IDBI बैंक की बिक्री पर वित्त मंत्रालय का पलटवार, कहा प्रक्रिया ट्रांसपेरेंट

वित्त मंत्रालय ने IDBI बैंक की बिक्री और वैल्यूएशन प्रक्रिया का बचाव किया है। मंत्रालय का कहना है कि पूरी प्रक्रिया पारदर्शी थी और फेयरफैक्स की बोली निष्पक्ष अनुमानों से अधिक थी।

सरकार ने IDBI बैंक में अपनी हिस्सेदारी बिक्री के लिए अपनाए गए वैल्यूएशन प्रोसेस और बोली लगाने के तरीके का कड़ाई से बचाव किया है। यह कदम ऐसे समय उठाया गया है जब IDBI बैंक के निजीकरण और उसकी वैल्यूएशन को लेकर विभिन्न हलकों में सवाल उठाए जा रहे थे। वित्त मंत्रालय द्वारा दी गई आधिकारिक जानकारी के अनुसार, इस पूरी प्रक्रिया और बोली लगाने के तरीके की गहन समीक्षा विनिवेश से जुड़े सचिवों के कोर ग्रुप द्वारा की गई थी। मंत्रालय ने स्पष्ट किया है कि बैंक की बिक्री के दौरान रिजर्व प्राइस यानी न्यूनतम तय कीमत में न तो कोई कटौती की गई और न ही इसे बढ़ाया गया, बल्कि पूरी प्रक्रिया तय नियमों और स्वतंत्र वैल्यूएशन के आधार पर पूरी की गई है।

यह पूरा विवाद तब शुरू हुआ, जब IDBI बैंक की बिक्री के लिए पहले दौर में मिली बोलियां तय कीमत से कम थीं और 72% हिस्सेदारी बेच रही हैं। इस पूरी डील की कुल वैल्यू करीब 52,878 करोड़ रुपये बताई गई है। वित्त वर्ष 2025-26 के दौरान शुरुआती बोलियां आमंत्रित की गई थीं, लेकिन रिपोर्ट के मुताबिक शुरुआती दौर में मिली बोलियां 94 रुपये 42 पैसे प्रति शेयर के रिजर्व प्राइस से कम थीं। इस कारण उन शुरुआती बोलियों को मंजूरी नहीं दी गई और प्रक्रिया का वह दौर समाप्त हो गया।

दूसरी बोली प्रक्रिया और फेयरफैक्स की एंट्री

शुरुआती दौर के असफल होने के बाद सरकार ने वित्त वर्ष 2026-27 में योग्य बोलीदाताओं से उनकी सबसे अच्छी पेशकश यानी Best Offer मांगी। इस नई प्रक्रिया के तहत कनाडा की प्रमुख कंपनी फेयरफैक्स फाइनेंशियल होल्डिंग्स यानी Fairfax Financial Holdings ने 81 रुपये प्रति शेयर की बोली लगाई। सरकार ने इस प्रस्ताव को स्वीकार करते हुए मंजूरी दे दी। यहीं से विवाद खड़ा हो गया कि जब पहले रिजर्व प्राइस 94 रुपये 42 पैसे प्रति शेयर था, तो बाद में 81 रुपये प्रति शेयर की कम बोली को कैसे स्वीकार कर लिया गया? इसी सवाल और आलोचनाओं का जवाब देने के लिए वित्त मंत्रालय ने अपना विस्तृत स्पष्टीकरण जारी किया है।

वित्त मंत्रालय ने 29 अक्टूबर को जारी अपने स्पष्टीकरण में जोर देकर कहा कि IDBI बैंक की बिक्री के दौरान रिजर्व प्राइस में कोई मनमाना बदलाव नहीं किया गया था। मंत्रालय के मुताबिक, जब शुरुआती बोली प्रक्रिया में प्रस्ताव स्वीकार नहीं हुए, तो वह दौर समाप्त हो गया और उसके बाद दूसरी यानी Best Offer प्रक्रिया अपनाई गई। इस दूसरी प्रक्रिया को कैबिनेट कमेटी ऑन इकोनॉमिक अफेयर्स यानी CCEA की ओर से अधिकार प्राप्त कोर ग्रुप ऑफ सेक्रेटरीज ऑन डिसइन्वेस्टमेंट यानी CGD ने निर्धारित किया था। सरकार का यह भी कहना है कि यह प्रक्रिया किसी एक विशेष बोलीदाता को फायदा पहुंचाने के लिए नहीं बनाई गई थी, बल्कि इसका मुख्य उद्देश्य प्रतिस्पर्धी बोली के जरिए सरकार और LIC को बेहतर कीमत दिलाना था।

