मोदी और जिनपिंग की दिल्ली में मुलाकात, 18वें ब्रिक्स शिखर सम्मेलन पर दुनिया की नजर

Add as Preferred Source on Google News
विज्ञापन
मोदी और जिनपिंग की दिल्ली में मुलाकात, 18वें ब्रिक्स शिखर सम्मेलन पर दुनिया की नजर
विज्ञापन

नई दिल्ली में आज से 18वें ब्रिक्स शिखर सम्मेलन की औपचारिक शुरुआत हो रही है। दो दिनों तक चलने वाले इस महत्वपूर्ण आयोजन में पूरी दुनिया की नजरें भारत पर टिकी हैं। भारत मंडपम में ब्रिक्स देशों के राष्ट्राध्यक्ष एक साझा मंच पर एकत्रित हो रहे हैं। इस बैठक की महत्ता प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी, चीन के राष्ट्रपति शी जिनपिंग और रूस के राष्ट्रपति व्लादिमीर पुतिन की एक साथ मौजूदगी से और बढ़ गई है। यह सम्मेलन दुनिया की लगभग आधी आबादी का प्रतिनिधित्व करने वाले देशों के नेताओं को कई वैश्विक और क्षेत्रीय मुद्दों पर चर्चा करने का अवसर प्रदान कर रहा है।

मोदी और जिनपिंग की ऐतिहासिक मुलाकात

ब्रिक्स समिट के दौरान आज एशिया की दो सबसे बड़ी शक्तियों, भारत और चीन के शीर्ष नेताओं के बीच एक अत्यंत महत्वपूर्ण मुलाकात होने जा रही है। चीनी राष्ट्रपति शी जिनपिंग लगभग 7 साल के लंबे अंतराल के बाद भारत की धरती पर कदम रख रहे हैं। उनका विमान दोपहर 12:35 बजे दिल्ली में उतरेगा। इसके पश्चात, शाम 5:45 बजे प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी और शी जिनपिंग के बीच एक हाई-प्रोफाइल द्विपक्षीय बैठक आयोजित की जाएगी। हालांकि दोनों नेता पिछले तीन वर्षों में कज़ान और तियानजिन जैसी विदेशी जगहों पर तीन बार मिल चुके हैं, लेकिन भारत में होने वाली यह मुलाकात रिश्तों की नई दिशा तय करने के लिहाज से बेहद खास है।

सीमा विवाद और भरोसे की बहाली पर चर्चा

वर्ष 2020 में गलवान घाटी में हुई हिंसक झड़प के बाद से भारत और चीन के संबंधों में अभूतपूर्व तनाव देखा गया है। सीमा पर दोनों देशों की सेनाएं लंबे समय तक आमने-सामने डटी रहीं, जिससे कूटनीतिक और व्यापारिक रिश्तों पर भी बुरा असर पड़ा। भारत में चीनी सामानों के बहिष्कार की मांग भी उठी। ऐसे में आज होने वाली मोदी-जिनपिंग मुलाकात को दोनों देशों के बीच जमी बर्फ को पिघलाने की एक गंभीर कोशिश के रूप में देखा जा रहा है और बातचीत का मुख्य केंद्र बिंदु सीमा पर तनाव कम करना, आपसी विश्वास को फिर से बहाल करना और भविष्य के संबंधों के लिए एक ठोस रूपरेखा तैयार करना होगा। चीन के विदेश मंत्रालय की प्रवक्ता माओ निंग ने भी इस बैठक की पुष्टि करते हुए कहा कि दोनों देश इस द्विपक्षीय वार्ता के लिए पूरी तरह तैयार हैं।

व्यापार घाटा और आर्थिक संबंधों की चुनौतियां

रक्षा और सुरक्षा के अलावा, व्यापारिक मुद्दे भी इस बैठक के एजेंडे में शीर्ष पर रहेंगे। वर्तमान में भारत और चीन के बीच कुल व्यापार लगभग 151 अरब डॉलर का है। इस व्यापारिक आंकड़े में एक बड़ा असंतुलन है, क्योंकि भारत चीन से लगभग 131 अरब डॉलर का सामान आयात करता है, जबकि चीन को भारत का निर्यात केवल 20 अरब डॉलर के आसपास ही सीमित है। इस प्रकार भारत को चीन के साथ एक बहुत बड़े व्यापार घाटे का सामना करना पड़ रहा है। प्रधानमंत्री मोदी इस बैठक में भारतीय कंपनियों के लिए चीन के बाजार में अधिक पहुंच सुनिश्चित करने और इस व्यापारिक अंतर को कम करने की मांग उठा सकते हैं। इसके अलावा, मशीनरी और तकनीक की आपूर्ति को सुगम बनाने, चीनी निवेश के लिए पारदर्शी नियम बनाने और दोनों देशों के बीच वीजा व उड़ानों की आवाजाही को आसान करने पर भी चर्चा संभव है।

