Congress Left Leaders / कांग्रेस से जाने वाले नेताओं ने क्या पाया, जो जननायक थे वे प्रधानमंत्री तक बने और जो कागजी थे वे...

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कांग्रेस से जाने वाले नेताओं ने क्या पाया, जो जननायक थे वे प्रधानमंत्री तक बने और जो कागजी थे वे...
कांग्रेस से जाने वाले नेताओं ने क्या पाया, जो जननायक थे वे प्रधानमंत्री तक बने और जो कागजी थे वे...
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जयप्रकाश नारायण
जयप्रकाश नारायण
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मोरारजी देसाई
मोरारजी देसाई
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विश्वनाथ प्रताप सिंह
विश्वनाथ प्रताप सिंह
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चन्द्रशेखर
चन्द्रशेखर
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चौधरी चरण सिंह
चौधरी चरण सिंह
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बाबू जगजीवन राम
बाबू जगजीवन राम
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देवी लाल
देवी लाल
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ममता बैनर्जी
ममता बैनर्जी
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के. चन्द्रशेखर राव
के. चन्द्रशेखर राव
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शरद पवार
शरद पवार
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बंशीलाल
बंशीलाल
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चन्द्रबाबू नायडू
चन्द्रबाबू नायडू
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जगन मोहन रेड्डी
जगन मोहन रेड्डी
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ज्योतिरादित्य सिंधिया
ज्योतिरादित्य सिंधिया
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रीता बहुगुणा जोशी
रीता बहुगुणा जोशी
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हेमंत बिस्वा शर्मा
हेमंत बिस्वा शर्मा
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जगदंबिका पाल
जगदंबिका पाल
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चौधरी बीरेंद्र सिंह
चौधरी बीरेंद्र सिंह
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राधाकृष्ण विखे पाटिल
राधाकृष्ण विखे पाटिल
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नारायण राणे
नारायण राणे
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एस एम कृष्णा
एस एम कृष्णा
Zoom News : Jul 14, 2020, 01:34 PM

Political Desk | पिता राजेश पायलट की विरासत को आगे बढ़ाने वाले सचिन पायलट को पीसीसी चीफ के पद से बर्खास्त कर दिया गया है। कांग्रेस से बड़े नेताओं के अलग होने का सिलसिला नया नहीं है। बदलती राजनीतिक परीस्थितियों में कई नेताओं ने कांग्रेस को अलविदा कहा है। कई लोगों ने कांग्रेस छोड़ी, कुछ को कांग्रेस ने निकाला। कइयों ने अपने दल बनाए और कई दूसरे दल में गए। ऐसे में इनकी राजनीति का उंट किस करवट बैठा। नजर डालते हैं इतिहास पर! कई नेता ऐसे रहे समय के साथ खो गए, लेकिन कई नेता ऐसे भी हैं जिन्होंने कांग्रेस छोड़ने के बाद प्रधानमंत्री तक का पद पाया है। हम आपको बताने जा रहे हैं कांग्रेस छोड़कर गए ऐसे जननेताओं की कहानियां जो बाद में सफल हुए या जिनकी राजनीतिक पारी बहुत शानदार रही है। 

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नेतृत्व संकट की बात करते हुए कांग्रेस को कई बड़े नेताओं ने त्यागा है। 4 लोग कांग्रेस छोड़ने के बाद इस देश में प्रधानमंत्री भी बने हैं या बड़े पदों पर पहुंचे हैं। या जिन्होंने भारत की राजनीति को नई दिशा दी है। इनमें ऐसे नेता जिनके पास जनता का स्नेह और समर्थन था, वे बड़े पदों तक पहुंचे हैं। आइए कुछ नाम गिनाते हैं।

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जयप्रकाश नारायण (11 अक्टूबर, 1902 - 8 अक्टूबर, 1979) (संक्षेप में जेपी) भारतीय स्वतंत्रता सेनानी और राजनेता थे। वे कांग्रेसी थे, लेकिन देश के लिए कांग्रेस से बगावत की और पार्टी को सत्ता से बाहर कर दिया। इन्दिरा गांधी को पदच्युत करने के लिये उन्होने 'सम्पूर्ण क्रांति' नामक आन्दोलन चलाया। वे समाज-सेवक थे, जिन्हें 'लोकनायक' के नाम से भी जाना जाता है। 1999 में उन्हें मरणोपरान्त भारत रत्न से सम्मनित किया गया। इसके अतिरिक्त उन्हें समाजसेवा के लिए 1965 में मैगससे पुरस्कार प्रदान किया गया था। पटना के हवाई अड्डे का नाम उनके नाम पर रखा गया है। दिल्ली सरकार का सबसे बड़ा अस्पताल 'लोकनायक जयप्रकाश अस्पताल' भी उनके नाम पर है।