बैंक की वैल्यूएशन और डबल ब्लाइंड प्रक्रिया

बैंक की कीमत तय करने के तौर-तरीकों पर प्रकाश डालते हुए वित्त मंत्रालय ने बताया कि IDBI बैंक की वैल्यूएशन के लिए दो स्वतंत्र सलाहकारों की मदद ली गई थी। इन दोनों सलाहकारों ने अलग-अलग तरीकों से बैंक की उचित कीमत का आकलन किया था। बिजनेस वैल्यूएशन के लिए मार्केट मल्टीपल मेथड यानी Market Multiple Method का इस्तेमाल किया गया था, जिसमें IDBI बैंक की तुलना लिस्टेड सरकारी बैंकों से की गई। इस तरीके में किसी कंपनी की वित्तीय स्थिति और बाजार में मौजूद समान कंपनियों की वैल्यू के आधार पर उसकी उचित कीमत का अनुमान लगाया जाता है। दूसरी ओर, एसेट वैल्यूएशन के लिए एक अलग प्रक्रिया अपनाई गई, जिसमें बैंक की संपत्तियों और संभावित देनदारियों को पूरी तरह ध्यान में रखा गया। सरकार का दावा है कि ये दोनों वैल्यूएशन प्रक्रियाएं एक-दूसरे से पूरी तरह स्वतंत्र थीं और किसी एक पक्ष के प्रभाव में नहीं की गई थीं।

इस पूरी प्रक्रिया में पारदर्शिता बनाए रखने के लिए सरकार ने डबल ब्लाइंड प्रक्रिया यानी Double Blind Process का भी सहारा लिया। इसका मतलब यह था कि बोली लगाने वाली कंपनी को वैल्यूएशन की जानकारी नहीं थी और वैल्यूएशन करने वाली एजेंसियों को बोली की कीमत नहीं बताई गई थी। यह सभी संवेदनशील जानकारियां केवल कोर ग्रुप ऑफ सेक्रेटरीज ऑन डिसइन्वेस्टमेंट यानी CGD के पास सुरक्षित थीं। यह विशेष समूह बोली की कीमत और स्वतंत्र वैल्यूएशन की आपस में तुलना करके यह तय करता था कि अंतिम पेशकश उचित है या नहीं। सरकार का दावा है कि इस सख्त व्यवस्था से बोलीदाताओं और वैल्यूएशन एजेंसियों के बीच किसी भी तरह के संभावित प्रभाव या मिलीभगत को पूरी तरह रोका गया।

सरकार को मिला अतिरिक्त फायदा और भविष्य की रणनीति

वित्त मंत्रालय ने यह भी स्पष्ट किया कि इस नई बोली प्रक्रिया के जरिए सौदे की प्राप्त कीमत में 3,917 करोड़ रुपये की उल्लेखनीय बढ़ोतरी हुई। इसके साथ ही सरकार ने विवादित टैक्स मांगों से जुड़ी संभावित देनदारी के लिए खरीदार को एक सीमित सुरक्षा यानी Tax Indemnity देने की व्यवस्था भी की है। इस व्यवस्था के तहत संभावित टैक्स देनदारी करीब 627 करोड़ रुपये आंकी गई है। सरकार का यह कहना है कि यह देनदारी एक कम संभावना वाली स्थिति है और खरीदार को इसका भुगतान तभी किया जाएगा, जब संबंधित अतिरिक्त टैक्स वास्तव में चुकाना पड़ेगा।

मंत्रालय के आंकड़ों के अनुसार, 627 करोड़ रुपये की संभावित देनदारी के मुकाबले सौदे में 3,917 करोड़ रुपये की अतिरिक्त कीमत हासिल हुई है। इससे केंद्र सरकार और LIC के लिए इस सौदे की कुल वैल्यू में इजाफा हुआ है। इस डील के पूरा होने के बाद भी केंद्र सरकार और LIC की IDBI बैंक में कुछ हिस्सेदारी बनी रहेगी और सरकार के मुताबिक, बैंक के रणनीतिक पुनर्गठन और भविष्य में कारोबार बेहतर होने से इसकी वैल्यू में और तेजी आ सकती है। ऐसी सकारात्मक स्थिति में बची हुई हिस्सेदारी से केंद्र सरकार और LIC को आगे भी बड़ा फायदा मिल सकता है और इसलिए सरकार का मानना है कि यह डील सिर्फ मौजूदा हिस्सेदारी बेचने तक ही सीमित नहीं है, बल्कि यह बैंक के भविष्य के कारोबार और उसकी वैल्यू बढ़ाने की एक दीर्घकालिक रणनीति का भी एक अहम हिस्सा है।