ब्रिक्स समिट 2026: ईरान, यूएई और सऊदी के साथ पीएम मोदी की संतुलित कूटनीति का दम

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ब्रिक्स समिट 2026: ईरान, यूएई और सऊदी के साथ पीएम मोदी की संतुलित कूटनीति का दम
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दिल्ली में आयोजित ब्रिक्स समिट 2026 भारत के लिए अपनी कूटनीतिक ताकत और रणनीतिक स्वायत्तता दिखाने का एक बड़ा मंच बन गया है। पश्चिम एशिया में जारी मौजूदा संघर्षों के बीच, प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने एक बेहद संतुलित कूटनीति का परिचय दिया है और भारत एक ही समय में ईरान, संयुक्त अरब अमीरात (यूएई) और सऊदी अरब के साथ सक्रिय रूप से जुड़ा हुआ है। हालांकि इन तीनों देशों के बीच क्षेत्रीय संघर्षों को लेकर नजरिया एक जैसा नहीं है, लेकिन भारत तीनों से निरंतर संवाद कर रहा है, जो उसकी 'बैलेंस्ड डिप्लोमेसी' की सफलता को दर्शाता है।

ईरान के साथ उच्च स्तरीय संवाद की निरंतरता

इस समिट का एक महत्वपूर्ण पहलू प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी और ईरान के राष्ट्रपति मसूद पेजेश्कियान के बीच मात्र 12 दिन के भीतर हुई दूसरी मुलाकात रही। इससे पहले दोनों नेताओं ने 31 अगस्त को किर्गिस्तान के बिश्केक में मुलाकात की थी और अब 11 सितंबर को पेजेश्कियान सीधे दिल्ली पहुंचे। राष्ट्रपति बनने के बाद पेजेश्कियान की यह पहली भारत यात्रा है और साल 2018 में हसन रूहानी के दौरे के बाद, 8 साल में पहली बार कोई ईरानी राष्ट्रपति दिल्ली पहुंचा है। 10 दिन के भीतर हुई इन दो मुलाकातों ने यह स्पष्ट कर दिया है कि अमेरिका के भारी दबाव के बावजूद भारत ने ईरान के साथ अपने संवाद के रास्ते बंद नहीं किए हैं। यह इस बात का प्रमाण है कि भारत अपनी विदेश नीति किसी बाहरी दबाव में नहीं, बल्कि अपने राष्ट्रीय हितों के आधार पर तय करता है।

रणनीतिक जरूरतें और आर्थिक दृष्टिकोण

ब्रिक्स बिजनेस फोरम के दौरान ईरानी राष्ट्रपति पेजेश्कियान ने मुश्किल समय में ईरान के साथ खड़े रहने के लिए भारत का आभार व्यक्त किया और ईरान के साथ भारत की यह कूटनीति केवल पुराने रिश्तों को निभाने तक सीमित नहीं है, बल्कि इसके पीछे भारत की अपनी रणनीतिक जरूरतें भी हैं। होर्मुज स्ट्रेट में बढ़ते तनाव के बीच भारत को अपने व्यापार के लिए सुरक्षित रास्तों की आवश्यकता है और भारत एक तरफ ईरान से बात कर रहा है, तो दूसरी तरफ यूएई, सऊदी अरब, अमेरिका और इजरायल के साथ भी अपने संबंधों को मजबूती से आगे बढ़ा रहा है। भारत का संदेश स्पष्ट है कि दबाव चाहे किसी भी पक्ष से हो, उसके फैसले हमेशा भारत के हित में होंगे और पेजेश्कियान ने कहा कि ब्रिक्स का उद्देश्य एकतरफा सोच का मुकाबला करना है और इस समिट के नारे आजादी, एकजुटता, मजबूती, प्रतिरोध और इनोवेशन इसी दिशा में एक कदम हैं।

वैश्विक आर्थिक व्यवस्था में बदलाव की मांग

राष्ट्रपति पेजेश्कियान ने इस बात पर जोर दिया कि आज दुनिया अपने सबसे जटिल दौर से गुजर रही है, जहां राजनीतिक दबाव बनाने के लिए आर्थिक साधनों का उपयोग किया जा रहा है। उन्होंने कहा कि भुगतान के नियमों में विविधता लाए बिना आर्थिक मजबूती हासिल नहीं की जा सकती और ब्रिक्स बैंक का जिक्र करते हुए उन्होंने सदस्य देशों से निवेश की उम्मीद जताई ताकि डॉलर पर निर्भरता कम की जा सके और डॉलर के माध्यम से होने वाली अमेरिका की मनमानी पर लगाम लगाई जा सके। भारत के लिए यह मुलाकात केवल द्विपक्षीय संबंधों तक सीमित नहीं है, बल्कि बदलती वैश्विक आर्थिक व्यवस्था में अपनी जगह बनाने की कोशिश भी है। भारत जहां ईरान के साथ अपने रणनीतिक और आर्थिक हित सुरक्षित रखना चाहता है, वहीं यूएई और सऊदी अरब भी भारत के बड़े व्यापार, निवेश और ऊर्जा साझेदार बने हुए हैं।

