कर्नाटक के कलबुर्गी जिले से एक महत्वपूर्ण कानूनी घटनाक्रम सामने आया है। कर्नाटक हाई कोर्ट ने आलंद टाउन में स्थित हजरत शेख अलाउद्दीन अंसारी दरगाह परिसर के भीतर मौजूद राघव चैतन्य शिवलिंग पर महाशिवरात्रि के अवसर पर पूजा करने की अनुमति प्रदान की है। न्यायमूर्ति की अध्यक्षता वाली पीठ ने सिद्ध रामैया हीरेमठ द्वारा दायर याचिका पर सुनवाई करते हुए यह आदेश पारित किया। कोर्ट के इस निर्णय को हिंदू पक्ष के लिए एक बड़ी कानूनी राहत के रूप में देखा जा रहा है, जो पिछले कई वर्षों से इस स्थल पर पूजा के अधिकार की मांग कर रहे थे।
न्यायिक आदेश और पूजा की शर्तें
कर्नाटक हाई कोर्ट ने अपने आदेश में स्पष्ट किया है कि महाशिवरात्रि के दिन हिंदू समुदाय के केवल 15 सदस्यों को ही दरगाह परिसर के भीतर प्रवेश करने और राघव चैतन्य शिवलिंग पर धार्मिक अनुष्ठान करने की अनुमति होगी। यह अनुमति एक निश्चित समयावधि के लिए दी गई है ताकि कानून-व्यवस्था की स्थिति बनी रहे और कोर्ट ने स्थानीय प्रशासन और पुलिस विभाग को निर्देश दिया है कि वे पूजा के दौरान सुरक्षा के कड़े प्रबंध सुनिश्चित करें। पिछले वर्ष भी इसी तरह के अंतरिम आदेश के तहत पूजा संपन्न हुई थी, जिसे आधार बनाकर इस वर्ष भी अनुमति प्रदान की गई है।
सुप्रीम कोर्ट का हस्तक्षेप से इनकार
हाई कोर्ट के फैसले के खिलाफ दरगाह कमेटी ने सुप्रीम कोर्ट का रुख किया था। दरगाह कमेटी की ओर से दायर याचिका में तर्क दिया गया था कि किसी धार्मिक स्थल के भीतर पूजा की अनुमति देना उस स्थान के मूल चरित्र को बदलने का एक समन्वित प्रयास हो सकता है। हालांकि, भारत के मुख्य न्यायाधीश की अध्यक्षता वाली पीठ ने इस मामले में तत्काल हस्तक्षेप करने से इनकार कर दिया। सुप्रीम कोर्ट ने टिप्पणी की कि यदि प्रत्येक मामले की सुनवाई सीधे शीर्ष अदालत में होने लगेगी, तो इससे उच्च न्यायालयों के अधिकार क्षेत्र और उनकी प्रासंगिकता पर नकारात्मक प्रभाव पड़ेगा। कोर्ट ने स्पष्ट किया कि मामला फिलहाल उच्च न्यायालय के विचाराधीन है और वहीं इसका समाधान होना चाहिए।
विवाद की ऐतिहासिक पृष्ठभूमि और धार्मिक महत्व
विवाद के केंद्र में स्थित यह स्थल 14वीं शताब्दी के प्रसिद्ध सूफी संत हजरत शेख अलाउद्दीन अंसारी, जिन्हें लाडले मशाइक के नाम से भी जाना जाता है, और 15वीं शताब्दी के हिंदू संत राघव चैतन्य से जुड़ा है। ऐतिहासिक दस्तावेजों और स्थानीय मान्यताओं के अनुसार, इस परिसर में दोनों संतों के अवशेष मौजूद हैं। राघव चैतन्य शिवलिंग नामक संरचना इसी परिसर का हिस्सा है। कई दशकों तक दोनों समुदायों के लोग यहां शांतिपूर्वक अपने धार्मिक अनुष्ठान करते रहे हैं। हालांकि, वर्ष 2022 में उस समय तनाव बढ़ गया जब शिवलिंग के कथित अपमान की खबरें सामने आईं, जिसके बाद से यह मामला कानूनी विवादों में घिर गया।
प्रशासनिक सुरक्षा और स्थानीय विश्लेषण
कानूनी विशेषज्ञों और विश्लेषकों के अनुसार, कोर्ट का यह आदेश धार्मिक स्वतंत्रता और सार्वजनिक व्यवस्था के बीच संतुलन बनाने का एक प्रयास है। स्थानीय प्रशासन ने आलंद टाउन में सुरक्षा व्यवस्था को चाक-चौबंद कर दिया है। पुलिस महानिरीक्षक के अनुसार, संवेदनशील क्षेत्रों में अतिरिक्त बल तैनात किया गया है और सीसीटीवी कैमरों के माध्यम से निगरानी रखी जा रही है। शांति समिति की बैठकों के माध्यम से दोनों समुदायों के प्रतिनिधियों से सौहार्द बनाए रखने की अपील की गई है। विश्लेषकों का मानना है कि इस तरह के अंतरिम आदेश भविष्य में इस विवाद के स्थायी समाधान के लिए एक कानूनी आधार तैयार कर सकते हैं।
निष्कर्ष और भविष्य की दिशा
कलबुर्गी का यह मामला भारत में साझा धार्मिक स्थलों पर अधिकारों के संघर्ष का एक उदाहरण है। कर्नाटक हाई कोर्ट का वर्तमान आदेश केवल महाशिवरात्रि के पर्व तक सीमित है और यह स्थल के मालिकाना हक या स्थायी धार्मिक चरित्र पर कोई अंतिम निर्णय नहीं देता है। आने वाले समय में, उच्च न्यायालय इस मामले के मूल तथ्यों और ऐतिहासिक साक्ष्यों की विस्तृत जांच करेगा। फिलहाल, प्रशासन की प्राथमिकता बिना किसी अप्रिय घटना के पूजा संपन्न कराना और क्षेत्र में सांप्रदायिक सद्भाव सुनिश्चित करना है।
