नई दिल्ली में आयोजित होने वाला आगामी ब्रिक्स शिखर सम्मेलन भारत के लिए केवल एक बड़े अंतरराष्ट्रीय सम्मेलन की मेजबानी करने का अवसर नहीं है, बल्कि यह भारत की कूटनीतिक क्षमता की एक बड़ी परीक्षा भी है। इस बार भारत के सामने सबसे बड़ी चुनौती ब्रिक्स के भीतर मौजूद अलग-अलग और कई बार एक-दूसरे से टकराते हुए हितों के बीच एक साझा सहमति बनाने की है। भारत को यह महत्वपूर्ण कार्य एक ऐसे समय में करना है जब वैश्विक राजनीति कई अलग-अलग ध्रुवों में बंटी हुई है और अंतरराष्ट्रीय संबंधों में तनाव स्पष्ट रूप से दिखाई दे रहा है। भारत के लिए यह केवल एक आयोजन नहीं, बल्कि वैश्विक मंच पर अपनी नेतृत्व क्षमता को साबित करने का क्षण है।
रूस और चीन के साथ संबंधों की जटिलता
ब्रिक्स संगठन के भीतर रूस और चीन भारत के अत्यंत महत्वपूर्ण साझेदार देश हैं, लेकिन इन दोनों ही देशों के साथ भारत के रिश्तों की अपनी-अपनी जटिलताएं और चुनौतियां हैं। रूस के साथ भारत की साझेदारी दशकों पुरानी और रणनीतिक रूप से बहुत गहरी है, जिसमें रक्षा और ऊर्जा क्षेत्र के संबंध सबसे प्रमुख स्तंभ रहे हैं। दूसरी ओर, चीन के साथ सीमा पर जारी विवादों के बावजूद भारत आर्थिक और बहुपक्षीय मंचों पर संवाद की प्रक्रिया को बनाए रखना चाहता है। भारत की निरंतर यह कोशिश रही है कि ब्रिक्स जैसा महत्वपूर्ण मंच किसी एक देश के एजेंडे या किसी एक विशेष खेमे का औजार न बन जाए। भारत चाहता है कि यह मंच बहुध्रुवीय विश्व की वास्तविकताओं को प्रतिबिंबित करे न कि किसी एक शक्ति का पक्ष ले।
पश्चिमी देशों के हित और रणनीतिक स्वायत्तता
दूसरी तरफ, अमेरिका और यूरोप भारत के लिए व्यापार, निवेश, आधुनिक तकनीक, रक्षा और वैश्विक सप्लाई चेन के लिहाज से बेहद महत्वपूर्ण साझेदार हैं। भारत की आर्थिक प्रगति और तकनीकी विकास के लिए इन देशों के साथ मजबूत संबंध अनिवार्य हैं। ऐसे में ब्रिक्स के भीतर यदि कोई पश्चिम-विरोधी रुख या पहल सामने आती है, तो भारत को वहां बहुत ही सावधानी और सूझबूझ के साथ आगे बढ़ना होगा। भारत का स्पष्ट और प्राथमिक हित यही है कि उसकी रणनीतिक स्वायत्तता यानी strategic autonomy हर हाल में बनी रहे। भारत की कोशिश है कि उसकी पहचान किसी एक विशेष भू-राजनीतिक खेमे के साथ न जुड़े, बल्कि वह अपनी जरूरतों और हितों के आधार पर स्वतंत्र निर्णय ले सके।
पश्चिम एशिया का समीकरण और ब्रिक्स की चुनौतियां
पश्चिम एशिया का मौजूदा समीकरण भारत के लिए एक और बड़ी कूटनीतिक चुनौती पेश करता है। ब्रिक्स के नए विस्तार के बाद इसमें ईरान और संयुक्त अरब अमीरात (UAE) दोनों शामिल हैं, लेकिन पश्चिम एशिया के मौजूदा संकट और क्षेत्रीय राजनीति को लेकर इन दोनों देशों की स्थितियां और दृष्टिकोण अलग-अलग हैं। इस पूरे समीकरण में इजराइल की भूमिका भी भारत के लिए अत्यंत महत्वपूर्ण है। भारत के इजराइल के साथ रक्षा और उच्च तकनीक के क्षेत्र में बहुत मजबूत संबंध हैं, जबकि ईरान के साथ भारत के चाबहार बंदरगाह और क्षेत्रीय कनेक्टिविटी जैसे बड़े रणनीतिक हित जुड़े हुए हैं। इसका अर्थ यह है कि पश्चिम एशिया के जटिल माहौल में भारत के लिए किसी एक पक्ष के साथ पूरी तरह खड़ा होना कोई आसान विकल्प नहीं है।
घोषणापत्र पर सहमति और भारत की असली परीक्षा
भारत की मौजूदा विदेश नीति की सबसे बड़ी विशेषता यही रही है कि वह अलग-अलग मुद्दों के आधार पर अपनी साझेदारियां चलाता है और किसी एक खेमे में बंधने से बचता है। इस नीति की कठिन परीक्षा मई में दिल्ली में हुई ब्रिक्स विदेश मंत्रियों की बैठक में देखने को मिली थी, जहां सदस्य देश विभिन्न मतभेदों के कारण एक संयुक्त बयान पर सहमति नहीं बना सके थे। अब शिखर सम्मेलन के दौरान पश्चिम एशिया पर होने वाली चर्चा और अंतिम घोषणापत्र की भाषा पर पूरी दुनिया की नजर रहेगी और दिल्ली ब्रिक्स सम्मेलन में भारत की असली सफलता सिर्फ एक घोषणापत्र पर हस्ताक्षर करवाने में नहीं होगी, बल्कि यह दिखाने में होगी कि भारत रूस और चीन के साथ मंच साझा करते हुए भी अमेरिका और यूरोप से अपने संबंध प्रगाढ़ रख सकता है, और ईरान, यूएई तथा इजराइल जैसे विपरीत हितों वाले देशों के साथ भी अपने रिश्तों का संतुलन बनाए रख सकता है।