देश ग्रीनलैंड पर अमेरिकी दावे का विरोध करेंगे, उन्हें भारी आर्थिक कीमत चुकानी होगी। ट्रंप ने 1 फरवरी से ब्रिटेन, डेनमार्क, नॉर्वे, स्वीडन, फ्रांस, जर्मनी, नीदरलैंड और फिनलैंड पर 10% अतिरिक्त आयात शुल्क लगाने का फैसला किया है। इतना ही नहीं, उन्होंने चेतावनी दी है कि यदि ये देश 1 जून तक अपना रुख नहीं बदलते, तो इस टैक्स को बढ़ाकर 25% कर दिया जाएगा और इस 'टैरिफ बम' ने यूरोपीय बाजारों में खलबली मचा दी है और इसे एक खुले व्यापार युद्ध की शुरुआत माना जा रहा है।
यूरोप की जवाबी कार्रवाई और वैश्विक प्रभाव
यूरोपीय नेताओं ने ट्रंप के इस कदम को 'अस्वीकार्य' और 'ब्लैकमेल' करार दिया है और यूरोपीय संघ अब ट्रंप प्रशासन के खिलाफ जवाबी टैरिफ लगाने पर विचार कर रहा है। जर्मनी और फ्रांस जैसे देशों ने साफ कर दिया है कि वे अमेरिकी दबाव में नहीं आएंगे। इस विवाद का असर वैश्विक अर्थव्यवस्था पर भी पड़ सकता है, क्योंकि अमेरिका और यूरोप के बीच व्यापारिक संबंध दुनिया की सबसे बड़ी आर्थिक धुरी हैं। यदि यह तनाव बढ़ता है, तो नाटो की एकता खतरे में पड़ सकती। है, जिसका सीधा फायदा रूस और चीन जैसे देशों को मिल सकता है। फिलहाल पूरी दुनिया की नजरें ट्रंप के अगले कदम और यूरोप की एकजुटता पर टिकी हैं।