भारतीय संगीत जगत की एक युग का अंत हो गया है। दिग्गज पार्श्व गायिका आशा भोसले का रविवार को 92 वर्ष की आयु में निधन हो गया। सुरों की मल्लिका कही जाने वाली आशा भोसले ने अपने सात दशक लंबे करियर में भारतीय संगीत को नई ऊंचाइयों पर पहुंचाया। उनके निधन की खबर से फिल्म उद्योग और संगीत प्रेमियों में शोक की लहर दौड़ गई है। अधिकारियों के अनुसार, उन्होंने रविवार सुबह अंतिम सांस ली। संयोगवश, उनकी बड़ी बहन और स्वर कोकिला लता मंगेशकर का निधन भी 2022 में 92 वर्ष की आयु में ही हुआ था।
'राधा कैसे न जले' और 68 की उम्र का वो जादू
आशा भोसले की गायकी का एक अद्भुत उदाहरण साल 2001 में आई फिल्म 'लगान' में देखने को मिला था। जब वह 68 वर्ष की थीं, तब उन्होंने 'राधा कैसे न जले' गाने को अपनी आवाज दी थी। इस गाने में उन्होंने राधा की ईर्ष्या और प्रेम के भावों को जिस खूबसूरती से पिरोया, वह आज 25 साल बाद भी लोगों की जुबान पर चढ़ा हुआ है। एआर रहमान के संगीत और जावेद अख्तर के बोलों के साथ आशा की आवाज ने इस गीत को कालजयी बना दिया।
बहुमुखी गायकी और सुरों का अनूठा सफर
आशा भोसले को उनकी बहुमुखी प्रतिभा के लिए जाना जाता था। उन्होंने शास्त्रीय संगीत से लेकर चुलबुले और दर्द भरे गानों तक, हर शैली में अपनी महारत साबित की। जहां 1971 में 'दम मारो दम' ने उन्हें एक अलग पहचान दी, वहीं 'इन आंखों की मस्ती' जैसे गजल नुमा गीतों ने उनकी गायकी की गहराई को दर्शाया। उन्होंने 'चुरा लिया है तुमने जो दिल को' और 'मुझको हुई न खबर' जैसे गानों के जरिए हर पीढ़ी के श्रोताओं के दिलों में जगह बनाई।
फिल्म 'लगान' की सफलता और ऑस्कर तक की गूंज
आशा भोसले द्वारा गाए गए गीतों से सजी फिल्म 'लगान' ने भारतीय सिनेमा के इतिहास में स्वर्णिम अध्याय लिखा था। आशुतोष गोवारिकर के निर्देशन में बनी इस फिल्म ने न केवल 8 फिल्मफेयर पुरस्कार जीते, बल्कि यह ऑस्कर की 'सर्वश्रेष्ठ विदेशी भाषा फिल्म' श्रेणी में अंतिम पांच में जगह बनाने में भी सफल रही थी। इस फिल्म की वैश्विक सफलता में आशा भोसले के गीतों का महत्वपूर्ण योगदान माना जाता है।
लता मंगेशकर और आशा भोसले: एक युग का अंत
भारतीय संगीत जगत में लता मंगेशकर और आशा भोसले को दो ऐसी पटरियों के रूप में देखा जाता था, जिन पर संगीत की गाड़ी दशकों तक दौड़ती रही। दोनों बहनें होने के बावजूद उनकी गायकी की शैली बिल्कुल अलग थी। जहां लता की आवाज में दिव्यता और गंभीरता थी, वहीं आशा की आवाज में चंचलता, प्रयोगधर्मिता और हर तरह के मिजाज को अपनाने की क्षमता थी। इन दोनों बहनों ने मिलकर भारतीय फिल्म संगीत के स्वर्ण युग का निर्माण किया।
12 हजार गानों और 20 भाषाओं का विशाल कीर्तिमान
आशा भोसले का करियर सांख्यिकीय रूप से भी अत्यंत प्रभावशाली रहा है। उन्होंने अपने जीवनकाल में 20 से अधिक भाषाओं में 12,000 से अधिक गानों को अपनी आवाज दी। उनके इस विशाल योगदान के लिए उन्हें दादा साहब फाल्के पुरस्कार और पद्म विभूषण जैसे सर्वोच्च सम्मानों से नवाजा गया था। उनके निधन के साथ ही भारतीय पार्श्व गायन के एक महान अध्याय का समापन हो गया है।
