ट्रंप प्रशासन ने भारत समेत 16 देशों के खिलाफ व्यापार जांच शुरू की

अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप के प्रशासन ने भारत, चीन और यूरोपीय संघ सहित 16 देशों के खिलाफ 'सेक्शन 301' के तहत व्यापारिक जांच शुरू की है। यह जांच अनुचित सब्सिडी और बाजार में सस्ते उत्पादों की डंपिंग के आरोपों पर केंद्रित है, जिससे भविष्य में नए टैरिफ लग सकते हैं।

वाशिंगटन स्थित अमेरिकी व्यापार प्रतिनिधि (USTR) कार्यालय ने आधिकारिक तौर पर भारत, चीन और यूरोपीय संघ सहित 16 प्रमुख व्यापारिक भागीदारों के खिलाफ एक व्यापक व्यापार जांच शुरू करने की घोषणा की है। यह कार्रवाई 'ट्रेड एक्ट 1974' के 'सेक्शन 301' के तहत की जा रही है। अमेरिकी प्रशासन का आरोप है कि ये देश अपनी घरेलू कंपनियों को भारी सब्सिडी प्रदान कर रहे हैं और अतिरिक्त उत्पादन क्षमता (ओवर-कैपेसिटी) के माध्यम से अमेरिकी बाजार में सस्ते उत्पादों की आपूर्ति कर रहे हैं। इस कदम को वैश्विक व्यापार परिदृश्य में एक बड़े बदलाव के रूप में देखा जा रहा है, जो आने वाले महीनों में अंतरराष्ट्रीय व्यापार संबंधों को प्रभावित कर सकता है।

जांच की समयसीमा और कानूनी प्रक्रिया

अमेरिकी व्यापार प्रतिनिधि जैमीसन ग्रीर के अनुसार, इस नई 'सेक्शन 301' जांच की प्रक्रिया को अत्यंत तीव्र गति से पूरा करने का लक्ष्य रखा गया है। प्रशासन की योजना जुलाई के मध्य तक इस जांच को अंतिम रूप देने की है और आधिकारिक कार्यक्रम के अनुसार, इस मामले में सार्वजनिक टिप्पणियां स्वीकार करने की अंतिम तिथि 15 अप्रैल निर्धारित की गई है। इसके पश्चात, 5 मई के आसपास सार्वजनिक सुनवाई आयोजित की जाएगी। यह त्वरित समयसीमा इसलिए तय की गई है ताकि वर्तमान में लागू 10% के अस्थायी टैरिफ की 150 दिनों की अवधि समाप्त होने से पहले नई व्यापारिक नीतियों को कानूनी रूप दिया जा सके।

सुप्रीम कोर्ट का फैसला और वैकल्पिक कानूनी आधार

इस जांच की पृष्ठभूमि 20 फरवरी को अमेरिकी सुप्रीम कोर्ट द्वारा दिए गए एक महत्वपूर्ण फैसले से जुड़ी है। अदालत ने राष्ट्रीय आपातकाल कानून के तहत लगाए गए ट्रंप प्रशासन के वैश्विक टैरिफ को अवैध करार देते हुए रद्द कर दिया था। इस न्यायिक झटके के बाद, अमेरिकी सरकार ने अपनी व्यापारिक रणनीति में बदलाव किया और 'ट्रेड एक्ट 1974' के सेक्शन 122 का उपयोग करते हुए 150 दिनों के लिए 10% का अस्थायी टैरिफ लागू किया। वर्तमान में शुरू की गई 'सेक्शन 301' जांच का उद्देश्य उन विशिष्ट व्यापारिक प्रथाओं की पहचान करना है जिन्हें अमेरिका 'अनुचित' मानता है, ताकि भविष्य में स्थायी और लक्षित टैरिफ लगाए जा सकें।

जांच के दायरे में शामिल देश और प्रमुख आरोप

अमेरिका ने इस जांच के लिए 16 देशों और क्षेत्रों की एक सूची तैयार की है। इसमें भारत और चीन के अलावा जापान, दक्षिण कोरिया, मैक्सिको, ताइवान, वियतनाम, थाईलैंड, मलेशिया, कंबोडिया, सिंगापुर, इंडोनेशिया, बांग्लादेश, स्विट्जरलैंड और नॉर्वे शामिल हैं। जांच का मुख्य केंद्र इन देशों द्वारा दी जाने वाली सरकारी सब्सिडी, कम मजदूरी दर, राज्य के स्वामित्व वाले उद्यमों की गैर-व्यावसायिक गतिविधियां और मुद्रा संबंधी नीतियां हैं। अमेरिकी अधिकारियों का तर्क है कि इन कारकों की वजह से अमेरिकी विनिर्माण क्षेत्र को प्रतिस्पर्धा में नुकसान हो रहा है और विशेष रूप से, कनाडा को इस सूची से बाहर रखा गया है, जो अमेरिका का दूसरा सबसे बड़ा व्यापारिक भागीदार है।

बंधुआ मजदूरी और मानवाधिकार संबंधी जांच

औद्योगिक सब्सिडी के अलावा, अमेरिकी प्रशासन ने बंधुआ मजदूरी (फोर्स्ड लेबर) से संबंधित उत्पादों के आयात पर भी एक अलग 'सेक्शन 301' जांच शुरू की है। जैमीसन ग्रीर ने स्पष्ट किया है कि इस जांच के दायरे में 60 से अधिक देश आ सकते हैं। अमेरिका का उद्देश्य उन उत्पादों के प्रवेश को रोकना है जिनके उत्पादन में मानवाधिकारों का उल्लंघन हुआ हो। पूर्व में, अमेरिका ने चीन के शिनजियांग प्रांत से आने वाले उत्पादों पर इसी तरह के प्रतिबंध लगाए थे। वाशिंगटन का आरोप है कि वहां उइगर अल्पसंख्यकों से जबरन श्रम कराया जाता है, हालांकि बीजिंग इन दावों को लगातार नकारता रहा है।

वैश्विक कूटनीति और आगामी उच्च-स्तरीय बैठकें

व्यापारिक जांच की इस घोषणा के बीच कूटनीतिक प्रयास भी जारी हैं और अमेरिकी ट्रेजरी सचिव स्कॉट बेसेंट के नेतृत्व में एक प्रतिनिधिमंडल इसी सप्ताह पेरिस में चीनी अधिकारियों के साथ बैठक करने वाला है। यह बैठक रणनीतिक रूप से महत्वपूर्ण मानी जा रही है क्योंकि यह राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप और चीनी राष्ट्रपति शी जिनपिंग के बीच बीजिंग में होने वाली संभावित मुलाकात से ठीक पहले हो रही है। इन वार्ताओं का उद्देश्य व्यापारिक तनाव को कम करना और दोनों देशों के बीच आर्थिक हितों पर चर्चा करना है। भारत के संदर्भ में, यह जांच 2026 तक निर्यात शुल्क संरचना में बड़े बदलावों का संकेत दे सकती है।