भारतीय रिजर्व बैंक (आरबीआई) द्वारा प्लास्टिक करेंसी यानी पॉलीमर नोटों को अपनाने पर विचार किए जाने की खबर ने देश के वित्तीय गलियारों में हलचल तेज कर दी है। आरबीआई के गवर्नर संजय मल्होत्रा ने शुक्रवार को इस महत्वपूर्ण घटनाक्रम की जानकारी साझा की और उन्होंने स्पष्ट किया कि पॉलीमर नोटों को पेश करने का प्रस्ताव अभी अपने शुरुआती चरण में है और इस पर गहनता से विचार-विमर्श किया जा रहा है। हालांकि, विभिन्न रिपोर्टों के अनुसार, इस दिशा में जल्द ही एक पायलट प्रोजेक्ट की घोषणा की जा सकती है ताकि इसके व्यावहारिक पहलुओं को समझा जा सके। यह कदम भारतीय मुद्रा प्रणाली को आधुनिक बनाने और कागजी नोटों से जुड़ी समस्याओं को दूर करने की दिशा में एक बड़ा बदलाव माना जा रहा है।
10 रुपये और 20 रुपये के नोटों से हो सकती है शुरुआत
पायलट प्रोजेक्ट के शुरुआती दौर में 10 रुपये और 20 रुपये के नोटों को चुने जाने की संभावना है। इन नोटों के चयन का मुख्य कारण इनका अत्यधिक उपयोग है। चूंकि ये छोटे मूल्यवर्ग के नोट दैनिक लेनदेन में सबसे ज्यादा इस्तेमाल होते हैं, इसलिए ये बहुत जल्दी खराब हो जाते हैं, फट जाते हैं या गंदे हो जाते हैं। प्लास्टिक के नोट इन समस्याओं का एक प्रभावी समाधान हो सकते हैं और आरबीआई यह देखना चाहता है कि भारत की विविध जलवायु परिस्थितियों और भारी उपयोग के बीच ये पॉलीमर नोट कितने समय तक टिक पाते हैं।
वैश्विक परिदृश्य और ऑस्ट्रेलिया की पहल
दुनिया के करीब 60 देशों में पहले से ही प्लास्टिक करेंसी सफलतापूर्वक चलन में है। इन देशों में ऑस्ट्रेलिया, कनाडा, यूनाइटेड किंगडम, सिंगापुर, न्यूजीलैंड, मलेशिया और थाईलैंड जैसे प्रमुख नाम शामिल हैं। प्लास्टिक नोटों की शुरुआत करने का श्रेय ऑस्ट्रेलिया को जाता है, जिसने 1988 में पहली बार पॉलीमर आधारित नोट जारी किए थे। इन नोटों को अधिक सुरक्षित, टिकाऊ और नकली नोटों के खिलाफ एक मजबूत हथियार माना गया। ऑस्ट्रेलिया की प्लास्टिक करेंसी को आज भी दुनिया की सबसे मजबूत मुद्राओं में गिना जाता है, जिसकी उम्र कई वर्षों तक होती है। ऑस्ट्रेलिया की सफलता के बाद, कनाडा ने 2011 में अपने बैंक नोटों को पॉलीमर में बदल दिया और धीरे-धीरे यूरोप के कई अन्य देशों ने भी इस तकनीक को अपनाया।
प्लास्टिक नोटों के तकनीकी और व्यावहारिक फायदे
विशेषज्ञों का मानना है कि प्लास्टिक नोट कई मायनों में पारंपरिक कागजी नोटों से बेहतर होते हैं। इनका सबसे बड़ा लाभ इनकी लंबी उम्र है। जहां सामान्य कागजी नोट 2 से 3 साल के भीतर खराब हो जाते हैं, वहीं प्लास्टिक नोट 5 से 10 साल या उससे भी अधिक समय तक सुरक्षित रह सकते हैं। इसके अलावा, ये नोट पानी, नमी और धूल से प्रभावित नहीं होते हैं और बार-बार इस्तेमाल किए जाने के बावजूद इनके फटने की संभावना बहुत कम होती है, जिससे नए नोट छापने की आवश्यकता कम हो जाती है और पर्यावरण पर भी सकारात्मक प्रभाव पड़ता है।
नकली नोटों के कारोबार पर लगेगी लगाम
सुरक्षा के दृष्टिकोण से भी प्लास्टिक नोट अत्यंत महत्वपूर्ण हैं। आरबीआई की हालिया रिपोर्ट में 500 रुपये के नकली नोटों की बढ़ती संख्या पर चिंता व्यक्त की गई थी। पॉलीमर नोटों में विशेष सुरक्षा फीचर्स को शामिल करना आसान होता है, जिनकी नकल करना जालसाजों के लिए लगभग असंभव होता है। विशेषज्ञों का कहना है कि यदि भारत में प्लास्टिक करेंसी लागू होती है, तो इससे फेक करेंसी के अवैध कारोबार पर बड़ी चोट पहुंचेगी और देश की नकदी प्रणाली पहले से कहीं अधिक सुरक्षित हो जाएगी।
छपाई लागत में भारी कमी की संभावना
भारत में हर साल नोटों की छपाई और उनके रखरखाव पर हजारों करोड़ रुपये का खर्च आता है। खराब हो चुके नोटों को वापस लेना, उन्हें नष्ट करना और फिर से नए नोट छापना एक बहुत ही खर्चीली प्रक्रिया है। वित्त वर्ष 2024-25 में भी बड़ी संख्या में खराब नोटों को चलन से बाहर करना पड़ा था। प्लास्टिक नोटों की लंबी उम्र के कारण आरबीआई को बार-बार नोट छापने की जरूरत नहीं पड़ेगी, जिससे सरकारी खजाने पर बोझ कम होगा और लागत में बड़ी बचत होगी।
घबराने की आवश्यकता नहीं: चरणबद्ध तरीके से होगा बदलाव
विशेषज्ञों ने जनता को आश्वस्त किया है कि यदि भविष्य में प्लास्टिक नोट लागू किए जाते हैं, तो यह प्रक्रिया पूरी तरह से चरणबद्ध होगी और कागजी नोटों को अचानक बंद नहीं किया जाएगा, बल्कि दोनों प्रकार की करेंसी कुछ समय तक साथ-साथ चलन में रह सकती हैं। फिलहाल आरबीआई केवल इस विकल्प की व्यवहार्यता पर विचार कर रहा है। यदि यह योजना सफल रहती है, तो भारत की मुद्रा व्यवस्था में एक बड़ा तकनीकी और संरचनात्मक बदलाव देखने को मिलेगा, जैसा कि दुनिया के कई विकसित देशों में पहले ही हो चुका है।
