Congress Working Committee / क्या कांग्रेस के ये 5 मुस्लिम चेहरे असदुद्दीन ओवैसी के सियासी बाउंसर झेल पाएंगे?

Vikrant Shekhawat : Aug 21, 2023, 06:09 PM
Congress Working Committee: लोकसभा चुनाव से ठीक पहले कांग्रेस अध्यक्ष मल्लिकार्जुन खरगे ने अपनी टीम का ऐलान कर दिया है. कांग्रेस ने हाई प्रोफाइल मानी जाने वाली कांग्रेस वर्किंग कमेटी (सीडब्ल्यूसी) का पुनर्गठन किया है. सीडब्ल्यूसी में 39 सदस्य, 32 स्थायी आमंत्रित सदस्य और 13 विशेष आमंत्रित सदस्यों को शामिल किया गया है. खरगे ने सीडब्ल्यूसी के 84 सदस्यों की फेहरिस्त जारी की है, जिसमें महज 5 मुस्लिम नेताओं को ही जगह मिली है. सीडब्ल्यूसी टीम में चार और एक स्थायी आमंत्रित सदस्य हैं.

कांग्रेस कार्य समिति में जिन 39 सदस्यों को शामिल किया गया है, उसमें मुस्लिम चेहरे के तौर पर तारिक अनवर, सलमान खुर्शीद, गुलाम अहमद मीर और सैयद नासिर हुसैन को जगह दी गई है. इसके अलावा तारिक हमीद कर्रा को सीडब्ल्यूसी के स्थायी आमंत्रित सदस्य के तौर पर रखा गया है. गौरतलब है किदेश में ऑल इंडिया मजलिस-ए-इत्तेहादुल मुस्लिमीन के प्रमुख असदुद्दीन ओवैसी खुलकर मुस्लिम पॉलिटिक्स कर रहे हैं. ओवैसी, बीजेपी के साथ कांग्रेस को भी मुस्लिम मुद्दे पर कठघरे में खड़ा कर रहे हैं. इसके चलते ही सबसे बड़ा सियासी खतरा कांग्रेस की मुस्लिम पॉलिटिक्स को लेकर हो रहा है. ऐसे में सवाल उठता है कि ओवैसी की मुस्लिम सियासत को कांग्रेस क्या तारिक अनवर और सलमान खुर्शीद के जरिए काउंटर कर पाएगी?

सीडब्ल्यूसी में मुस्लिम चेहरे के तौर पर जगह बनाने वाले तारिक अनवर बिहार से आते हैं. सोनिया गांधी के विदेश मूल का मुद्दा बनाते हुए कांग्रेस से नाता तोड़ लिया था, लेकिन 2019 से पहले कांग्रेस में वापसी की है. पांच दशक के सियासी अनुभव रखने वाले तारिक अनवर की पहचान मुस्लिम नेता के तौर पर कभी भी नहीं रही है. हालांकि, मुस्लिम संगठन ऑल इंडिया कौमी तंजीम के तारिक अनवर कर्ताधर्ता हैं, लेकिन मुस्लिम समुदाय के बीच प्रभाव नहीं जमा सके.

मुस्लिम पॉलिटिक्स के खांचे में फिट नहीं बैठते सलमान खुर्शीद

सलमान खुर्शीद को कांग्रेस कार्यसमिति में जगह मिली है, जिनके साथ दो पीढ़ियों की राजनीतिक विरासत जुड़ी है. सलमान खुर्शीद को भले ही मुस्लिम चेहरे के तौर पर शामिल किया गया हो, लेकिन मुस्लिम पॉलिटिक्स के खांचे में कभी भी फिट नहीं बैठ सके हैं. इस तरह से मुसलमानों के बीच पकड़ उस तरह से नहीं है, जिस तरह की राजनीतिक मुस्लिम समुदाय को पसंद है. सलमान खुर्शीद यूपी से आते हैं, जहां पर मुस्लिमों से जुड़े हुए तमाम संगठन के हेड ऑफिस हैं. इसके बाद भी मुस्लिम मतों पर वो अपनी पकड़ नहीं बना सके हैं.

अपने राज्यों से बाहर इन नेताओं की नहीं है कोई पहचान

कांग्रेस की कार्यसमिति में मुस्लिम चेहरे के तौर पर सैय्यद नासिर हुसैन को भी जगह मिली है, जो कर्नाटक से आते हैं और मल्लिकार्जुन खरगे के करीबी होने के साथ-साथ गांधी परिवार से भी काफी नजदीक हैं. नासिर हुसैन खुद को साउथ की राजनीतिक तक ही सीमित कर रखे हैं, उत्तर भारत की मुस्लिम सियासत में अपनी जगह और पहचान नहीं बना सके हैं. इस तरह से जम्मू-कश्मीर से आने वाले गुलाम अहमद मीर और तारिक हमीद कर्रा को जगह मिली है. इन दोनों ही नेताओं की पहचान कश्मीर से बाहर नहीं है. ऐसे में मुस्लिम सियासत के खांचे में कैसे फिट बैठेंगे, क्योंकि उत्तर प्रदेश, बिहार, दिल्ली जैसे सूबे में मुस्लिम सियासत एक अलग तरीके की है.

