खाड़ी युद्ध के मोर्चे से एक ऐसा सच सामने आया है जिसने अमेरिका की सैन्य महाशक्ति होने के दावे पर सवालिया निशान लगा दिए हैं। अमेरिका यह अच्छी तरह जानता है कि जब शस्त्रागार खाली हो जाएं, तो कूटनीति में केवल दिखावे का सहारा ही बचता है। वर्तमान में अमेरिका इसी स्थिति से गुजर रहा है जहां उसे अपनी कमजोरी छिपाने के लिए स्वांग रचना पड़ रहा है और जंग रोकने का आदेश और ट्रंप के फैसले के पीछे छिपे संदेश को अब कूटनीति की शांति नहीं, बल्कि हथियारों के अकाल के रूप में देखा जा रहा है। जरूरत से ज्यादा इस्तेमाल के बाद अब अमेरिकी सेना हथियारों के अकाल का सामना कर रही है।
पेंटागन की रिपोर्ट और वॉल स्ट्रीट जर्नल का दावा
पेंटागन के एक वरिष्ठ अधिकारी से बातचीत के आधार पर वॉल स्ट्रीट जर्नल ने एक विस्तृत रिपोर्ट प्रकाशित की है। इस रिपोर्ट में ईरान पर अमेरिका के हमले रोकने का एक ऐसा कारण बताया गया है जिससे अमेरिका की शक्ति का तिलिस्म टूटता नजर आ रहा है। रिपोर्ट में दावा किया गया है कि अरब क्षेत्र में मचे बारूदी विनाश के बाद युद्धविराम का वास्तविक अर्थ कूटनीतिक प्रयास से शांति हासिल करना नहीं था। बल्कि, युद्ध को रोकना डोनाल्ड ट्रंप के लिए एक बड़ी मजबूरी बन गया था। अगर वे ऐसा नहीं करते, तो अमेरिका के लिए अपने सैन्य बेस और समुद्री युद्ध पोतों को बचाना भी नामुमकिन हो जाता और युद्ध के मोर्चे पर जीत और हार सिर्फ हिम्मत से तय नहीं होती, बल्कि इसके लिए हथियारों का सक्षम भंडार होना जरूरी है, लेकिन ईरान के मोर्चे पर स्थिति इसके ठीक उलट थी।
दुनिया की सबसे बड़ी सैन्य ताकत के खाली होते तरकश
रिपोर्ट के मुताबिक, दुनिया की सबसे बड़ी सैन्य ताकत के तरकश अब खाली हो चुके हैं। जिस वाशिंगटन के एक इशारे से पूरी दुनिया कांप उठती थी, आज उसी अमेरिका के मिसाइल साइलो खोखले पड़े हैं और यानी ईरान पर हमले रोकने के ट्रंप के फैसले के पीछे कोई कूटनीति नहीं थी, बल्कि ट्रंप ने हमले रोककर हथियारों के अकाल का खौफनाक सच दुनिया से छिपाया है। वॉल स्ट्रीट जर्नल की इस रिपोर्ट ने पेंटागन की नींव हिलाकर रख दी है और दावा है कि अगर जुलाई में ईरान के खिलाफ युद्ध कुछ दिन और खिंच जाता, तो अमेरिकी नौसेना और वायुसेना के पास मिसाइलें ही नहीं बचतीं। ईरान के मिसाइल हमलों को नाकाम करने की होड़ में अमेरिका ने यूरोप और प्रशांत महासागर में तैनात अपने पैट्रियट और ATACMS मिसाइल भंडारों को इस कदर खाली कर दिया कि अब ताइवान की रक्षा करना भी अमेरिका के बस से बाहर हो चुका है।
अमेरिका की वर्तमान स्थिति और सुरक्षा में सुराख
