नोएल टाटा की आपत्ति खारिज: एन चंद्रशेखरन ही बने रहेंगे टाटा संस के बॉस

टाटा संस ने टाटा ट्रस्ट्स के प्रमुख नोएल टाटा की उन आपत्तियों को खारिज कर दिया है, जिसमें एन चंद्रशेखरन को दोबारा चेयरमैन बनाने का विरोध किया गया था। कंपनी ने इस फैसले को कानूनी रूप से सही ठहराया है और पूर्व न्यायाधीशों की राय का हवाला दिया है।

देश के सबसे बड़े और प्रतिष्ठित कारोबारी घरानों में से एक, टाटा ग्रुप के भीतर इन दिनों प्रशासनिक हलचल काफी तेज हो गई है। टाटा संस ने टाटा ट्रस्ट्स के चेयरमैन नोएल टाटा की उस आपत्ति को आधिकारिक तौर पर और पूरी तरह से खारिज कर दिया है, जिसमें उन्होंने एन चंद्रशेखरन की दोबारा चेयरमैन पद पर नियुक्ति पर सवाल उठाए थे। कंपनी के बोर्ड ने स्पष्ट कर दिया है कि बहुमत के आधार पर लिया गया उनका यह फैसला पूरी तरह से सही और तर्कसंगत है। इसके साथ ही, नोएल टाटा द्वारा दी गई दलीलों को कंपनी के स्थापित नियमों के विपरीत बताया गया है।

नोएल टाटा की आपत्तियों का मुख्य आधार

नोएल टाटा का मुख्य तर्क यह था कि एन चंद्रशेखरन की दोबारा नियुक्ति की प्रक्रिया में निर्धारित नियमों का पालन नहीं किया गया है और उन्होंने अपनी आपत्ति दर्ज कराते समय कंपनी के आर्टिकल 118 का विशेष रूप से हवाला दिया था। इस नियम के प्रावधानों के अनुसार, यदि टाटा ट्रस्ट्स के पास कंपनी की 40 फीसदी हिस्सेदारी होती है, तो चेयरमैन के चयन के लिए एक विशिष्ट और निर्धारित प्रक्रिया अपनानी अनिवार्य होती है। इस प्रक्रिया के तहत, सर दोराबजी टाटा ट्रस्ट और सर रतन टाटा ट्रस्ट के प्रतिनिधियों को शामिल करते हुए एक चयन समिति का गठन किया जाता है, जो चेयरमैन का चुनाव करती है। नोएल टाटा का तर्क था कि इसी चयन समिति की प्रक्रिया को दोबारा नियुक्ति के मामले में भी लागू किया जाना चाहिए था।

टाटा संस का औपचारिक और कड़ा जवाब

टाटा संस ने 24 सितंबर को नोएल टाटा को एक औपचारिक पत्र भेजकर अपनी स्थिति स्पष्ट की। इस पत्र में कंपनी ने साफ तौर पर कहा कि आर्टिकल 118 का प्रावधान केवल किसी नए चेयरमैन की पहली बार होने वाली नियुक्ति पर ही लागू होता है। कंपनी के अनुसार, यह नियम किसी वर्तमान चेयरमैन की दोबारा ताजपोशी या कार्यकाल विस्तार पर लागू नहीं होता है। बोर्ड ने स्पष्ट किया कि बहुमत से एन चंद्रशेखरन को दोबारा यह महत्वपूर्ण जिम्मेदारी सौंपने का निर्णय लिया गया है। कंपनी सचिव सुप्रकाश मुखोपाध्याय की ओर से लिखे गए इस पत्र में यह भी बताया गया कि बोर्ड द्वारा उठाया गया यह कदम पूरी तरह से कानूनी और संवैधानिक है।

दिग्गज कानूनी जानकारों ने फैसले पर लगाई मुहर

अपने निर्णय को कानूनी रूप से और अधिक मजबूती प्रदान करने के लिए टाटा संस ने देश के जाने-माने कानूनी विशेषज्ञों से विस्तृत राय ली। शुरुआत में इस मामले पर वरिष्ठ वकील सुदीप्तो सरकार की कानूनी राय ली गई थी। जब नोएल टाटा ने अपनी आपत्तियां दर्ज कराईं, तो कंपनी ने मामले की गंभीरता को देखते हुए भारत के पूर्व मुख्य न्यायाधीश यूयू ललित और सुप्रीम कोर्ट के पूर्व जज बीएन श्रीकृष्ण से भी संपर्क साधा। इन सभी कानूनी दिग्गजों ने एकमत होकर यह माना कि बोर्ड द्वारा पारित प्रस्ताव पूरी तरह से सही और नियमों के अनुकूल है। इस पत्र के साथ इन सभी कानूनी विशेषज्ञों की राय की प्रतियां भी सभी डायरेक्टर्स को भेजी गई हैं ताकि स्थिति पूरी तरह स्पष्ट रहे।

एजीएम टलने के कारणों पर स्पष्टीकरण

इस पत्र के माध्यम से 18 अगस्त को बुलाई गई सालाना आम बैठक (AGM) के स्थगित होने के कारणों पर भी प्रकाश डाला गया है। यह बैठक कोरम पूरा न होने की वजह से टालनी पड़ी थी। टाटा संस ने इस पर स्पष्टीकरण देते हुए कहा कि बैठक इसलिए टली क्योंकि टाटा ट्रस्ट्स आर्टिकल 86 के प्रावधानों के तहत अपना कोई संयुक्त प्रतिनिधि नामित करने में विफल रहे थे। कंपनी ने 17 सितंबर के बोर्ड प्रस्ताव को एजीएम के टलने की घटना से जोड़ने की किसी भी कोशिश को पूरी तरह से गलत और निराधार बताया है। अब एन चंद्रशेखरन के डायरेक्टर पद पर बने रहने की प्रक्रिया को आगे बढ़ाने के लिए कंपनी अधिनियम की धारा 152 के तहत एक नई बैठक आयोजित की जाएगी, जिसमें शेयरधारक उनके भविष्य और कार्यकाल पर अपनी अंतिम मुहर लगाएंगे।