भारतीय क्रिकेट टीम इस समय टेस्ट क्रिकेट में एक कठिन दौर से गुजर रही है, और इसका खामियाजा सीधे तौर पर मुख्य कोच गौतम गंभीर की रणनीतियों को भुगतना पड़ रहा है। गुवाहाटी टेस्ट में भारत हार की कगार पर है, और अगर साउथ अफ्रीका यह मैच जीत जाता है, तो टीम इंडिया को घरेलू मैदान पर 2-0 से क्लीन स्वीप का सामना करना पड़ेगा और यह गंभीर की कोचिंग में 13 महीने के भीतर दूसरी बार होगा जब भारत घरेलू परिस्थितियों में क्लीन स्वीप होगा, इससे पहले 2024 में न्यूजीलैंड ने भारत को 3-0 से हराया था। इस खराब प्रदर्शन के बाद गंभीर की कोचिंग पर गंभीर सवाल उठ रहे हैं, और कई पूर्व क्रिकेटरों ने टेस्ट फॉर्मेट के लिए कोच बदलने की वकालत की है।
टेस्ट में गंभीर की रणनीतिक गलतियाँ
गौतम गंभीर की कोचिंग में भारतीय टेस्ट टीम ने कई रणनीतिक गलतियाँ की हैं, जो उनके खराब प्रदर्शन का मुख्य कारण मानी जा रही हैं। इन गलतियों में विशेषज्ञ बल्लेबाजों की कमी, बल्लेबाजी क्रम में अत्यधिक प्रयोग, विकेट लेने वाले स्पिनरों का अभाव और ऑलराउंडरों पर अत्यधिक निर्भरता शामिल है, जो उम्मीद के मुताबिक प्रदर्शन नहीं कर पा रहे हैं। इन मुद्दों ने टीम की स्थिरता और प्रदर्शन को बुरी तरह प्रभावित किया है,। खासकर टेस्ट क्रिकेट के लंबे प्रारूप में जहां धैर्य और विशेषज्ञता की आवश्यकता होती है।
सिर्फ 3 स्पेशलिस्ट बैटर पर निर्भरता
गौतम गंभीर की कोचिंग में टीम इंडिया ने व्हाइट बॉल क्रिकेट के साथ-साथ रेड बॉल क्रिकेट में भी ऑलराउंडर्स पर बहुत ज्यादा जोर देना शुरू कर दिया है। इस रणनीति का सीधा असर यह हुआ है कि टीम में केवल 3 या 4 विशेषज्ञ बल्लेबाजों को ही मौका मिल पा रहा है। साउथ अफ्रीका के खिलाफ मौजूदा सीरीज में तो भारत ने दोनों टेस्ट मैचों में सिर्फ 3-3 विशेषज्ञ बल्लेबाजों को ही मैदान में उतारा। यशस्वी जायसवाल और केएल राहुल ने दोनों टेस्ट खेले, जबकि पहले टेस्ट में शुभमन गिल और दूसरे में साई सुदर्शन को मौका दिया गया। यह रणनीति तब और भी चिंताजनक हो जाती है जब मध्यक्रम के बल्लेबाज प्रदर्शन करने में विफल रहते हैं। पहले मैच में भारत के तीन विशेषज्ञ बल्लेबाज स्पिन पिच पर कुछ खास नहीं कर सके, लेकिन दूसरे मुकाबले की पहली पारी में तीनों ने मिलकर 95 रन बनाए और इसके विपरीत, नंबर 4 से 7 तक के बल्लेबाजों ने मिलकर सिर्फ 23 रन ही बनाए, जो टीम के लिए एक बड़ा झटका था। ऋषभ पंत और ध्रुव जुरेल जैसे खिलाड़ियों ने जोखिम भरे शॉट खेलने की कोशिश में। अपने विकेट गंवा दिए, जबकि टेस्ट फॉर्मेट में ऐसे शॉट्स की अक्सर आवश्यकता नहीं होती। यह दिखाता है कि टीम विशेषज्ञ बल्लेबाजों की कमी और मध्यक्रम की अस्थिरता से जूझ रही है।
बैटिंग ऑर्डर में अत्यधिक एक्सपेरिमेंट
