मध्य पूर्व के भू-राजनीतिक समीकरणों में एक चौंकाने वाला खुलासा हुआ है। अमेरिका और इजराइल के साथ युद्ध की स्थिति के दौरान ईरान लगातार संयुक्त अरब अमीरात, कुवैत, बहरीन और सऊदी अरब जैसे खाड़ी देशों को अपना असली दुश्मन मानता रहा। ईरान ने इन देशों पर जवाबी कार्रवाई के तहत कई हमले भी किए, लेकिन अब जो जानकारी सामने आई है, उसके मुताबिक ईरान के पड़ोसी देश अजरबैजान ने इजराइल की गुप्त रूप से बड़ी मदद की थी और अजरबैजान ने ईरान के साथ अपनी 689 किलोमीटर लंबी सीमा होने के बावजूद इजराइल को अपनी जमीन पर सैन्य ठिकाने बनाने की अनुमति दी थी।
तबरीज़ के पास इजराइली सैन्य ठिकाना
रिपोर्टों के अनुसार, इजराइल ने अजरबैजान के भीतर कई सैन्य और खुफिया ठिकाने स्थापित किए थे। इनमें से एक प्रमुख ठिकाना ईरान के महत्वपूर्ण शहर तबरीज़ से लगभग 60 किलोमीटर की दूरी पर स्थित था। इस बेस की भौगोलिक स्थिति ने इजराइल को ईरान के भीतर सीधे हमले करने और खुफिया जानकारी जुटाने में बड़ी मदद की। इसी बेस का उपयोग करके ईरान पर कई हवाई और जमीनी हमले किए गए, जिससे ईरान की सुरक्षा व्यवस्था को बड़ी चुनौती मिली।
IRGC के खुफिया प्रमुख की हत्या का सच
अजरबैजान स्थित इन ठिकानों का उपयोग केवल निगरानी के लिए ही नहीं, बल्कि घातक ऑपरेशनों के लिए भी किया गया था। इस्लामिक रिवोल्यूशनरी गार्ड (IRGC) के खुफिया प्रमुख रहमान मोगद्दाम की हत्या का ऑपरेशन भी अजरबैजान के इसी बेस से संचालित किया गया था। यह खुलासा ईरान के लिए एक बड़ा झटका है क्योंकि वह अब तक अपने अन्य पड़ोसियों पर नजर रख रहा था, जबकि हमला उसकी अपनी सीमा के इतने करीब से किया गया था।
तख्तापलट की साजिश और खुफिया अधिकारियों की तैनाती
सीएनएन की एक रिपोर्ट के मुताबिक, इजराइल ने अजरबैजान में केवल सैनिक ही नहीं, बल्कि अपने वरिष्ठ खुफिया अधिकारियों को भी तैनात किया था। इजराइल का मुख्य उद्देश्य ईरान में तख्तापलट की स्थिति पैदा करना था। इजराइल को यह उम्मीद थी कि ईरान के शीर्ष नेताओं की हत्या के बाद वहां की जनता सड़कों पर उतर आएगी और सरकार के खिलाफ विद्रोह कर देगी और रिपोर्ट में बताया गया है कि सुप्रीम लीडर अयातुल्लाह अली खामेनेई और अली लारिजानी की हत्या के बावजूद ईरान की जनता ने वैसा विद्रोह नहीं किया जैसा इजराइल ने सोचा था।
विशेष बलों और घातक हथियारों की मौजूदगी
अजरबैजान में इजराइल की मौजूदगी काफी व्यापक थी। सूत्रों के हवाले से बताया गया है कि इस अभियान में इजराइल के दर्जनों सैनिक शामिल थे। इनमें इजराइल के विशेष अभियान बल, विशिष्ट हेलिकॉप्टर आधारित लड़ाकू दल, बचाव बल और मोसाद के एजेंट शामिल थे। इन ठिकानों तक गुप्त नेटवर्क के जरिए ड्रोन और अन्य घातक हथियार पहुंचाए गए थे। बताया जा रहा है कि इजराइल ने जनवरी 2026 में ही अजरबैजान में अपने सैनिकों की तैनाती शुरू कर दी थी, जो एक लंबी योजना का हिस्सा था।
अजरबैजान का दावा और जमीनी हकीकत
जंग के दौरान अजरबैजान के विदेश मंत्री जयहून बायरामो ने आधिकारिक बयान दिया था कि बाकू कभी भी अपनी भूमि का उपयोग किसी तीसरे देश के खिलाफ हमलों के लिए नहीं होने देगा। उन्होंने स्पष्ट रूप से कहा था कि ईरान के खिलाफ उनकी जमीन का इस्तेमाल नहीं होगा। हालांकि, ताजा रिपोर्टें इस दावे को पूरी तरह से खारिज करती हैं। अजरबैजान ने इन रिपोर्टों को गलत बताया है। अमेरिका में अजरबैजानी दूतावास के प्रवक्ता ने सीएनएन को दिए बयान में कहा कि वे तीसरे देशों के खिलाफ अभियानों के लिए अपनी धरती के उपयोग के दावों को निराधार मानते हैं। इसके अलावा, न्यूयॉर्क टाइम्स की एक रिपोर्ट में यह भी कहा गया था कि इजराइल ने बगदाद के पास भी एक बेस का उपयोग किया था।
