US Supreme Court: ट्रंप के टैरिफ पर सुप्रीम कोर्ट का फैसला 14 जनवरी को, वैश्विक व्यापार पर पड़ेगा गहरा असर

US Supreme Court - ट्रंप के टैरिफ पर सुप्रीम कोर्ट का फैसला 14 जनवरी को, वैश्विक व्यापार पर पड़ेगा गहरा असर
| Updated on: 09-Jan-2026 11:27 PM IST
अमेरिकी सुप्रीम कोर्ट ने पूर्व राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप द्वारा लगाए गए टैरिफ की वैधता पर अपना बहुप्रतीक्षित फैसला 14 जनवरी तक के लिए टाल दिया है. यह निर्णय, जो मूल रूप से 9 जनवरी को आने वाला था, अब कुछ दिनों की देरी से आएगा, लेकिन इसका महत्व कम नहीं हुआ है और यह फैसला न केवल ट्रंप के प्रशासन की व्यापार नीतियों के लिए बल्कि भविष्य की अमेरिकी व्यापार रणनीति और दुनिया भर की अर्थव्यवस्थाओं के लिए भी एक महत्वपूर्ण मोड़ साबित हो सकता है. इस फैसले से यह स्पष्ट होगा कि क्या किसी अमेरिकी राष्ट्रपति के पास वैश्विक व्यापार की दिशा को. अकेले बदलने की असीमित शक्ति है, या फिर अमेरिकी कानून और संविधान उसकी शक्तियों पर सीमाएं लगाते हैं.

वैश्विक व्यापार पर संभावित प्रभाव

सुप्रीम कोर्ट का यह फैसला भारत सहित अमेरिका के कई प्रमुख व्यापारिक भागीदारों पर लगाए गए भारी-भरकम टैरिफ की कानूनी स्थिति को निर्धारित करेगा. इन टैरिफ ने अंतरराष्ट्रीय व्यापार संबंधों में काफी उथल-पुथल मचाई थी और कई देशों के साथ अमेरिका के व्यापारिक समीकरणों को प्रभावित किया था. यदि कोर्ट इन टैरिफ को वैध ठहराता है, तो यह भविष्य के राष्ट्रपतियों को व्यापार नीतियों में एकतरफा और व्यापक बदलाव करने की अभूतपूर्व शक्ति प्रदान कर सकता है. इसके विपरीत, यदि कोर्ट इन्हें अवैध घोषित करता है, तो यह राष्ट्रपति की शक्तियों पर एक महत्वपूर्ण संवैधानिक सीमा लगाएगा और वैश्विक व्यापार में स्थिरता लाने में मदद कर सकता है. दुनिया भर के देश, वैश्विक बाजार और आने वाली व्यापार नीतियां इस फैसले का बेसब्री से इंतजार कर रहे हैं, क्योंकि इसका असर व्यापक और दूरगामी होगा.

मामला सुप्रीम कोर्ट तक कैसे पहुंचा

यह समझना महत्वपूर्ण है कि यह जटिल मामला अमेरिकी सुप्रीम कोर्ट तक कैसे पहुंचा. ट्रंप प्रशासन ने ये विवादित टैरिफ 1977 के एक कानून, इंटरनेशनल इमरजेंसी इकोनॉमिक पावर्स एक्ट (IEEPA) के तहत लगाए थे और यह कानून राष्ट्रपति को कुछ विशेष आर्थिक अधिकार प्रदान करता है, खासकर आपातकालीन स्थितियों से निपटने के लिए. हालांकि, इस कानून के तहत टैरिफ लगाने के ट्रंप प्रशासन के फैसले पर सवाल उठे. आलोचकों और कानूनी विशेषज्ञों ने तर्क दिया कि क्या ‘आपातकाल’ के नाम पर राष्ट्रपति को मनमाने ढंग से टैरिफ लगाने की बेलगाम शक्ति मिल सकती है, जो कि संविधान में कांग्रेस को दी गई टैरिफ लगाने की शक्ति का उल्लंघन है.

सुप्रीम कोर्ट के समक्ष प्रमुख प्रश्न

इस मामले में सबसे पहले यूएस कोर्ट ऑफ इंटरनेशनल ट्रेड ने अपना फैसला सुनाया था. इस अदालत ने स्पष्ट रूप से कहा था कि अमेरिकी संविधान टैरिफ लगाने का प्राथमिक अधिकार कांग्रेस को देता है, न कि राष्ट्रपति को और कोर्ट ने यह भी रेखांकित किया कि IEEPA कानून राष्ट्रपति को बेलगाम टैरिफ शक्ति प्रदान नहीं करता है. विशेष रूप से, कनाडा और मैक्सिको पर लगाए गए टैरिफ को अवैध माना गया था, क्योंकि वे उस कथित आपात स्थिति से सीधे तौर पर जुड़े हुए नहीं थे, जिसका हवाला ट्रंप प्रशासन ने दिया था. यह फैसला बाद में फेडरल सर्किट कोर्ट ऑफ अपील्स में भी बरकरार रखा गया, जिसने निचली अदालत के तर्क को और मजबूत किया. इन फैसलों ने इस बात पर जोर दिया कि राष्ट्रपति की शक्तियां संवैधानिक सीमाओं के अधीन हैं और IEEPA का उपयोग मनमाने ढंग से नहीं किया जा सकता है.