गंभीर की कोचिंग में टीम इंडिया की नंबर-3 की बल्लेबाजी पोजिशन फिक्स नहीं हो पा रही है, जो टेस्ट क्रिकेट में एक महत्वपूर्ण स्थान होता है। साउथ अफ्रीका टेस्ट सीरीज को ही देखें तो पहले मुकाबले में वॉशिंगटन सुंदर और दूसरे में साई सुदर्शन ने नंबर-3 पर बल्लेबाजी की और इस पोजिशन पर करुण नायर को भी मौका दिया गया, लेकिन किसी भी खिलाड़ी को लंबे समय तक इस पोजिशन पर खेलने का अवसर नहीं मिला। गंभीर के कोच बनने से पहले, भारत को 25 साल तक इस पोजिशन की चिंता नहीं करनी पड़ी थी, क्योंकि पहले राहुल द्रविड़ और बाद में चेतेश्वर पुजारा ने इस स्थान को बखूबी संभाला था और कई मुश्किल परिस्थितियों में टीम को बिखरने से बचाया था। इसी तरह, नंबर-5 की पोजिशन भी टीम के लिए परेशानी का सबब बनी हुई है, जहां ऋषभ पंत, ध्रुव जुरेल और रवींद्र जडेजा जैसे खिलाड़ियों को आजमाया जा रहा है और इस पोजिशन को वीवीएस लक्ष्मण और अजिंक्य रहाणे जैसे दिग्गजों ने संभाले रखा था, लेकिन अब यहां भी बहुत ज्यादा प्रयोग हो रहे हैं, जिससे टीम में स्थिरता नहीं आ पा रही है और खिलाड़ी अपनी भूमिका को लेकर स्पष्ट नहीं हैं।
स्ट्राइक फिंगर स्पिनर की कमी
टीम इंडिया में विकेट लेने वाले फिंगर स्पिनर की भी कमी होने लगी है, जो एशियाई परिस्थितियों में भारत के दबदबे का एक प्रमुख कारण था। 2013 से 2023 तक, रविचंद्रन अश्विन और रवींद्र जडेजा की स्पिन जोड़ी ने भारत को कई जीत दिलाईं। न्यूजीलैंड से पिछले साल घर में क्लीन स्वीप के बाद भारत के दूसरे सबसे ज्यादा विकेट लेने वाले गेंदबाज रविचंद्रन अश्विन ने संन्यास ले लिया। ऑस्ट्रेलिया दौरे पर अश्विन की जगह ऑफ स्पिन ऑलराउंडर वॉशिंगटन सुंदर को प्राथमिकता दी गई, जिसके बाद अश्विन ने आगे खेलना जारी नहीं रखा। अश्विन टीम के स्ट्राइक बॉलर थे, और उनके जाने के बाद जडेजा अकेले पड़ गए हैं। नए कप्तान भी जडेजा की गेंदबाजी का उतने बेहतर तरीके से इस्तेमाल नहीं कर पा रहे हैं, जिस तरीके से एमएस धोनी और विराट कोहली करते थे। टीम मैनेजमेंट अब सुंदर और अक्षर पटेल जैसे स्पिन ऑलराउंडर्स पर ध्यान केंद्रित कर रही है, लेकिन उनमें अश्विन जैसी विकेट लेने की क्षमता नजर नहीं आती। घरेलू क्रिकेट में साई किशोर, सारांश जैन और सौरभ कुमार जैसे स्ट्राइक फिंगर स्पिनर्स मौजूद हैं, लेकिन उन्हें अंतरराष्ट्रीय स्तर पर मौका नहीं मिल रहा है, जिससे टीम को एक महत्वपूर्ण हथियार की कमी खल रही है।
13 महीने में दूसरी घरेलू सीरीज हार का खतरा
वॉशिंगटन सुंदर, अक्षर पटेल, रवींद्र जडेजा और नीतीश रेड्डी जैसे ऑलराउंडर्स की स्किल पर बहुत ज्यादा भरोसा दिखाया जा रहा है। ज्यादातर मुकाबलों में इन चार में से कम से कम तीन खिलाड़ी तो प्लेइंग-11 का हिस्सा रहते ही हैं। उनकी काबिलियत अच्छी है, लेकिन यह टेस्ट क्रिकेट में टीम इंडिया के काम नहीं आ रही है। सुंदर और अक्षर बल्ले से तो प्रभाव छोड़ पा रहे हैं, लेकिन टेस्ट टीम में एक विशेषज्ञ ऑफ स्पिनर का काम नहीं कर पा रहे हैं, यानी वे नियमित रूप से विकेट नहीं ले पा रहे और जडेजा कई बार विकेट झटक ले रहे हैं, लेकिन एशियाई परिस्थितियों में उनकी बल्लेबाजी फ्लॉप ही साबित हो रही है, जो उनकी ऑलराउंडर की भूमिका को कमजोर करती है। नीतीश रेड्डी को तो भारतीय परिस्थितियों में प्लेइंग-11 में शामिल करने का कोई मतलब ही नजर नहीं आ रहा है, क्योंकि न तो उनके बल्ले से रन आ रहे हैं और न ही वे अपनी गेंदबाजी में कमाल कर पा रहे हैं। उन्हें ज्यादा गेंदबाजी के मौके भी नहीं दिए जा रहे हैं और उनकी जगह किसी विशेषज्ञ बल्लेबाज को मौका देकर टीम ज्यादा फायदा हासिल कर सकती है, जिससे बल्लेबाजी क्रम को मजबूती मिलेगी और टीम को बेहतर संतुलन मिलेगा।