जुलाई महीने में एक ऐसा वक्त आया था जब पूरी दुनिया को लग रहा था कि अमेरिका तेहरान को हमेशा के लिए तबाह कर देगा और लेकिन सच्चाई यह थी कि व्हाइट हाउस के बंद कमरों में अमेरिकी जनरल्स के पसीने छूट रहे थे। इस सच्चाई को एक रक्षा अधिकारी ने जग-जाहिर किया है और वॉल स्ट्रीट जर्नल के अनुसार, ट्रंप ने खुद जुलाई में ईरान पर हमले रोकने का फैसला लिया था क्योंकि अमेरिकी वायु रक्षा भंडार खतरनाक स्तर से नीचे गिर चुका था। यह स्थिति इसलिए बनी क्योंकि अमेरिका ने ईरानी मिसाइल और ड्रोन रोकने में इंटरसेप्टर मिसाइलों का जरूरत से ज्यादा इस्तेमाल कर लिया था। अगर जंग 10 दिन और चलती, तो अमेरिका के पास अपने जहाजों और बेस को बचाने के लिए भी मिसाइलें नहीं बचतीं। वाशिंगटन ने गोला-बारूद का ऐसा बेहिसाब इस्तेमाल किया कि उसके अपने सुरक्षा घेरे में सुराख हो गया।
चीन और रूस के सामने अमेरिका की लाचारी
ट्रंप ने युद्ध तो रोक दिया, लेकिन अपने सबसे बड़े दुश्मन चीन के आगे खुद को निहत्था खड़ा कर लिया। अमेरिका ने प्रशांत महासागर क्षेत्र और यूरोप में तैनात एयर डिफेंस को अरब में शिफ्ट कर दिया था और इसका मतलब यह है कि अगर चीन इस वक्त ताइवान पर हमला कर दे, तो अमेरिका ताइवान की रक्षा के लिए अपनी सैन्य रणनीति लागू नहीं कर पाएगा। चीन और रूस जैसे परमाणु संपन्न प्रतिद्वंद्वियों के सामने अमेरिका की पारंपरिक युद्ध क्षमता इतिहास के सबसे निचले स्तर पर पहुंच चुकी है। बीजिंग ने भी वाशिंगटन के खाली होते शस्त्रागारों पर पैनी नजर गड़ा ली है, जिससे अमेरिकी जनरल्स अब बैकफुट पर आ चुके हैं। अपनी इस लाचारी पर पर्दा डालने के लिए अमेरिका ने पूर्वी एशिया में युद्धाभ्यास का ढोंग रचा है।
फ्रीडम एज अभ्यास और सहयोगियों को दिलासा
7 से 11 सितंबर तक जेजू द्वीप के पूर्व और दक्षिण में अंतरराष्ट्रीय जलक्षेत्र में फ्रीडम एज अभ्यास का आयोजन किया गया है। इस अभ्यास में दक्षिण कोरिया, जापान और अमेरिका मिलकर अपनी शक्ति का प्रदर्शन कर रहे हैं और इसका उद्देश्य सहयोगियों को यह संदेश देना है कि एशिया-प्रशांत क्षेत्र में अमेरिकी गठबंधन अब भी एकजुट है। हालांकि, रक्षा विशेषज्ञों का दावा है कि यह अभ्यास सिर्फ अपनी खोई हुई साख को बचाने और सहयोगियों को झूठा दिलासा देने का एक जरिया है। ट्रंप ने इस दिखावे में रेथियॉन कंपनी की सबसे खतरनाक मिसाइल का अनावरण भी किया है ताकि दुनिया को अपनी ताकत का अहसास कराया जा सके।
AIM-424 LRAAM मैलिस मिसाइल की ताकत
अमेरिका ने जिस नई मिसाइल का प्रदर्शन किया है, वह AIM-424 LRAAM मैलिस है। इस मिसाइल की मारक क्षमता 463 किलोमीटर है, जो इसे हवा से हवा में मार करने वाली सबसे लंबी दूरी की मिसाइल बनाती है। इस मिसाइल ने चीन की PL-17 जिसकी क्षमता 400 किलोमीटर है और रूस की R-37M जिसकी मारक क्षमता 300 किलोमीटर है, दोनों को पीछे छोड़ दिया है। यह मिसाइल BVR तकनीक से लैस है और चीन के J-20 व रूस के Su-57 जैसे पांचवीं पीढ़ी के स्टेल्थ विमानों को भी नष्ट कर सकती है। 682 किलोग्राम वजनी यह मिसाइल टू-स्टेज सॉलिड-फ्यूल मोटर से लैस है और AWACS विमानों के डेटा लिंक से सटीक निशाना लगा सकती है। दावा है कि इसे F-35C और B-21 रेडर जैसे विमानों में तैनात किया जा सकता है। लेकिन सच्चाई यही है कि ईरान युद्ध ने अमेरिका की ताकत के भ्रम को पूरी तरह तोड़ दिया है।
