अयोध्या के भव्य राम मंदिर में चढ़ावे की चोरी के मामले में एक के बाद एक कई बड़े और चौंकाने वाले खुलासे हो रहे हैं। जांच के दौरान यह बात सामने आई है कि यह कोई साधारण चोरी नहीं थी, बल्कि एक सुनियोजित और संगठित गिरोह का काम था। इस गिरोह के हर सदस्य की भूमिका पहले से ही तय होती थी, जिससे वे सुरक्षा व्यवस्था में सेंध लगाने में कामयाब रहे। जांच में यह भी पता चला है कि आरोपी अपनी ड्यूटी शुरू करने से पहले ही पूरी रणनीति तैयार कर लेते थे, ताकि किसी भी प्रकार की चूक की गुंजाइश न रहे। इस मामले ने राजनीतिक गलियारों में भी हलचल पैदा कर दी है, जहां सत्ता पक्ष और विपक्ष के बीच तीखी जुबानी जंग जारी है।
सुबह फोन पर तैयार होता था पूरा गेम प्लान
सूत्रों से मिली जानकारी के अनुसार, गिरोह के सदस्य ड्यूटी पर जाने से पहले सुबह ही फोन पर एक-दूसरे से संपर्क करते थे। इस दौरान यह तय किया जाता था कि उस दिन किसका क्या रोल होगा और इस प्लानिंग में यह भी शामिल होता था कि नोटों को कौन उठाएगा और कैमरे के फोकस को कौन रोकेगा। आरोपियों ने पूछताछ में स्वीकार किया है कि वे पूरी योजना के साथ काम करते थे ताकि मंदिर परिसर में लगे सीसीटीवी कैमरों की नजर से बचा जा सके। इस संगठित तरीके ने उन्हें लंबे समय तक अपनी गतिविधियों को जारी रखने में मदद की। यह पूरी प्रक्रिया इतनी सटीक थी कि सुरक्षाकर्मियों को भनक तक नहीं लगी।
सीसीटीवी फुटेज से इस पूरे मामले की सच्चाई खुलकर सामने आ गई है। बरामद किए गए फुटेज आरोपियों के कबूलनामे की पुष्टि करते हैं। फुटेज में देखा गया है कि अविनाश शुक्ला और मनीष जैसे आरोपी नोटों को सीधा करने के बहाने उन्हें अपने कपड़ों में छिपा लेते थे। उसी समय, गिरोह के अन्य सदस्य जैसे अनुकल्प, करुणेश, लवकुश और अन्य आरोपी जानबूझकर कैमरे के सामने इस तरह खड़े हो जाते थे कि चोरी की घटना रिकॉर्ड न हो सके। वे एक मानव दीवार की तरह काम करते थे ताकि मुख्य आरोपी की हरकतें कैमरे की पकड़ में न आएं। यह तरीका उनके संगठित अपराध की गहराई को दर्शाता है।
40 दिन में 70 बार की गई चोरी
एसआईटी (SIT) की रिपोर्ट में इस चोरी की भयावहता का खुलासा हुआ है। रिपोर्ट के मुताबिक, आरोपी सीसीटीवी फुटेज में करीब 70 बार चोरी करते हुए पकड़े गए हैं। सबसे हैरान करने वाली बात यह है कि यह 70 चोरियां महज 40 दिन के भीतर की गई थीं। फुटेज में अविनाश शुक्ला और मनीष का चेहरा सबसे ज्यादा बार चोरी करते हुए दिखाई दिया है और पूछताछ के दौरान अविनाश शुक्ला ने खुद यह बात मानी है कि रकम पार करने की मुख्य जिम्मेदारी अक्सर उसी को सौंपी जाती थी, क्योंकि वह इस काम में माहिर हो चुका था। इतने कम समय में इतनी अधिक बार चोरी करना सुरक्षा व्यवस्था पर बड़े सवाल खड़े करता है।
चोरी की रकम का बंटवारा और संदिग्ध भूमिकाएं
चोरी किए गए पैसों को लेकर भी गिरोह के बीच स्पष्ट नियम थे। आमतौर पर चोरी की गई रकम को गिरोह के सभी सदस्यों में बराबर-बराबर बांट दिया जाता था। हालांकि, कुछ मौकों पर अविनाश शुक्ला अपने पास बड़ा हिस्सा भी रखता था। पुलिस को इस मामले में एक और गंभीर संदेह है कि आरोपियों की पहुंच सीसीटीवी कंट्रोल रूम तक भी हो सकती थी। ऐसा इसलिए माना जा रहा है क्योंकि कुछ महत्वपूर्ण फुटेज डिलीट पाए गए हैं, जो बिना आंतरिक पहुंच के संभव नहीं है। यह अंदेशा मामले को और भी गंभीर बना देता है।
सीसीटीवी फुटेज के विश्लेषण के दौरान सुभाष श्रीवास्तव और टिन्नू यादव की मौजूदगी भी कई बार चोरी के वक्त देखी गई है। पुलिस अब इन दोनों को रिमांड पर लेकर पूछताछ करने की तैयारी में है। पुलिस यह जानना चाहती है कि क्या उन्हें इस संगठित अपराध की जानकारी थी और इस पूरे खेल में उनकी क्या भूमिका थी। एसआईटी की जांच अभी जारी है और उम्मीद है कि आने वाले दिनों में कुछ और बड़े खुलासे हो सकते हैं। इस घटना ने राम मंदिर के आंतरिक सुरक्षा प्रोटोकॉल और प्रबंधन की पारदर्शिता पर गंभीर सवालिया निशान लगा दिए हैं।