गौतम गंभीर को जुलाई 2024 में भारत का हेड कोच बनाया गया था। उनकी कोचिंग में भारत ने बांग्लादेश को 2-0 से सीरीज हराई, जो एक सकारात्मक शुरुआत थी। हालांकि, इसके बाद टीम के प्रदर्शन में गिरावट आई। न्यूजीलैंड ने 36 साल से भारत में कोई टेस्ट नहीं जीता था, लेकिन गंभीर की कोचिंग में। न्यूजीलैंड ने न सिर्फ एक मुकाबला जीता, बल्कि सीरीज में 3-0 से क्लीन स्वीप भी कर लिया। यह भारत को घरेलू कंडीशन में 12 साल बाद सीरीज हार का सामना करना पड़ा था, जो एक बड़ा झटका था। न्यूजीलैंड के खिलाफ हार के 13 महीने के अंदर ही भारत को साउथ अफ्रीका ने कोलकाता में टेस्ट हरा दिया। साउथ अफ्रीका को भारत में आखिरी जीत 15 साल पहले मिली थी। इतना ही नहीं, साउथ अफ्रीका के पास 25 साल बाद भारत में सीरीज जीत का मौका भी है, जो गंभीर की कोचिंग पर और भी सवाल खड़े करता है। यह दिखाता है कि टीम घरेलू परिस्थितियों में भी अपनी। पकड़ खो रही है, जहां वह पहले अजेय मानी जाती थी।
4 घरेलू टेस्ट हारने में 12 साल लगे थे, अब गंभीर की कोचिंग में कम समय में ही इतनी हार
गौतम गंभीर अपने 18 महीने के कोचिंग करियर में 4 घरेलू टेस्ट हार चुके हैं। अगर साउथ अफ्रीका गुवाहाटी में जीत जाती है, तो गंभीर की कोचिंग में यह 5वीं हार होगी। यह आंकड़ा चौंकाने वाला है, क्योंकि इससे पहले भारत को घर में 4 टेस्ट हारने में 12 साल लग गए थे। 2012 में डंकन फ्लेचर की कोचिंग में इंग्लैंड के खिलाफ भारत को 2-1 की सीरीज हार मिली थी। इसके बाद अनिल कुंबले की कोचिंग में ऑस्ट्रेलिया और रवि शास्त्री की कोचिंग में इंग्लैंड ने 1-1 बार हराया। वहीं, राहुल द्रविड़ की कोचिंग में 2 हार मिलीं और यानी, 12 साल में 3 अलग-अलग कोच रखने के बावजूद टीम को केवल 4 टेस्ट में हार मिली थी, और इस दौरान टीम ने 40 मैच जीते थे। वहीं, गंभीर की कोचिंग में न्यूजीलैंड और साउथ अफ्रीका ने 13 महीने में ही 4 टेस्ट हरा दिए हैं। यह और भी चिंताजनक है कि टीम ने ऑस्ट्रेलिया और इंग्लैंड जैसी मजबूत टीमों का तो अब तक घर में सामना भी नहीं किया है, जिससे भविष्य की चुनौतियां और भी बड़ी दिख रही हैं।
गंभीर ऑस्ट्रेलिया में भी जिता नहीं सके
गंभीर की कोचिंग में भारत अब तक 19 टेस्ट मैच खेल चुका है। इनमें से 5 ऑस्ट्रेलिया में, 5 इंग्लैंड में और बाकी घर में खेले गए हैं। घर में टीम ने बांग्लादेश और वेस्टइंडीज को 4 मैच हराए, लेकिन बाकी 4 मैच गंवा दिए। ऑस्ट्रेलिया में भी भारत ने कुछ खास प्रदर्शन नहीं किया। पर्थ में जसप्रीत बुमराह की कप्तानी में पहला टेस्ट जीता, लेकिन कप्तान रोहित शर्मा के लौटने के बाद सीरीज 3-1 से गंवा दी। इसी सीरीज में रविचंद्रन अश्विन ने संन्यास लिया था, और सीरीज के बाद मई में कप्तान रोहित शर्मा और दिग्गज विराट कोहली ने टेस्ट क्रिकेट को अलविदा कह दिया। इंग्लैंड में युवा कप्तान शुभमन गिल की लीडरशिप में भारत ने 5 टेस्ट की सीरीज 2-2 से ड्रॉ करा दी, लेकिन अब साउथ अफ्रीका से सीरीज हार के हालात बन गए हैं, जो गंभीर की टेस्ट कोचिंग के तहत टीम के समग्र प्रदर्शन पर सवाल खड़े करता है।
