आने वाला मंगलवार यानी 27 जनवरी, 2026 का दिन भारत के आर्थिक इतिहास में एक स्वर्णिम अध्याय के रूप में दर्ज होने जा रहा है। जिस पल का इंतजार भारतीय बाजार और उद्योग जगत पिछले एक दशक से कर रहा था, वह घड़ी अब बेहद करीब आ गई है। रॉयटर्स की एक ताजा रिपोर्ट के मुताबिक, भारत और यूरोपीय संघ (EU) के बीच बहुप्रतीक्षित मुक्त व्यापार समझौते (Free Trade Agreement) पर आखिरकार मुहर लगने जा रही है। यह सिर्फ एक कागजी समझौता नहीं है, बल्कि दुनिया के सबसे बड़े बाजारों में से एक यूरोप के दरवाजे भारतीय उत्पादों के लिए पूरी तरह खुलने जा रहे हैं। वैश्विक कूटनीति के लिहाज से देखें तो यह कदम इतना बड़ा है कि अमेरिका के राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप समेत पूरी दुनिया की नजरें इस वक्त नई दिल्ली और ब्रसेल्स पर टिकी हैं।
एक दशक का लंबा इंतजार हुआ खत्म
यह समझौता इसलिए भी खास है क्योंकि इसकी नींव काफी पहले पड़ी थी, लेकिन बातचीत करीब एक दशक तक ठंडे बस्ते में रही। साल 2022 में जब दोबारा बातचीत शुरू हुई, तो दुनिया की भू-राजनीतिक परिस्थितियां बदल चुकी थीं। बदलती वैश्विक परिस्थितियों और सप्लाई चेन को लेकर मची अफरातफरी के बीच दोनों पक्षों ने महसूस किया कि अब एक-दूसरे के साथ आना समय की मांग है और वाणिज्य मंत्रालय के एक वरिष्ठ अधिकारी के मुताबिक, बातचीत के दौरान सिर्फ व्यापार बढ़ाने पर ही जोर नहीं था, बल्कि अपनी घरेलू नीतियों को बचाने की भी बड़ी चुनौती थी। यही वजह है कि दोनों पक्ष फूंक-फूंक कर कदम रख रहे थे।
व्यापार के आंकड़ों में आएगा बड़ा उछाल
अगर हम आंकड़ों पर नजर डालें तो साल 2024-25 में भारत और ईयू के बीच करीब 130 से 136 अरब डॉलर का द्विपक्षीय व्यापार हुआ है। ईयू आज भारत के सबसे बड़े निर्यात बाजारों में से एक है, जहां भारत ने हाल के वर्षों में लगभग 75 अरब डॉलर का सामान भेजा है और इस नए समझौते के बाद उम्मीद जताई जा रही है कि यह आंकड़ा अगले कुछ वर्षों में दोगुना हो सकता है। भारत के लिए यह डील इसलिए भी महत्वपूर्ण है क्योंकि इससे यूरोपीय तकनीक और निवेश का रास्ता भी आसान होगा।
ट्रंप और वैश्विक कूटनीति पर असर
इस समझौते का सबसे दिलचस्प पहलू इसका ‘टाइमिंग’ है। वैश्विक मंच पर अक्सर देखा गया है कि पश्चिमी देश अपनी शर्तों पर व्यापार करना चाहते हैं। लेकिन इस बार भारत ने दिखा दिया है कि वह अपनी शर्तों पर अडिग रह सकता है और अमेरिका अक्सर “अमेरिका फर्स्ट” की नीति पर चलता है और कई बार टैरिफ वॉर की स्थिति पैदा करता है, लेकिन भारत ने यूरोप के साथ यह डील लॉक करके यह साबित कर दिया है कि उसके पास विकल्पों की कमी नहीं है। जब 27 जनवरी को इस समझौते पर हस्ताक्षर होंगे, तो यह वाशिंगटन के लिए भी एक बड़ा संकेत होगा। कि भारत अब एक ग्लोबल पावर है जो अपने हितों के लिए स्वतंत्र और बड़े फैसले लेने में सक्षम है।
किसानों के हितों की रक्षा
इस डील की राह में सबसे बड़ा रोड़ा ‘खेती और दूध’ का कारोबार था। यूरोपीय देश चाहते थे कि उनके दूध और कृषि उत्पादों को भारतीय बाजार में बिना किसी बाधा के बेचा जा सके और लेकिन भारत ने यहां एक सख्त ‘लक्ष्मण रेखा’ खींच दी। भारतीय वार्ताकारों ने साफ कह दिया कि हमारे करोड़ों छोटे किसानों और डेयरी उत्पादकों के हितों से कोई समझौता नहीं होगा और भारत ने अपनी मैन्युफैक्चरिंग को बचाने के लिए भी विदेशी सामान पर टैक्स अचानक कम करने के बजाय धीरे-धीरे कम करने की शर्त रखी, जिसे अंततः यूरोपीय संघ ने स्वीकार कर लिया।
पर्यावरण और कड़े नियम
यूरोप की नजर भारत के तेजी से बढ़ते कंज्यूमर मार्केट पर है। ब्रसेल्स लगातार यह दबाव बनाता रहा कि भारत यूरोपीय कारों,। ऑटो कंपोनेंट्स और मशीनों पर लगने वाले टैक्स को कम करे। हालांकि, सबसे बड़ा पेंच ‘क्लाइमेट’ यानी जलवायु परिवर्तन से जुड़े नियमों पर फंसा था। यूरोप अपने ‘ग्रीन डील’ और कार्बन बॉर्डर एडजस्टमेंट मैकेनिज्म (CBAM) को लेकर बेहद गंभीर है। उन्होंने साफ कर दिया कि व्यापार करते समय पर्यावरण से। जुड़े उनके सख्त मानकों से कोई समझौता नहीं किया जाएगा। इसका मतलब है कि भारतीय निर्यातकों को अब अपने उत्पादन के तरीकों को और अधिक पर्यावरण अनुकूल बनाना होगा।
आम आदमी और रोजगार पर प्रभाव
अब सवाल है कि इस भारी-भरकम डील का आम भारतीय पर क्या असर होगा? सरकार की कोशिश है कि इस समझौते के जरिए टेक्सटाइल (कपड़ा), चमड़ा उद्योग और इंजीनियरिंग जैसे सेक्टरों को यूरोप में बड़ा बाजार मिले। ये वो सेक्टर हैं जहां सबसे ज्यादा श्रम शक्ति की जरूरत होती है। अगर भारत का माल बिना ज्यादा टैक्स के यूरोप पहुंचता है, तो यहां उत्पादन की मांग बढ़ेगी और लाखों नए रोजगार पैदा होंगे। साथ ही, भारत को उम्मीद है कि वह यूरोपीय वैल्यू चेन का हिस्सा बन पाएगा, जिससे देश में विदेशी निवेश (FDI) की बाढ़ आ सकती है।