आक्रामक तरीके से मुस्लिम पॉलिटिक्स कर रहे ओवैसी

देश में मुस्लिम मतदाता लंबे समय तक कांग्रेस का परंपरागत वोट बैंक रहा है, लेकिन राम मंदिर आंदोलन के बाद यूपी, बिहार, दिल्ली, बंगाल, जैसे राज्यों में मुस्लिम मतदाता कांग्रेस से छिटक कर क्षेत्रीय दलों के साथ चला गया है. 2014 के बाद से AIMIM प्रमुख असदुद्दीन ओवैसी आक्रामक तरीके से मुस्लिम पॉलिटिक्स कर रहे हैं. ओवैसी मुसलमानों से जुड़े मुद्दों पर खुलकर अपनी बात रखते हैं और उनकी तुलना में कांग्रेस या फिर सेक्युलर कहे जाने वाले दल नहीं बोल पाते हैं. ओवैसी मुस्लिम समुदाय से जुड़े हुए मुद्दे उठाते हैं. AIMIM के नेता चुनौती देते हुए कहते हैं कि असदुद्दीन ओवैसी को छोड़कर देश में दूसरा मुस्लिम नेता बताओ, जो मुसलमानों से मुद्दे को सड़क से लेकर संसद तक उठा रहा हो. ओवैसी जिस तरह से डटकर और जमकर मुस्लिमों के मुद्दे उठा रहे हैं. असदुद्दीन ओवैसी अक्सर संसद में मुस्लिम समुदाय से जुड़े हुए मुद्दे उठाते हैं. चाहे तीन तलाक का मामला हो, बाबरी मस्जिद पर फैसला, लिंचिंग, लव जिहाद का मुद्दा हो या फिर सीएए और एनआरसी का मुद्दा, वो खुलकर अपनी बात रखते हैं और दूसरे नेताओं की तुलना में बेहतर तर्क देते हैं.

AIMIM देश में मुसलमानों की पार्टी बनकर उभरी

ओवैसी की मुसलमानों से जुड़े मुद्दों पर बेबाक तरीके से बोलना मुस्लिम समुदाय को भी भा रहा है, जिसका सियासी लाभ भी उन्हें मिल रहा है. 2019 में एक से दो सांसद उनके हो गए. ओवैसी खुद हैदराबाद से जीते तो इम्तियाज जलील महाराष्ट्र के औरंगाबाद से चुनकर आए. तेलंगाना में ओवैसी के सात विधायक, महाराष्ट्र में दो विधायक, बिहार में पांच विधायक 2020 के चुनाव में जीतने में सफल रहे थे. यूपी के निकाय चुनाव में भी संभल जैसी नगर पालिका पर जीत दर्ज की और मेरठ के मेयर सीट पर नंबर दो पर रही. इस तरह ओवैसी की एआईएमआईएम देश में मुसलमानों की पार्टी बन कर उभर रही है.

कांग्रेस, सपा, आरजेडी जैसे दलों की बढ़ रही धड़कन

ओवैसी की मुसलमानों के बीच बढ़ती लोकप्रियता से सबसे ज्यादा चुनौती कांग्रेस, सपा, आरजेडी जैसी पार्टियों के लिए है. मुसलमानों का झुकाव जितना ओवैसी की तरफ होगा, उतनी ही टेंशन इन दलों के लिए होगी. यही वजह है कि कांग्रेस से लेकर सपा, आरजेडी और टीएमसी तक ओवैसी को बीजेपी की बी-टीम कहकर आरोप लगाती रही हैं, जिसके जवाब में ओवैसी का कहना है कि ये सभी तथाकथित सेक्युलर दल मुसलमानों का वोट तो लेना चाहते हैं, लेकिन उन्हें न ही प्रतिनिधित्व देते हैं और न ही उनके मुद्दों को उठाते हैं. बीजेपी, कांग्रेस सभी एक ही थाली के चट्टे-बट्टे हैं. मुसलमानों का इलेक्शन के वक्त में इस्तेमाल करो और उसके बाद उन्हें भूल जाओ. मुस्लिमों के बीच असदुद्दीन ओवैसी के बढ़ते सियासी प्रभाव को काउंटर करने के लिए कांग्रेस ने अपनी सबसे पावरफुल कमेटी में जिन मुस्लिम नेताओं को जगह दी है, उनमें से एक भी मुस्लिम नेता ऐसा नहीं है जो ओवैसी की तरह मुसलमानों से जुड़े मुद्दे पर अपनी बात रख सके. तारिक अनवर से सलमान खुर्शीद और सैय्यद नासिर हुसैन तक न तो ओवैसी की तरह बेबाक तरीके से मुसलमानों की बात रख पाते हैं और न ही उनके मुद्दों को उठाते हैं. ऐसे में कांग्रेस कैसे असदुद्दीन ओवैसी की मुसलमानों के बीच बढ़ती पकड़ को कमजोर कर पाएगी?

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