भारत की अर्थव्यवस्था के लिए कच्चे तेल की बढ़ती कीमतें एक बड़ी चुनौती बनकर उभरी हैं। चालू वित्त वर्ष की पहली तिमाही यानी अप्रैल से जून के बीच भारत का कच्चा तेल आयात बिल 61 प्रतिशत की भारी बढ़ोतरी के साथ 49 अरब 80 करोड़ डॉलर के स्तर पर पहुंच गया है। चौंकाने वाली बात यह है कि इस दौरान भारत ने पिछले साल की तुलना में कम मात्रा में कच्चे तेल का आयात किया है, लेकिन अंतरराष्ट्रीय बाजार में कीमतों में आए जबरदस्त उछाल ने सरकारी खजाने पर बोझ काफी बढ़ा दिया है।
आयात की मात्रा और खर्च का विस्तृत विश्लेषण
पेट्रोलियम प्लानिंग एंड एनालिसिस सेल यानी पीपीएसी द्वारा जारी किए गए आंकड़ों के अनुसार, अप्रैल से जून की तिमाही में भारत ने कुल 59 मिलियन 8 लाख टन कच्चे तेल का आयात किया। यदि इसकी तुलना पिछले साल की इसी अवधि से की जाए, तो उस समय यह आंकड़ा 62 मिलियन 6 लाख टन था। इसका अर्थ यह है कि आयात की मात्रा में लगभग 4 प्रतिशत की गिरावट दर्ज की गई है। इसके बावजूद, कुल आयात बिल में 61 प्रतिशत की वृद्धि होना यह दर्शाता है कि वैश्विक बाजार में तेल की कीमतें किस कदर हावी रही हैं।
अगर हम केवल जून महीने के आंकड़ों पर नजर डालें, तो स्थिति और भी स्पष्ट हो जाती है। जून में भारत ने 18 मिलियन 9 लाख टन कच्चे तेल का आयात किया, जो पिछले साल के जून महीने की तुलना में 7 प्रतिशत कम है। हालांकि, कम मात्रा के बावजूद जून का आयात बिल 48 प्रतिशत बढ़कर 14 अरब 70 करोड़ डॉलर हो गया। यह आंकड़े बताते हैं कि अंतरराष्ट्रीय बाजार में कीमतों की अस्थिरता का सीधा असर भारत के व्यापार संतुलन पर पड़ रहा है।
वैश्विक तनाव और कीमतों में उछाल के कारण
आयात बिल में इस भारी बढ़ोतरी की सबसे बड़ी वजह अंतरराष्ट्रीय बाजार में कच्चे तेल की कीमतों में आया तेज उछाल है। अप्रैल और मई के महीनों के दौरान ब्रेंट क्रूड ऑयल की कीमत कई मौकों पर 100 डॉलर प्रति बैरल के आंकड़े को पार कर गई थी। विशेषज्ञों का मानना है कि अमेरिका और ईरान के बीच बढ़ते सैन्य तनाव और हॉर्मुज जलडमरूमध्य के बंद होने की आशंकाओं ने तेल की कीमतों में आग लगा दी। हॉर्मुज जलडमरूमध्य दुनिया के सबसे महत्वपूर्ण तेल परिवहन मार्गों में से एक है और यहां किसी भी प्रकार की रुकावट वैश्विक तेल आपूर्ति को बाधित कर देती है।
इस तिमाही के दौरान कीमतों में काफी उतार-चढ़ाव देखा गया। अप्रैल की शुरुआत में युद्धविराम की खबरों के चलते ब्रेंट क्रूड की कीमत गिरकर 90 डॉलर प्रति बैरल तक आ गई थी, लेकिन महीने के अंत तक तनाव बढ़ने के कारण यह 126 डॉलर प्रति बैरल से भी ऊपर निकल गई। मई में भी कीमतें लंबे समय तक 110 डॉलर प्रति बैरल से ऊपर बनी रहीं। हालांकि जून में औसत कीमत घटकर 83 डॉलर 22 सेंट प्रति बैरल पर आ गई, लेकिन शुरुआती महीनों की ऊंची कीमतों ने पूरी तिमाही के आयात बिल को बिगाड़ दिया।
भारतीय अर्थव्यवस्था पर पड़ने वाला प्रभाव
भारत अपनी ऊर्जा जरूरतों का 85 प्रतिशत से अधिक हिस्सा विदेशों से आयात किए गए कच्चे तेल से पूरा करता है। यही कारण है कि अंतरराष्ट्रीय बाजार में तेल की कीमतों में होने वाली मामूली बढ़ोतरी भी देश की अर्थव्यवस्था पर गहरा असर डालती है और यदि कच्चे तेल की कीमतें लंबे समय तक उच्च स्तर पर बनी रहती हैं, तो इससे भारत का आयात बिल और चालू खाता घाटा बढ़ सकता है, जिससे देश में महंगाई बढ़ने का खतरा भी पैदा हो जाता है।
भारत हर साल लगभग 1 अरब 80 करोड़ से 2 अरब बैरल कच्चे तेल का आयात करता है। आर्थिक गणना के अनुसार, यदि कच्चे तेल की कीमत में प्रति बैरल 1 डॉलर की भी बढ़ोतरी होती है, तो देश का वार्षिक आयात बिल लगभग 2 अरब डॉलर तक बढ़ सकता है। यह स्थिति स्पष्ट करती है कि क्यों कच्चे तेल की कीमतों में आया यह 61 प्रतिशत का उछाल भारत की आर्थिक स्थिरता के लिए एक गंभीर चिंता का विषय है।