अब सुप्रीम कोर्ट के सामने दो बड़े और महत्वपूर्ण मुद्दे हैं जिन पर उसे फैसला करना है और पहला प्रश्न यह है कि क्या राष्ट्रपति को IEEPA के तहत टैरिफ लगाने का अधिकार है? यह प्रश्न राष्ट्रपति की कार्यकारी शक्तियों की सीमा और कांग्रेस की विधायी शक्तियों के बीच संतुलन को परिभाषित करेगा. दूसरा महत्वपूर्ण प्रश्न यह है कि यदि कोर्ट यह फैसला करता है कि IEEPA के तहत लगाए गए टैरिफ अवैध थे, तो क्या सरकार को पहले से वसूले गए टैरिफ वापस करने होंगे? यह सवाल वित्तीय निहितार्थों से जुड़ा है और इसका सीधा असर उन व्यवसायों और उपभोक्ताओं पर पड़ेगा जिन्होंने इन टैरिफ का भुगतान किया है. पिछले साल नवंबर में हुई सुनवाई के दौरान, जजों ने ट्रंप प्रशासन की दलीलों पर संदेह भी जताया था, जिससे यह संकेत मिलता है कि कोर्ट इस मामले को गंभीरता से ले रहा है और राष्ट्रपति की शक्तियों पर संभावित सीमाओं पर विचार कर रहा है.

यदि ट्रंप के पक्ष में आया फैसला

यदि सुप्रीम कोर्ट ट्रंप प्रशासन के पक्ष में फैसला सुनाता है और इन टैरिफ को वैध ठहराता है, तो इसके दूरगामी परिणाम होंगे. कानूनी विशेषज्ञों का मानना है कि ऐसा निर्णय राष्ट्रपति को अभूतपूर्व शक्तियां प्रदान कर सकता है, जो केवल आयात पर ही नहीं, बल्कि बिक्री, संपत्ति और यहां तक कि उपयोग पर भी टैक्स लगाने जैसी शक्तियों के समान हो सकती हैं. यह अमेरिकी सरकार की संरचना में एक मौलिक बदलाव ला सकता है, जहां कार्यकारी शाखा की शक्ति विधायी शाखा की कीमत पर काफी बढ़ जाएगी. यह वैश्विक व्यापार में भी अनिश्चितता पैदा कर सकता है, क्योंकि भविष्य के राष्ट्रपति बिना कांग्रेस की मंजूरी के व्यापार नीतियों में बड़े बदलाव करने में सक्षम होंगे, जिससे अंतरराष्ट्रीय व्यापार समझौतों और संबंधों पर नकारात्मक प्रभाव पड़ सकता है.

यदि ट्रंप के खिलाफ आया फैसला

इसके विपरीत, यदि सुप्रीम कोर्ट यह फैसला करता है कि IEEPA के तहत लगाए गए टैरिफ अवैध थे, तो अमेरिका को उन व्यवसायों और उपभोक्ताओं को पैसे लौटाने पड़ सकते हैं जिन्होंने इन शुल्कों का भुगतान किया था और रॉयटर्स के अनुसार, यह राशि 150 अरब डॉलर तक पहुंच सकती है, जो एक बहुत बड़ी रकम है. अकेले फरवरी 2025 से दिसंबर 2025 के बीच ट्रंप प्रशासन ने लगभग 133. 5 अरब डॉलर के टैरिफ वसूले थे. इस तरह का फैसला न केवल अमेरिकी खजाने पर एक बड़ा वित्तीय बोझ डालेगा, बल्कि यह भविष्य के. राष्ट्रपतियों के लिए एक मजबूत मिसाल भी कायम करेगा कि वे अपनी शक्तियों का उपयोग कैसे कर सकते हैं. यह निर्णय अमेरिकी संविधान में निहित शक्तियों के पृथक्करण के सिद्धांत को मजबूत करेगा और. यह सुनिश्चित करेगा कि व्यापार नीति जैसे महत्वपूर्ण मामलों पर कांग्रेस की भूमिका सर्वोपरि बनी रहे. यह वैश्विक व्यापार भागीदारों के लिए भी एक सकारात्मक संकेत होगा, जो व्यापार संबंधों में अधिक स्थिरता और पूर्वानुमेयता की उम्मीद कर सकते हैं.

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