अमेरिका के एक वरिष्ठ अधिकारी ने हूवर इंस्टीट्यूशन में भारत पर आयोजित एक महत्वपूर्ण गोलमेज बैठक के दौरान दोनों देशों के बीच बढ़ते रणनीतिक संबंधों पर विस्तार से चर्चा की। इस बैठक में विशेष रूप से डिफेंस और सिविल न्यूक्लियर सेक्टर में चल रहे सहयोग को रेखांकित किया गया। इस उच्च स्तरीय कार्यक्रम में अमेरिका की पूर्व विदेश मंत्री कोंडोलीजा राइस और भारत में अमेरिका के पूर्व राजदूत डेविड सी. मुलफोर्ड जैसे दिग्गज भी शामिल हुए, जो इस द्विपक्षीय वार्ता के महत्व को दर्शाता है।
रणनीतिक और तकनीकी क्षेत्रों में बढ़ता सहयोग
अमेरिका के असिस्टेंट सेक्रेटरी ऑफ स्टेट एस. पॉल कपूर ने गोलमेज बैठक को संबोधित करते हुए कहा कि अमेरिका और भारत रक्षा, सिविल न्यूक्लियर एनर्जी और भरोसेमंद आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस (AI) जैसी उभरती हुई तकनीकों के क्षेत्र में अपने सहयोग को नई ऊंचाइयों पर ले जा रहे हैं। कपूर ने सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म X पर अपनी पोस्ट में स्पष्ट किया कि इस प्रशासन के तहत भारत के साथ अमेरिका का जुड़ाव न केवल कूटनीतिक है, बल्कि यह अमेरिका में नौकरियां पैदा कर रहा है। उन्होंने यह भी बताया कि यह साझेदारी उन सप्लाई चेन को मजबूत कर रही है जो अमेरिका और इस पूरे क्षेत्र की सुरक्षा और अर्थव्यवस्था के लिए अत्यंत आवश्यक हैं।
रक्षा साझेदारी और सैन्य उपकरणों की आपूर्ति
भारत और अमेरिका के बीच रक्षा संबंधों को पिछले साल तब और मजबूती मिली जब दोनों देशों ने एक व्यापक रक्षा साझेदारी के लिए फ्रेमवर्क पर हस्ताक्षर किए। इस समझौते का मुख्य उद्देश्य जमीन, समुद्र, हवा, अंतरिक्ष और साइबरस्पेस जैसे सभी महत्वपूर्ण क्षेत्रों में आपसी तालमेल और काम करने की क्षमता यानी इंटरऑपरेबिलिटी को बढ़ाना है। साल 2002 से ही भारत ने अमेरिका से कई अत्याधुनिक रक्षा उपकरण खरीदे हैं। इन उपकरणों में अपाचे और चिनूक हेलीकॉप्टर, C-17 ग्लोबमास्टर III और C-130J सुपर हरक्यूलिस जैसे विशाल परिवहन विमान शामिल हैं। इसके अलावा भारत ने P-8I मैरीटाइम पेट्रोल एयरक्राफ्ट और M777 अल्ट्रा-लाइट होवित्ज़र तोपें भी हासिल की हैं, जिन्होंने भारतीय सेना की ताकत को कई गुना बढ़ा दिया है।
सिविल न्यूक्लियर सेक्टर और शांति कानून का प्रभाव
सिविल न्यूक्लियर सेक्टर में भी दोनों देशों के बीच सहयोग के नए द्वार खुल रहे हैं। अमेरिकी परमाणु ऊर्जा कंपनियां भारत के इस क्षेत्र में अपनी मौजूदगी बढ़ाने के लिए काफी उत्सुक हैं। इसी साल की शुरुआत में अमेरिकी परमाणु उद्योग के बड़े अधिकारियों के एक प्रतिनिधिमंडल ने भारत का दौरा किया था ताकि प्राइवेट सेक्टर के साथ मिलकर काम करने के नए मौकों की तलाश की जा सके। यह सक्रियता भारत सरकार द्वारा 'शांति' (SHANTI) कानून के माध्यम से सिविल न्यूक्लियर लायबिलिटी नियमों को आसान बनाने के फैसले के बाद देखी गई है। इस कानून ने विदेशी कंपनियों के लिए भारत में निवेश और तकनीक साझा करने की राह को और अधिक सुगम बना दिया है।
व्यापारिक नीतियां और टैरिफ में संशोधन
व्यापार के मोर्चे पर भी हाल ही में कुछ महत्वपूर्ण बदलाव हुए हैं। 24 जुलाई को अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप ने भारत सहित 17 देशों से होने वाले आयात पर 10 प्रतिशत का टैरिफ लगाया था। यह कदम जबरन मजदूरी से तैयार किए गए सामानों के खिलाफ एक वैश्विक कार्रवाई का हिस्सा था और शुरुआत में भारत को उस श्रेणी में रखा गया था जहां 12 प्रतिशत 50 पैसे का भारी शुल्क लगना था। हालांकि, जब भारत ने अपनी विदेश व्यापार नीति में संशोधन किया और जबरन मजदूरी से बने उत्पादों के आयात पर स्पष्ट प्रतिबंध लगा दिया, तो वाशिंगटन ने इस सकारात्मक कदम का संज्ञान लिया। इसके बाद भारत के लिए टैरिफ की दर को घटाकर 10 प्रतिशत कर दिया गया, जो दोनों देशों के बीच व्यापारिक समझ और सहयोग को दर्शाता है।
