भारत में LPG संकट: अगले 4 साल तक रह सकती है किल्लत, कीमतों में भारी उछाल

मिडिल ईस्ट में बढ़ते तनाव और सप्लाई चेन में बाधा के कारण भारत में रसोई गैस (LPG) की किल्लत अगले 3 से 4 साल तक बनी रह सकती है। सरकारी अधिकारियों के अनुसार, स्ट्रेट ऑफ होर्मुज में रुकावट और ईरान के हमलों से आयात प्रभावित हुआ है, जिससे घरेलू और कमर्शियल सिलेंडरों के दाम बढ़ गए हैं।

सरकारी अधिकारियों के अनुसार, मिडिल ईस्ट में जारी तनाव के कारण नुकसान इतना व्यापक है कि एलपीजी (LPG) सप्लाई को पूरी तरह सामान्य होने में 3 से 4 साल का समय लग सकता है। नुकसान की सटीक सीमा अभी तक स्पष्ट नहीं है, जिससे मरम्मत और बहाली के काम में देरी हो रही है। यह स्थिति लंबे समय तक रसोई गैस की उपलब्धता और कीमतों को प्रभावित कर सकती है। मिडिल ईस्ट की टेंशन की वजह से गैस किल्लत का सामना भारत के साथ दुनिया के बाकी देश भी कर रहे हैं। लेकिन भारत के संदर्भ में, इस परेशानी का सामना अगले 3 से 4 साल तक करना पड़ सकता है।

एक सीनियर सरकारी अधिकारी ने मीडिया रिपोर्ट में बताया कि दुनिया भर में LPG सप्लाई चेन में आई रुकावट को ठीक होने में तीन से चार साल लग सकते हैं। अभी यह स्पष्ट नहीं है कि प्रोडक्शन कुछ समय के लिए रुका है या उसे हमेशा के लिए नुकसान पहुंचा है। भारत अपनी LPG सप्लाई के लिए काफी हद तक पश्चिम एशिया पर निर्भर है और अमेरिका और इजराइल की फौजी कार्रवाई के जवाब में, ईरान ने इलाके के एनर्जी इंफ्रास्ट्रक्चर पर हमले किए और स्ट्रेट ऑफ होर्मुज को ब्लॉक कर दिया, जिससे भारत की LPG सप्लाई पर बुरा असर पड़ा है। मनी कंट्रोल की रिपोर्ट में अधिकारी ने नाम न बताने की शर्त पर कहा कि सप्लायर्स से मिली जानकारी के आधार पर, सप्लाई को फिर से शुरू करने में कम से कम तीन साल या उससे भी ज्यादा समय लग सकता है।

आयात पर निर्भरता और सप्लाई चेन की चुनौतियां

भारत की LPG इंपोर्ट पर निर्भरता अभी भी काफी ज्यादा है और देश की कुल खपत का लगभग 60 प्रतिशत हिस्सा इंपोर्ट से ही पूरा होता है। जंग शुरू होने से पहले, इस सप्लाई का लगभग 90 प्रतिशत हिस्सा स्ट्रेट ऑफ होर्मुज के रास्ते से ही आता था। हालांकि, 24 मार्च तक खाड़ी देशों से होने वाले इंपोर्ट का हिस्सा घटकर 55 प्रतिशत रह गया था। यह आंकड़े दिखाते हैं कि सप्लाई में न केवल रुकावट आई है, बल्कि भारत ने सप्लाई के नए रास्ते भी खोजने शुरू कर दिए हैं और रुबिक्स डाटा साइंसेस और व्याना ट्रेड एक्सचेंज की अप्रैल में आई एक रिपोर्ट के मुताबिक, सप्लाई के रास्ते बदलने और नए सोर्स खोजने के बाद भी, सप्लाई में रुकावट का असर 40 से 50 फीसदी तक बना रह सकता है।

स्टोरेज क्षमता और कीमतों में वृद्धि

भारत में LPG की सालाना मांग लगभग 33 मिलियन टन है। रिपोर्ट के मुताबिक, मार्च के मध्य तक भारत के पास सिर्फ 15 दिनों की खपत के बराबर ही स्टोरेज क्षमता थी। ऐसे में सप्लाई के सोर्स में बदलाव होने से कम समय के लिए सप्लाई में रुकावट का रिस्क बढ़ जाता है और कीमतों में उतार-चढ़ाव का असर भी ज्यादा पड़ने लगता है और मार्च के बीच से अब तक, घरेलू सिलेंडरों की कीमतें 60 रुपये बढ़ गई हैं, जबकि इसी दौरान कमर्शियल सिलेंडरों की कीमतें 115 रुपये बढ़ गई हैं। अधिकारी ने बताया कि LPG के कुछ बहुत ही जरूरी सोर्स बंद हो गए हैं, जिसका मतलब यह हो सकता है कि या तो तेल के कुएं पूरी तरह सूख गए हैं या फिर प्रोडक्शन पूरी तरह रुक गया है।

खाड़ी देशों पर निर्भरता और सरकारी उपाय

यूएई, सऊदी अरब, कतर, कुवैत, बहरीन और ओमान ने मिलकर भारत की 92 प्रतिशत एलपीजी की सप्लाई की, जिसकी कीमत वित्त वर्ष 2025 में 6 अरब डॉलर थी। यूएई, जिसे ईरान के हमलों का सबसे ज्यादा असर झेलना पड़ा है, ने 41 फीसदी और कतर ने 22 फीसदी इंपोर्ट किया। इस रुकावट से माल ढुलाई की कॉस्ट और इंश्योरेंस प्रीमियम बढ़ गए हैं, जिससे LPG की कीमतें और बढ़ने की उम्मीद है। सरकार खपत के तरीकों को मैनेज करने और यह पक्का करने पर ध्यान दे रही है कि घरों में LPG की सप्लाई में कोई रुकावट न आए। इसके लिए COVID महामारी के दौरान किए गए वैकल्पिक इंतजामों जैसे इंपोर्ट के सोर्स बढ़ाना, जहाजों के रास्ते बदलना और देश के अंदर प्रोडक्शन बढ़ाना जैसे कदम उठाए जा रहे हैं।

प्रमुख आंकड़े और प्रभाव

LPG की ज्यादा कीमतें होटलों, रेस्टोरेंट और छोटे, मध्यम और बड़े उद्योगों जैसे कमर्शियल इस्तेमाल करने वालों पर गहरा असर डाल रही हैं। इससे घरेलू सिलेंडर्स की सप्लाई करने वाली तेल मार्केटिंग कंपनियों पर सब्सिडी का दबाव भी बढ़ रहा है। रिफाइंड पेट्रोलियम प्रोडक्ट्स का शुद्ध निर्यातक होने के बावजूद, भारत LPG, नेफ्था और फ्यूल ऑयल जैसे ईंधनों के लिए आयात पर निर्भर बना हुआ है, जिससे वह वैश्विक कीमतों में उतार-चढ़ाव और सप्लाई में रुकावटों के प्रति संवेदनशील हो जाता है।