अफगानिस्तान की तालिबान सरकार ने देश की आधिकारिक और प्रशासनिक भाषा से विदेशी शब्दों को हटाने का एक महत्वपूर्ण निर्णय लिया है। तालिबान के सर्वोच्च नेता मौलवी हैबतुल्लाह अखुंदजादा द्वारा जारी एक नए फरमान के अनुसार, टीवी, मोबाइल और ट्रेन जैसे सामान्य रूप से उपयोग किए जाने वाले विदेशी शब्दों के स्थान पर अब स्थानीय विकल्पों का उपयोग किया जाएगा। यह आदेश रविवार से प्रभावी हो गया है और इसका उद्देश्य देश की भाषाई और सांस्कृतिक पहचान को मजबूत करना बताया गया है।
इस प्रक्रिया को सुव्यवस्थित करने के लिए न्याय मंत्रालय के नेतृत्व में एक उच्च स्तरीय समिति का गठन किया गया है। इस समिति में शिक्षा, उच्च शिक्षा, सूचना और संस्कृति मंत्रालय के साथ-साथ विज्ञान अकादमी और विभिन्न प्रशासनिक विभागों के वरिष्ठ अधिकारियों को शामिल किया गया है और यह समिति वर्तमान में उपयोग किए जा रहे विदेशी शब्दों का मूल्यांकन करेगी और उनके लिए उपयुक्त स्थानीय शब्द सुझाएगी।
समिति का गठन और कार्यप्रणाली
न्याय मंत्रालय की अध्यक्षता में बनी यह समिति विदेशी शब्दावली के स्थान पर पश्तो और दारी जैसी स्थानीय भाषाओं के शब्दों को खोजने का कार्य करेगी। समिति के सदस्यों को यह जिम्मेदारी दी गई है कि वे ऐसे शब्दों का चयन करें जो न केवल भाषाई रूप से सही हों, बल्कि प्रशासनिक कामकाज में भी सुगम हों। समिति द्वारा सुझाए गए विकल्पों पर अंतिम मुहर तालिबान नेता मौलवी हैबतुल्लाह अखुंदजादा लगाएंगे, जिसके बाद इन्हें आधिकारिक दस्तावेजों में अनिवार्य कर दिया जाएगा।
सरकारी विभागों को विस्तृत निर्देश
तालिबान प्रशासन ने सभी सरकारी एजेंसियों और विभागों को इस भाषाई परिवर्तन में पूर्ण सहयोग करने का निर्देश दिया है। प्रत्येक विभाग को अपने दैनिक कामकाज और तकनीकी शब्दावली में उपयोग होने वाले विदेशी शब्दों की एक विस्तृत सूची तैयार करने को कहा गया है। इन सूचियों को समिति के पास भेजा जाएगा, जो उनके लिए उपयुक्त स्थानीय विकल्प प्रदान करेगी। सरकार का लक्ष्य है कि भविष्य के सभी आधिकारिक पत्राचार और सरकारी रिकॉर्ड पूरी तरह से स्थानीय शब्दावली में हों।
भाषाई शुद्धता का ऐतिहासिक संदर्भ
अफगानिस्तान में विदेशी शब्दों को हटाने और स्थानीय भाषाओं को बढ़ावा देने का प्रयास नया नहीं है। पूर्ववर्ती सरकारों के दौरान भी इस दिशा में कदम उठाए गए थे। वर्ष 2012 में तत्कालीन राष्ट्रपति हामिद करजई ने भी इसी तरह का एक फरमान जारी किया था। हालांकि, उस समय प्रशासनिक गंभीरता की कमी और कार्यान्वयन की चुनौतियों के कारण यह बदलाव व्यापक स्तर पर सफल नहीं हो सका था। वर्तमान प्रशासन इस बार इसे अधिक सख्ती से लागू करने की योजना बना रहा है।
शहरी क्षेत्रों में पूर्व की कार्रवाइयां
पिछले पांच वर्षों के दौरान, तालिबान ने शहरी स्तर पर भी विदेशी भाषाओं के प्रभाव को कम करने के प्रयास किए हैं। कई नगरपालिकाओं ने शहरों में लगे उन बैनरों और बिलबोर्डों को हटा दिया है जिनमें अंग्रेजी या अन्य विदेशी भाषाओं का उपयोग किया गया था। हाल के महीनों में अंग्रेजी शब्दों को अरबी नामों से बदलने के भी प्रयास देखे गए थे, जिससे सार्वजनिक स्थानों पर अरबी शब्दावली में वृद्धि हुई थी। अब सरकार का ध्यान पूरी तरह से स्थानीय भाषाई जड़ों की ओर लौटने पर है।
सांस्कृतिक पहचान का संरक्षण
इस नए फरमान का प्राथमिक उद्देश्य अफगानिस्तान की सांस्कृतिक और भाषाई संप्रभुता को सुरक्षित करना है। सरकार का मानना है कि विदेशी शब्दों का अत्यधिक उपयोग स्थानीय पहचान को कमजोर करता है और स्थानीय शब्दों को अनिवार्य बनाकर, प्रशासन यह सुनिश्चित करना चाहता है कि आने वाली पीढ़ियां अपनी मूल भाषा से जुड़ी रहें। यह कदम तालिबान की व्यापक सांस्कृतिक नीति का हिस्सा है, जिसके तहत वे देश के सामाजिक और प्रशासनिक ढांचे को पारंपरिक मूल्यों के अनुरूप ढालने का प्रयास कर रहे हैं।
