धर्मेंद्र प्रधान का इस्तीफा: 5 साल 18 दिन के कार्यकाल की उपलब्धियां और विवाद

नीट पेपर लीक मामले के बीच केंद्रीय शिक्षा मंत्री धर्मेंद्र प्रधान ने इस्तीफा दे दिया है। उनके 5 साल 18 दिन के कार्यकाल में राष्ट्रीय शिक्षा नीति 2020 और सीयूईटी जैसे बड़े बदलाव हुए, लेकिन परीक्षाओं में धांधली और नीतिगत विरोधों ने उनके कार्यकाल को विवादों में भी रखा।

केंद्रीय शिक्षा मंत्री धर्मेंद्र प्रधान ने देशव्यापी नीट पेपर लीक मामले और बढ़ते राजनीतिक व सामाजिक दबाव के बीच अपने पद से इस्तीफा दे दिया है। उनका यह कार्यकाल कुल 5 साल 18 दिन का रहा। इस्तीफे की घोषणा करते हुए उन्होंने स्पष्ट किया कि वह इस पूरे प्रकरण की नैतिक जिम्मेदारी पहले दिन से ही स्वीकार कर रहे थे। गौरतलब है कि सीजेपी (CJP) के नेतृत्व में छात्र पिछले एक महीने से अधिक समय से सड़कों पर उतरकर उनके इस्तीफे की मांग कर रहे थे। इस आंदोलन को तब और मजबूती मिली जब प्रसिद्ध सामाजिक कार्यकर्ता सोनम वांगचुक ने भी छात्रों के समर्थन में अनशन किया और धर्मेंद्र प्रधान के कार्यकाल को भारतीय शिक्षा प्रणाली में बड़े बदलावों और साथ ही गंभीर नीतिगत विवादों के लिए याद किया जाएगा।

धर्मेंद्र प्रधान के कार्यकाल की प्रमुख उपलब्धियां

धर्मेंद्र प्रधान के नेतृत्व में भारतीय शिक्षा प्रणाली में कई दूरगामी सुधार लागू किए गए और इनमें सबसे प्रमुख कॉमन यूनिवर्सिटी एंट्रेंस टेस्ट (CUET-UG) की शुरुआत थी। इस परीक्षा के माध्यम से देशभर के केंद्रीय और अन्य प्रमुख विश्वविद्यालयों में स्नातक प्रवेश की प्रक्रिया को एक समान, पारदर्शी और योग्यता आधारित बनाने का प्रयास किया गया। इससे छात्रों को अलग-अलग विश्वविद्यालयों के लिए कई परीक्षाएं देने की जरूरत से मुक्ति मिली।

राष्ट्रीय शिक्षा नीति (NEP 2020) के सफल क्रियान्वयन की दिशा में पाठ्यपुस्तकों के विस्तार पर विशेष ध्यान दिया गया। एनसीईआरटी (NCERT) की नई किताबें तैयार की गईं और उनकी छपाई क्षमता को बढ़ाकर तीन गुना कर दिया गया। इस कदम का मुख्य उद्देश्य बाजार में किताबों की उपलब्धता सुनिश्चित करना और उनकी कीमतों में कमी लाना था, जिससे अभिभावकों को बड़ी राहत मिली।

उच्च शिक्षा को अंतरराष्ट्रीय स्तर पर प्रतिस्पर्धी बनाने के लिए धर्मेंद्र प्रधान के कार्यकाल में 19 विदेशी विश्वविद्यालयों को भारत में अपने कैंपस खोलने की मंजूरी दी गई। यह कदम एनईपी 2020 के तहत भारतीय छात्रों को वैश्विक शिक्षा के अवसर देश के भीतर ही उपलब्ध कराने के उद्देश्य से उठाया गया था। इसके अलावा, उच्च शिक्षा क्षेत्र में नियामक सुधारों के लिए 'विकसित भारत शिक्षा अधिष्ठान विधेयक 2025' पेश किया गया। इस विधेयक का लक्ष्य यूजीसी, एआईसीटीई और एनसीटीई जैसी संस्थाओं को मिलाकर एक एकल नियामक (Single Regulator) बनाना है ताकि प्रशासनिक जटिलताओं को कम किया जा सके।

हायर एजुकेशन सिस्टम में बदलाव के तहत मल्टीपल एंट्री-एग्जिट सिस्टम, एकेडमिक बैंक ऑफ क्रेडिट्स (ABC) और चार वर्षीय स्नातक कार्यक्रम (FYUP) को लागू करने पर विशेष जोर दिया गया। विश्वविद्यालयों में डिजिटल लर्निंग और कौशल आधारित शिक्षा को बढ़ावा देने के लिए कई महत्वपूर्ण कदम उठाए गए, जिससे छात्रों के लिए रोजगार के नए अवसर सृजित हो सकें।

कार्यकाल से जुड़े प्रमुख विवाद और चुनौतियां

उपलब्धियों के साथ-साथ धर्मेंद्र प्रधान का कार्यकाल कई बड़े विवादों से भी घिरा रहा और नीट-यूजी 2024 (NEET-UG 2024) परीक्षा में पेपर लीक और अन्य अनियमितताओं के आरोपों ने सरकार की साख पर सवाल खड़े कर दिए। यह मामला सुप्रीम कोर्ट तक पहुंचा, जहां राष्ट्रीय परीक्षा एजेंसी (NTA) की कार्यप्रणाली और परीक्षा की शुचिता पर गंभीर टिप्पणियां की गईं।

विवादों का सिलसिला यहीं नहीं थमा, नीट-यूजी 2026 (NEET-UG 2026) जैसी महत्वपूर्ण परीक्षाओं के पेपर लीक होने की खबरों ने लाखों परीक्षार्थियों के भविष्य को अधर में डाल दिया। इस घटना के कारण देशभर में छात्रों और अभिभावकों के बीच गहरा रोष देखा गया और बड़े पैमाने पर विरोध प्रदर्शन हुए। इन परीक्षाओं में हुई धांधली ने राष्ट्रीय स्तर पर परीक्षा आयोजित करने वाली एजेंसियों की विश्वसनीयता पर प्रश्नचिह्न लगा दिया।

स्कूली शिक्षा के क्षेत्र में भी कुछ तकनीकी खामियां सामने आईं। सीबीएसई की कक्षा 12वीं की परीक्षा में पहली बार लागू की गई ऑन-स्क्रीन मार्किंग (OSM) प्रणाली में तकनीकी खराबी और कॉपियों के धुंधले होने की वजह से मूल्यांकन की निष्पक्षता पर सवाल उठे। इसके अलावा, कक्षा 9 के लिए त्रिभाषा फॉर्मूले को लागू करने के फैसले का तमिलनाडु सहित कई गैर-हिंदी भाषी राज्यों ने कड़ा विरोध किया। इन राज्यों ने केंद्र सरकार पर हिंदी भाषा को थोपने का आरोप लगाया।

अंत में, उच्च शिक्षा संस्थानों में समानता लाने के उद्देश्य से पेश किए गए 'यूजीसी इक्विटी रेगुलेशन 2026' (UGC Equity Regulations 2026) को लेकर भी शिक्षा जगत और सामाजिक संगठनों में व्यापक विरोध देखने को मिला। इन तमाम उपलब्धियों और विवादों के बीच धर्मेंद्र प्रधान का 5 साल 18 दिन का कार्यकाल भारतीय शिक्षा के इतिहास में एक चर्चा का विषय बना रहेगा।