चाबहार और आईएनएसटीसी: पाकिस्तान को बायपास करने की तैयारी

पीएम मोदी और राष्ट्रपति पेजेश्कियान के बीच बातचीत का एक मुख्य केंद्र वह कनेक्टिविटी रूट है जो भारत को सीधे यूरोप के बाजार से जोड़ता है और पाकिस्तान को बायपास करते हुए भारत अब चाबहार के रास्ते रूस और यूरोप तक अपनी सीधी ट्रेड कनेक्टिविटी तैयार कर रहा है। मुंबई से समुद्री रास्ते के जरिए भारत सीधे चाबहार पोर्ट पहुंचता है, जहां शाहिद बेहेश्ती टर्मिनल इस रूट का पहला अहम पड़ाव है। चाबहार से सड़क मार्ग के जरिए कजाकिस्तान, तुर्कमेनिस्तान और उज्बेकिस्तान जैसे लैंड लॉक्ड देशों तक पहुंच बनाई जाएगी। इसके बाद यह मार्ग ईरान के बंदर-ए-अंजली से होते हुए कैस्पियन सागर तक पहुंचेगा और वहां से समुद्री रास्ते के जरिए रूस के अस्त्राखान तक जाएगा। करीब 7,200 किलोमीटर लंबा यह इंटरनेशनल नॉर्थ-साउथ ट्रांसपोर्ट कॉरिडोर (आईएनएसटीसी) भारत को रूस के मॉस्को और सेंट पीटरबर्ग जैसे शहरों से जोड़ता है और आगे जर्मनी, पोलैंड, नीदरलैंड्स और ब्रिटेन तक पहुंच प्रदान करता है। इस रूट से यूरोप तक की दूरी करीब 40 प्रतिशत तक कम हो सकती है और ट्रांसपोर्ट लागत में करीब 30 प्रतिशत की कमी आने का अनुमान है।

दीर्घकालिक समझौते और क्षेत्रीय प्रतिस्पर्धा

मई 2024 में भारत और ईरान के बीच शाहिद बेहेश्ती टर्मिनल के संचालन को लेकर 10 साल का एक महत्वपूर्ण समझौता हुआ था। भारत ने इस परियोजना के लिए 12 करोड़ डॉलर के निवेश और 25 करोड़ डॉलर की क्रेडिट लाइन को मंजूरी दी है। वर्तमान में चुनौती यह है कि युद्ध और प्रतिबंधों के बीच यह निवेश सुरक्षित रहे और चाबहार से कार्गो की आवाजाही निरंतर जारी रहे। इसके अलावा, ईरान भारत को अधिक कच्चा तेल और एलपीजी सप्लाई करना चाहता है, जो भारत के लिए सस्ती ऊर्जा का एक बड़ा स्रोत हो सकता है, हालांकि अंतरराष्ट्रीय प्रतिबंध इसमें एक बाधा हैं। होर्मुज स्ट्रेट का संकट भारत के लिए एक सीधा खतरा है, इसलिए चाबहार एक ठोस विकल्प के रूप में उभर रहा है। चाबहार की तुलना अक्सर पाकिस्तान में चीन के ग्वादर पोर्ट से की जाती है। जहां ग्वादर केवल चीन और पाकिस्तान के सीपीईसी नेटवर्क का हिस्सा है, वहीं चाबहार भारत के लिए मध्य एशिया, रूस और यूरोप तक का द्वार खोलता है। बलोचिस्तान में अशांति के कारण जहां सीपीईसी का काम प्रभावित हुआ है, वहीं शाहिद बेहेश्ती टर्मिनल का संचालन भारतीय कंपनी द्वारा सफलतापूर्वक किया जा रहा है।

निष्कर्ष: भारत की 'हित-सर्वोपरि' नीति

भारत की कूटनीति केवल ईरान तक सीमित नहीं है। एक तरफ ईरान के साथ रणनीतिक हित हैं, तो दूसरी तरफ यूएई और सऊदी अरब के साथ गहरे व्यापारिक और ऊर्जा संबंध हैं। साथ ही अमेरिका और इजरायल के साथ भी भारत की रणनीतिक साझेदारी मजबूत है। यही कारण है कि पश्चिम एशिया के इस कठिन दौर में भी दिल्ली में सभी प्रमुख पक्षों से संवाद किया जा रहा है। भारत का ध्यान किसी एक पक्ष का साथ देने के बजाय युद्धविराम, नागरिकों की सुरक्षा और अंतरराष्ट्रीय कानून के पालन पर है। यह पूरी रणनीति भारत की अपनी अर्थव्यवस्था और सुरक्षा से जुड़ी है। ब्रिक्स समिट से भारत का संदेश साफ है कि रिश्ते सभी से होंगे, लेकिन फैसले केवल भारत के हित में लिए जाएंगे।

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