Lok Sabha Elections / कांग्रेस-BJP साउथ में कमजोर, 131 सीटों पर क्या है मोदी-राहुल का प्लान?

Zoom News : Jun 28, 2023, 08:04 AM
Lok Sabha Elections: लोकसभा चुनाव को लेकर विपक्षी एकता का स्वरूप लगभग तय हो गया है. बीजेपी को उत्तर भारत में घेरने के लिए कई राज्यों में विपक्ष ने रणनीति बना ली है, लेकिन दक्षिण भारत के पांच राज्यों और दो केंद्र शासित प्रदेशों की कुल 131 लोकसभा सीटों के लिए सत्तापक्ष और विपक्षी दलों की स्ट्रेटजी क्या है?

पीएम मोदी का जादू उत्तर में भले ही लोगों के सिर चढ़कर बोलता हो, लेकिन दक्षिण में अभी भी फीका है. इसीलिए विपक्ष ने बीजेपी को नॉर्थ इंडिया में घेरने के लिए विपक्षी गठबंधन बनाने की कवायद की है, लेकिन मिशन-साउथ को लेकर रणनीति अलग तरह की है. दक्षिण में केरल, कर्नाटक, तमिलनाडु, आंध्र प्रदेश, तेलंगाना के अलावा पुडुचेरी और लक्षद्वीप है.

दक्षिण भारत में 131 सीटों का खेल

दक्षिण भारत में कुल 131 लोकसभा सीटें आती हैं, जिनमें कर्नाटक में 28, तेलंगाना में 17, आंध्र प्रदेश में 25, तमिलनाडु में 39, केरल में 20, पुडुचेरी और लक्षद्वीप में 1-1 सीट है. 2019 के लोकसभा चुनाव के नतीजे देखें तो बीजेपी 30 संसदीय सीटें जीतने में सफल रही थी जबकि कांग्रेस 27 सीटें और क्षेत्रीय दलों के खाते में 74 सीटें आई थीं, जिसमें ज्यादतर गैर-बीजेपी दल ही हैं.

विपक्ष दक्षिण भारत की कुल 131 लोकसभा सीट जीतने में अगर सफल रह जाता है और बीजेपी बेहतर नहीं करती है तो फिर सियासी उलटफेर हो सकता है. कांग्रेस की कोशिश दक्षिण भारत में बीजेपी का सफाया करने है तो बीजेपी की कोशिश हिंदुत्व के जरिए नया दरवाजा खोलने की है.

कांग्रेस-बीजेपी जूनियर पार्टनर

दक्षिण भारत में कांग्रेस और बीजेपी दोनों ही जूनियर पार्टनर हैं, क्योंकि यहां ज्यादातर क्षेत्रीय दलों का दबदबा है. तमिलनाडु में डीएमके-कांग्रेस का गठबंधन है, जिसमें डीएमके बड़े भाई की भूमिका में है. बीजेपी तमिलनाडु में एआईडीएमके की जूनियर पार्टनर है. आंध्र प्रदेश में बीजेपी टीडीपी की बातचीत चल रही है, जहां पर बीजेपी छोटे भाई की भूमिका में होगी. इसके अलावा केरल में कांग्रेस के अगुवाई वाले यूडीएफ और लेफ्ट के नेतृत्व वाले एलडीएफ के बीच सीधा मुकाबला है.

दक्षिण में क्षेत्रीय पार्टियों का दबदबा

आजादी के बाद का इतिहास देखा जाए तो शुरूआती दौर में कांग्रेस का तमिलनाडु, केरल, महाराष्ट्र, कर्नाटक, संयुक्त आंध्र प्रदेश में जबरदस्त तरीके से वर्चस्व था. हालांकि, वक्त के साथ कांग्रेस की यह पकड़ कमजोर होती गई. केरल में सबसे पहले कम्युनिस्ट दलों ने कांग्रेस पार्टी को सत्ता से बेदखल किया फिर तमिलनाडु में डीएमके और एआईएडीएमके ने कांग्रेस को सत्ता से हटाया. इसी तरह आंध्र प्रदेश और तेलंगाना में टीडीपी, वाईएसआर कांग्रेस और बीआरएस जैसे क्षेत्रीय दल ही पनपे. इसी तरह कर्नाटक में जेडीएस एक ताकत है.

मौजूदा समय में भी केरल में लेफ्ट के अगुवाई वाली एलडीएफ गठबंधन का कब्जा है तो तेलंगाना में बीआरएस, आंध्र प्रदेश में वाईएसआर कांग्रेस का दबदबा है. कर्नाटक में कांग्रेस ने अपने दम पर हाल ही में सरकार बनाई है तो तमिलनाडु में डीएमके के साथ सरकार में शामिल है. 2019 में क्षेत्रीय दलों ने 74 सीटें जीती थी, जिसमें वाईएसआर 25, डीएमके 20, बीआरएस ने 9 सीटें जीती थी.

मोदी का जादू दक्षिण में बेअसर

बीजेपी उत्तर भारत में भले ही अपना वर्चस्व स्थापित करने में सफल रही हो, लेकिन दक्षिण में मोदी का जादू फीका है. 2019 के लोकसभा चुनाव में बीजेपी कर्नाटक और तेलंगाना में सीटें जीतने में सफल रही जबकि केरल, तमिलनाडु, आंध्र प्रदेश में खाता तक नहीं खोल सकी. यही वजह है कि केसीआर ने अपनी पार्टी को राष्ट्रीय नाम बीआरएस बनाकर दक्षिण अस्मिता को जगाने का दांव चला है. लेकिन उन्हें दक्षिण की पार्टियों का ही साथ नहीं मिल सका. ऐसे में बीजेपी दक्षिण में नए सहयोगी दलों के साथ गठबंधन का तानाबाना बुन रही है, जिसमें आंध्र प्रदेश में टीडीपी और कर्नाटक में जेडीएस के साथ नजदीकियां बढ़ा रही है.

कांग्रेस की रणनीति

तमिलनाडु में डीएमके और लेफ्ट पार्टियां कांग्रेस के साथ हैं और 2024 में मिलकर चुनाव लड़ेंगी. आंध्र प्रदेश, कर्नाटक और तेलंगाना में कांग्रेस अकेले दम पर चुनावी मैदान में उतर सकती है. कर्नाटक में कांग्रेस की सरकार बनने के बाद से 2024 के मिशन में जुट गई है और तेलंगाना में लगातार बीआरएस नेताओं को अपने पाले में लाकर सियासी माहौल बनाने में जुटी है. ऐसे ही केरल में कांग्रेस लेफ्ट के साथ पहले की तरह ही मुकाबला करना चाहती है, क्योंकि बीजेपी का प्रभाव बहुत ज्यादा नहीं है.

कांग्रेस इस बात को बखूबी तरीके से समझ रही है कि दक्षिण में उसकी लड़ाई उत्तर से ज्यादा आसान दिख रही है. इसके चलते ही राहुल गांधी ने भारत जोड़ो यात्रा का आगाज दक्षिण भारत से शुरू किया था. कांग्रेस को कर्नाटक में सियासी फायदा मिला था, जिसका श्रेय पार्टी ने राहुल गांधी की भारत जोड़ो यात्रा को दिया. कांग्रेस इसी के मद्देनजर दक्षिण भारत के लिए एक अलग रणनीति बनाकर उतरी है, जिसमें कहीं क्षेत्रीय दल का साथ तो कहीं क्षेत्रीय दलों से सीधी जंग है. ऐसे में देखना है कि यह दांव कितना सफल रहता है?

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