केंद्र सरकार ने भारतीय लोकतांत्रिक ढांचे में एक युगांतरकारी बदलाव की दिशा में कदम बढ़ाते हुए लोकसभा की सीटों की संख्या में भारी वृद्धि का प्रस्ताव रखा है। सरकार द्वारा तैयार किए गए नए संविधान संशोधन विधेयक के अनुसार, लोकसभा की मौजूदा 543 सीटों को बढ़ाकर 850 किया जाएगा। इस ऐतिहासिक निर्णय का मुख्य उद्देश्य देश की बढ़ती जनसंख्या के अनुरूप संसदीय प्रतिनिधित्व को संतुलित करना है। प्रस्तावित ढांचे के तहत, कुल 850 सीटों में से 815 सीटें राज्यों के लिए और 35 सीटें केंद्र शासित प्रदेशों के लिए आरक्षित की गई हैं।
सीटों का नया गणित और राज्यों का प्रतिनिधित्व
प्रस्तावित विधेयक के अनुसार, लोकसभा की सीटों का नया निर्धारण 2026 की जनगणना के बाद होने वाले पहले परिसीमन (Delimitation) के आधार पर किया जाएगा। वर्तमान में लोकसभा की सीटों का आवंटन 1971 की जनगणना के आंकड़ों पर आधारित है, जो पिछले पांच दशकों में हुई जनसंख्या वृद्धि को प्रतिबिंबित नहीं करता है। सरकार का तर्क है कि सीटों की संख्या में वृद्धि से सांसदों को अपने निर्वाचन क्षेत्रों में बेहतर प्रबंधन और जनता से सीधा जुड़ाव रखने में मदद मिलेगी। 815 और 35 सीटों का यह नया फॉर्मूला राज्यों की जनसंख्या के अनुपात में तैयार किया गया है।
अनुच्छेद 82(3) को हटाने के मायने और संवैधानिक प्रभाव
इस संशोधन प्रस्ताव का सबसे तकनीकी और महत्वपूर्ण हिस्सा संविधान के अनुच्छेद 82(3) को हटाना है। वर्तमान संवैधानिक प्रावधानों के अनुसार, अनुच्छेद 82(3) लोकसभा सीटों के नए परिसीमन पर रोक लगाता है। इसे 2026 के बाद होने वाली पहली जनगणना के आंकड़े आने तक के लिए स्थगित किया गया था। इस अनुच्छेद के हटने से परिसीमन की समय-सीमा से जुड़े पुराने नियम समाप्त हो जाएंगे और सरकार के लिए सीटों के पुनर्निर्धारण का कानूनी मार्ग प्रशस्त हो जाएगा। वर्तमान में क्षेत्रीय सीमाएं 2001 की जनगणना के आधार पर तय हैं, जिन्हें अब नए सिरे से परिभाषित किया जाएगा।
परिसीमन का इतिहास और 2026 की समय-सीमा
भारतीय संविधान के अनुसार, प्रत्येक जनगणना के बाद लोकसभा सीटों का पुनर्गठन होना अनिवार्य है, लेकिन राजनीतिक और प्रशासनिक कारणों से यह प्रक्रिया लंबे समय से लंबित है और 1976 में आपातकाल के दौरान परिसीमन को वर्ष 2000 तक के लिए रोक दिया गया था। इसके बाद 2001 में एक और संशोधन के जरिए इसे 2026 तक बढ़ा दिया गया। अब जबकि नया संसद भवन (सेंट्रल विस्टा) अधिक सांसदों के बैठने की क्षमता के साथ तैयार है, सरकार ने इस प्रक्रिया को गति देने का निर्णय लिया है। यह बदलाव देश के विधायी इतिहास में सबसे बड़ा विस्तार माना जा रहा है।
महिला आरक्षण और विशेष सत्र की रूपरेखा
यह संविधान संशोधन विधेयक न केवल सीटों की संख्या बढ़ाएगा, बल्कि महिला आरक्षण अधिनियम को प्रभावी ढंग से लागू करने के लिए आवश्यक कानूनी आधार भी प्रदान करेगा। सरकार ने इस विधेयक पर चर्चा के लिए 16 अप्रैल से 18 अप्रैल 2026 तक संसद का विशेष सत्र बुलाने की योजना बनाई है। चूंकि यह एक संविधान संशोधन विधेयक है, इसलिए इसे पारित करने के लिए संसद के दोनों सदनों में दो-तिहाई बहुमत की आवश्यकता होगी। विपक्षी दलों ने इस पर अपनी प्रतिक्रिया देते हुए परिसीमन की प्रक्रिया और ओबीसी कोटा जैसे विषयों पर सवाल उठाए हैं, जिससे आगामी सत्र के काफी हंगामेदार रहने के आसार हैं।