ब्रिक्स बिजनेस फोरम और बाजार खोलने की मांग

शिखर सम्मेलन से ठीक एक दिन पहले आयोजित ब्रिक्स बिजनेस फोरम में भी व्यापार का मुद्दा छाया रहा और भारत ने स्पष्ट रूप से मांग की है कि ब्रिक्स देशों को अपने बाजार एक-दूसरे के लिए खोलने चाहिए। वाणिज्य मंत्री पीयूष गोयल ने कहा कि भारत ब्रिक्स को अपने उत्पादों के लिए एक प्रमुख बाजार मानता है और चाहता है कि भरोसेमंद साझेदारों के माध्यम से भारतीय उत्पाद वैश्विक स्तर पर पहुंचें। उन्होंने जोर देकर कहा कि व्यापारिक संबंध गहरे और मजबूत होने चाहिए, जो विविध आपूर्ति श्रृंखलाओं पर आधारित हों। गोयल ने कच्चे माल और आवश्यक खनिजों के लिए भी बाजार खोलने की वकालत की। वहीं, चीन के विदेश मंत्रालय के प्रवक्ता गुओ जियाकुन ने भारत-चीन आर्थिक संबंधों को दोनों के लिए फायदेमंद बताया और उम्मीद जताई कि भारत सभी विदेशी कंपनियों के लिए एक निष्पक्ष और गैर-भेदभावपूर्ण कारोबारी माहौल प्रदान करेगा।

वैश्विक परिदृश्य में चीन की भूमिका और ब्रिक्स

चीन दुनिया की दूसरी सबसे बड़ी अर्थव्यवस्था है और ब्रिक्स के भीतर उसका आर्थिक प्रभाव काफी अधिक है। चीन इस मंच का उपयोग युद्ध, व्यापार युद्ध और जलवायु परिवर्तन जैसे वैश्विक संकटों पर सहयोग बढ़ाने के लिए करना चाहता है। विशेष रूप से, चीन के लिए ब्रिक्स एक ऐसा मंच है जहां वह अमेरिकी व्यापार नीतियों और टैरिफ के खिलाफ अन्य देशों के साथ मिलकर रणनीति बना सकता है। चीनी पत्रकार ली जिनजिंग के अनुसार, व्यापार युद्ध का प्रभाव केवल चीन पर ही नहीं, बल्कि भारत और अन्य विकासशील देशों पर भी पड़ा है। उनका मानना है कि भारत और चीन के नेता अब बातचीत के जरिए इन समस्याओं का समाधान खोजने की कोशिश कर रहे हैं, क्योंकि कोई भी देश अनावश्यक संघर्ष नहीं चाहता और शांतिपूर्ण समाधान ही सभी के हित में है।

पुतिन और पेजेश्कियान के साथ मोदी की वार्ता

मुख्य सम्मेलन से पहले प्रधानमंत्री मोदी ने रूस के राष्ट्रपति व्लादिमीर पुतिन और ईरान के राष्ट्रपति मसूद पेजेश्कियान के साथ अलग-अलग बैठकें कीं। पुतिन के साथ उनकी बातचीत लगभग 45 मिनट तक चली, जबकि ईरानी राष्ट्रपति के साथ उन्होंने करीब 40 मिनट तक चर्चा की। इन मुलाकातों के दौरान नेताओं के बीच जबरदस्त तालमेल और गर्मजोशी देखी गई। ब्रिक्स के मंच पर प्रधानमंत्री मोदी द्वारा ईरानी राष्ट्रपति का हाथ थामने की तस्वीर ने दुनिया को एक मजबूत कूटनीतिक संदेश दिया है। इन बैठकों के माध्यम से भारत ने एक बार फिर यह स्पष्ट किया है कि वह युद्ध के बजाय बातचीत और कूटनीति के जरिए विवादों को सुलझाने का पक्षधर है।

चीनी राजदूत का बयान और आज का कार्यक्रम

शी जिनपिंग के आगमन से पहले भारत में चीन के राजदूत शू फेहॉन्ग ने इस दौरे को अत्यंत महत्वपूर्ण करार दिया। उन्होंने सोशल मीडिया पर साझा किया कि यह लगातार तीसरा वर्ष है जब दोनों शीर्ष नेता मिल रहे हैं, जो द्विपक्षीय सहयोग को आगे बढ़ाने की दिशा में एक सकारात्मक कदम है। आज के कार्यक्रमों की बात करें तो दोपहर 2:35 बजे ब्रिक्स नेताओं का एक क्लोज्ड डोर सेशन होगा, जिसका विषय 'समावेशी वैश्विक शासन और बहुपक्षवाद को मजबूत करना' रखा गया है। इसके बाद शाम 4:25 बजे नेता 'भारत इनोवेट्स प्रदर्शनी' का अवलोकन करेंगे। शाम 5:05 बजे आधिकारिक फोटो सेशन और पौधारोपण कार्यक्रम होगा। अंत में, शाम 7:30 बजे प्रधानमंत्री मोदी द्वारा आयोजित रात्रिभोज में सभी नेता शामिल होंगे।

बदलती वैश्विक व्यवस्था और ब्रिक्स का भविष्य

दिल्ली में हो रही यह मोदी-जिनपिंग मुलाकात केवल दो देशों के रिश्तों तक सीमित नहीं है, बल्कि यह ब्रिक्स की मजबूती और बदलती वैश्विक व्यवस्था का भी प्रतीक है और रक्षा, सुरक्षा, व्यापार, निवेश और वीजा जैसे विविध विषयों पर होने वाली यह चर्चा वैश्विक शक्ति संतुलन में बदलाव के संकेत दे रही है। मोदी, जिनपिंग और पुतिन जैसे कद्दावर नेताओं का एक साथ आना यह दर्शाता है कि आने वाले समय में वैश्विक राजनीति का केंद्र एशिया की ओर और अधिक झुक सकता है। पूरी दुनिया अब इस बैठक के बाद होने वाले संभावित बड़े ऐलानों का इंतजार कर रही है।

विज्ञापन