चीन पर बाढ़ की तबाही छिपाने का आरोप, वायरल वीडियो हटाए और विदेशी मीडिया पर रोक

नेपाल और तिब्बत में आई भीषण बाढ़ के बीच चीन पर जानकारी छिपाने के आरोप लग रहे हैं। ग्लेशियर टूटने से हुई इस तबाही में 676 लोगों की जान जा चुकी है और हजारों लापता हैं।

नेपाल और तिब्बत की सीमा पर ग्लेशियर फटने से आई भीषण बाढ़ और भूस्खलन ने बड़े पैमाने पर तबाही मचाई है, जिसमें अब तक 676 लोगों की मौत की पुष्टि हो चुकी है। इस बड़ी मानवीय त्रासदी के बीच चीन पर आरोप लग रहे हैं कि वह अपने क्षेत्र में हुई तबाही की खबरों और वीडियो को सेंसर कर रहा है और रिपोर्ट्स के अनुसार, चीन में बाढ़ की जानकारी को पूरी तरह से नियंत्रित किया जा रहा है और लोगों तक केवल वही खबरें पहुंच रही हैं जिन्हें सरकारी मीडिया द्वारा मंजूरी दी गई है। इन खबरों में तबाही के बजाय राहत और बचाव कार्यों पर अधिक ध्यान केंद्रित किया जा रहा है।

मौतों और लापता लोगों का आंकड़ा

आपदा एजेंसियों द्वारा जारी किए गए आंकड़ों के अनुसार, इस प्राकृतिक आपदा में अब तक कुल 676 लोगों की जान जा चुकी है। इसमें से नेपाल में 669 लोगों की मौत हुई है, जबकि चीन ने तिब्बत में केवल 7 मौतों की जानकारी दी है। लापता लोगों की संख्या भी चिंताजनक है, जहां कुल मिलाकर लगभग 3000 लोग अभी भी गायब हैं। नेपाल में 2426 लोग लापता बताए जा रहे हैं, वहीं चीन ने तिब्बत में 550 से ज्यादा लोगों के लापता होने की बात कही है। अमेरिकी जियोलॉजिकल सर्वे (USGS) ने अपनी रिपोर्ट में स्पष्ट किया है कि बुधवार को आई यह जानलेवा बाढ़ ग्लेशियर टूटने की वजह से पैदा हुई थी, जिसने सीमावर्ती इलाकों में भारी तबाही मचाई।

डिजिटल सेंसरशिप और वीडियो हटाने के आरोप

बाढ़ के दौरान स्थानीय लोगों ने तबाही के कई वीडियो सोशल मीडिया पर साझा किए थे। द न्यूयॉर्क टाइम्स की एक रिपोर्ट के अनुसार, तिब्बत के ग्यिरोंग काउंटी में एक बॉर्डर क्रॉसिंग पर मलबे के सैलाब का एक वीडियो काफी वायरल हुआ था, जिसे बाद में चीनी सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म से हटा दिया गया। ब्रिटेन के अखबार द टेलीग्राफ ने भी दावा किया कि चीन के सरकारी मीडिया ने इस भयावह वीडियो को दिखाने के बजाय केवल उसकी एक स्थिर तस्वीर का उपयोग किया, ताकि तबाही की गंभीरता को कम करके दिखाया जा सके।

सरकारी मीडिया का रुख और रेस्क्यू ऑपरेशन

चीन के सरकारी मीडिया का पूरा ध्यान इस समय राहत और बचाव अभियान की सफलता दिखाने पर है। खबरों में बताया जा रहा है कि प्रभावित इलाकों में चीनी सेना के जवानों और अन्य राहतकर्मियों की भारी तैनाती की गई है और बचाव कार्यों के लिए आधुनिक तकनीक जैसे ड्रोन और हेलिकॉप्टरों का इस्तेमाल किया जा रहा है। कम्युनिस्ट पार्टी के आधिकारिक मुखपत्र पीपुल्स डेली ने जानकारी दी कि राष्ट्रपति शी जिनपिंग ने ग्यिरोंग में बाढ़ प्रभावितों की हर संभव मदद करने के कड़े निर्देश दिए हैं। हालांकि, इन रिपोर्टों में इस बात का जिक्र बहुत कम है कि आम जनता को कितना नुकसान हुआ है।

विदेशी पत्रकारों पर पाबंदियां

तिब्बत में स्वतंत्र पत्रकारिता करना हमेशा से चुनौतीपूर्ण रहा है, लेकिन इस आपदा के बाद पाबंदियां और कड़ी कर दी गई हैं। विभिन्न रिपोर्टों के अनुसार, विदेशी पत्रकारों को तिब्बत जाने से रोका जा रहा है और वहां के स्थानीय लोगों से फोन पर बात करने में भी बाधाएं आ रही हैं। इस कारण नेपाल के बाहर हुई तबाही की स्वतंत्र रूप से जांच करना और वास्तविक स्थिति का पता लगाना मुश्किल हो गया है। तिब्बत 1950 के दशक से चीन के नियंत्रण में है और इसे चीन के सबसे संवेदनशील इलाकों में गिना जाता है, जहां सूचनाओं के प्रवाह पर सरकार का कड़ा पहरा रहता है।

विशेषज्ञों की राय और पारदर्शिता पर सवाल

लंदन की SOAS यूनिवर्सिटी के चाइना इंस्टीट्यूट के निदेशक स्टीव त्सांग ने द गार्जियन से बातचीत में कहा कि तिब्बत से जुड़ी किसी भी खबर को उच्च स्तर की मंजूरी के बिना प्रकाशित करना संभव नहीं है और उनके अनुसार, चीन तिब्बत को हमेशा राष्ट्रीय सुरक्षा के नजरिए से देखता है, इसलिए वहां की किसी भी घटना को गुप्त रखा जाता है। नेपाल के पूर्व सांसद राजेंद्र बजगाईं ने भी चीन की इस कार्यप्रणाली पर सवाल उठाए हैं और उन्होंने चीन पर पारदर्शिता की कमी का आरोप लगाते हुए कहा कि बाढ़ के वीडियो हटाना इस बात का संकेत है कि चीन दुनिया से कुछ छिपाना चाहता है।

नेपाल में राहत कार्य

नेपाल की आपदा एजेंसी ने बताया कि वहां बचाव दल अब तक 3700 से ज्यादा लोगों को सुरक्षित स्थानों पर पहुंचा चुके हैं। नेपाल में स्थिति की जानकारी लगातार साझा की जा रही है, जबकि तिब्बत की ओर से आने वाली सूचनाएं बेहद सीमित हैं और ग्लेशियर फटने की इस घटना ने दोनों देशों के सीमावर्ती क्षेत्रों में जीवन को पूरी तरह अस्त-व्यस्त कर दिया है और लापता लोगों की तलाश अभी भी जारी है।