चैंपियंस ट्रॉफी और टी-20 एशिया कप जिताया
गौतम गंभीर टेस्ट में जितने खराब कोच साबित हो रहे हैं, टी-20 फॉर्मेट में उनका प्रदर्शन उतना ही बेहतरीन रहा है और वहीं, वनडे में उनका प्रदर्शन मिलाजुला रहा। टी-20 फॉर्मेट में भारत ने 1 जुलाई 2024 से 32 मैच खेले, जिनमें से 26 जीते और महज 4 गंवाए, जबकि 2 बेनतीजा रहे। टीम ने एशिया कप जीता और टूर्नामेंट में पाकिस्तान को लगातार 3 मैच भी हराए, जो उनकी टी-20 कोचिंग की सफलता को दर्शाता है और वनडे में गंभीर की कोचिंग में भारत ने इंग्लैंड को सीरीज हराई और चैंपियंस ट्रॉफी का खिताब भी जीता, जिससे उनकी सीमित ओवरों की कोचिंग क्षमताएं उजागर होती हैं। हालांकि, टीम श्रीलंका और ऑस्ट्रेलिया में सीरीज नहीं जीत सकी,। जो वनडे में उनके प्रदर्शन की अस्थिरता को दर्शाता है। यह स्पष्ट है कि गंभीर की विशेषज्ञता सफेद गेंद के क्रिकेट में अधिक है, जबकि लाल गेंद के फॉर्मेट में उन्हें चुनौतियों का सामना करना पड़ रहा है।
एक्सपर्ट भी बोले- गंभीर को टेस्ट से हटाओ
भारतीय टीम के टेस्ट में लगातार खराब प्रदर्शन के बाद, कई पूर्व क्रिकेटरों और विशेषज्ञों ने गौतम गंभीर को टेस्ट कोच के पद से हटाने की मांग की है। उनकी राय में, टीम को इस फॉर्मेट में एक नई दिशा और दृष्टिकोण की आवश्यकता है। पूर्व भारतीय क्रिकेटर अतुल वासन ने गंभीर की कोचिंग पर तीखी टिप्पणी करते हुए कहा कि हमारे बल्लेबाज स्पिन खेलना भूल गए हैं और उन्होंने कहा कि बड़े-बड़े शॉट्स खेलने की आदत ने उन्हें टेस्ट खेलना भूला दिया है। वासन ने चिंता व्यक्त की कि न्यूजीलैंड और साउथ अफ्रीका जैसी टीमें भी अब घर में भारत को हरा दे रही हैं। उन्होंने यह भी बताया कि हर सीरीज में हमारे बैटिंग कोच बदल जाते हैं, और सरफराज खान, हनुमा विहारी जैसे टेस्ट बल्लेबाजों को मौका ही नहीं मिल पा रहा है। वासन ने कहा कि वनडे और टी-20 के खिलाड़ियों को ही टेस्ट में खिलाया जा रहा है, जो सही नहीं है।
उन्होंने जोर देकर कहा कि ऑलराउंडर्स को खिलाने में दिक्कत नहीं है, लेकिन टेस्ट में आपके टॉप-5 विशेषज्ञ बल्लेबाज ही होने चाहिए। उन्होंने कहा कि स्पिन पिच पर जल्दी आउट हो गए, अब अच्छी पिच मिली तो पेसर्स को विकेट दे दिए। इससे यही साबित होता है कि आप टेस्ट को सीरियसली नहीं ले रहे। इसे सुधारने के लिए टेस्ट में तो कोच बदलना ही होगा। वासन ने राहुल द्रविड़ को फिर से लाने और चेतेश्वर। पुजारा जैसे खिलाड़ियों को प्लेइंग-11 में शामिल करने का सुझाव दिया। पूर्व इंडियन सिलेक्टर सबा करीम ने भी गंभीर की कोचिंग पर सवाल उठाते हुए कहा कि भारत के टेस्ट बल्लेबाज पार्टनरशिप करने पर ध्यान ही नहीं दे रहे हैं।
उन्होंने आश्चर्य व्यक्त किया कि बल्लेबाज टेस्ट में बड़े-बड़े शॉट्स पर क्यों फोकस कर रहे हैं, जबकि टेस्ट में पूरा दिन बल्लेबाजी करने पर ध्यान दिया जाता है। करीम ने साउथ अफ्रीका के प्रदर्शन का उदाहरण देते हुए कहा कि उन्होंने इसे बखूबी किया, लेकिन हमारी टीम पता नहीं किस सोच से खेल रही है। इन विशेषज्ञों की राय गंभीर की टेस्ट कोचिंग के तहत टीम के प्रदर्शन पर बढ़ते दबाव को दर्शाती है और यह संकेत देती है कि बदलाव की आवश्यकता महसूस की जा रही है।