1948 में उन्होंने कांग्रेस के समाजवादी दल का नेतृत्व किया और बाद में गांधीवादी दल के साथ मिलकर समाजवादी सोशलिस्ट पार्टी की स्थापना की। 19 अप्रील, 1954 में गया, बिहार में उन्होंने विनोबा भावे के सर्वोदय आन्दोलन के लिए जीवन समर्पित करने की घोषणा की। 1957 में उन्होंने लोकनीति के पक्ष में राजनीति छोड़ने का निर्णय लिया। आजादी के आन्दोलन के समय जेपी नेहरू के बाद नम्बर टू पर थे। जब पटेल, नेहरू, गांधी ​गिरफ्तारी में होते तो जेपी आन्दोलन को चलाते। वे इंदिरा गांधी की प्रशासनिक नीतियों के विरुद्ध थे। गिरते स्वास्थ्य के बावजूद उन्होंने बिहार में सरकारी भ्रष्टाचार के खिलाफ आन्दोलन किया। लोकनायक का दर्जा प्राप्त जेपी की एक आवाज पर देश उठ खड़ा हुआ। उनके नेतृत्व में पीपुल्स फ्रंट ने गुजरात राज्य का चुनाव जीता। 1975 में इंदिरा गांधी ने आपातकाल की घोषणा की जिसके अन्तर्गत जे॰ पी॰ सहित 600 से भी अधिक विरोधी नेताओं को बन्दी बनाया गया और प्रेस पर सेंसरशिप लगा दी गयी। जेल में जे॰ पी॰ की तबीयत और भी खराब हुई। 7 महीने बाद उनको मुक्त कर दिया गया। 1977 जेपी के प्रयासों से एकजुट विरोध पक्ष ने इंदिरा गांधी को चुनाव में हरा दिया।


मोरारजी देसाई भारत के स्वाधीनता सेनानी और देश के 4th प्रधानमंत्री (सन् 1977 से 79) थे। वह प्रथम प्रधानमंत्री थे जो भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस के बजाय अन्य दल से थे। वही एकमात्र व्यक्ति हैं जिन्हें भारत के सर्वोच्च सम्मान भारत रत्न एवं पाकिस्तान के सर्वोच्च सम्मान निशान-ए-पाकिस्तान से सम्मानित किया गया है।

पण्डित जवाहर लाल नेहरू के समय कांग्रेस में जो अनुशासन था, वह उनकी मृत्यु के बाद बिखरने लगा। कई सदस्य स्वयं को पार्टी से बड़ा समझते थे। मोरारजी देसाई भी उनमें से एक थे। श्री लालबहादुर शास्त्री ने कांग्रेस पार्टी के वफ़ादार सिपाही की भाँति कार्य किया था। उन्होंने पार्टी से कभी भी किसी पद की मांग नहीं की थी। 

लेकिन इस मामले में मोरारजी देसाई अपवाद में रहे। कांग्रेस संगठन के साथ उनके मतभेद जगज़ाहिर थे और देश का प्रधानमंत्री बनना इनकी प्राथमिकताओं में शामिल था। इंदिरा गांधी ने जब यह समझ लिया कि मोरारजी देसाई उनके लिए कठिनाइयाँ पैदा कर रहे हैं तो उन्होंने मोरारजी के पर कतरना आरम्भ कर दिया। इस कारण उनका क्षुब्ध होना स्वाभाविक था। नवम्बर 1969 में जब कांग्रेस का विभाजन कांग्रेस-आर और कांग्रेस-ओ के रूप में हुआ तो मोरारजी देसाई इंदिरा गांधी की कांग्रेस-आई के बजाए सिंडीकेट के कांग्रेस-ओ में चले गए। फिर 1975 में वह जनता पार्टी में शामिल हो गए। मार्च 1977 में जब लोकसभा के चुनाव हुए तो जनता पार्टी को स्पष्ट बहुमत प्राप्त हो गया। परन्तु यहाँ पर भी प्रधानमंत्री पद के दो अन्य दावेदार उपस्थित थे-चौधरी चरण सिंह और जगजीवन राम। लेकिन जयप्रकाश नारायण जो स्वयं कभी कांग्रेसी हुआ करते थे, उन्होंने किंग मेकर की अपनी स्थिति का लाभ उठाते हुए मोरारजी देसाई का समर्थन किया। इसके बाद 23 मार्च 1977 को 81 वर्ष की अवस्था में मोरारजी देसाई ने भारतीय प्रधानमंत्री का दायित्व ग्रहण किया। इनके प्रधानमंत्रित्व के आरम्भिक काल में, देश के जिन नौ राज्यों में कांग्रेस का शासन था, वहाँ की सरकारों को भंग कर दिया गया और राज्यों में नए चुनाव कराये जाने की घोषणा भी करा दी गई। यह अलोकतांत्रिक और असंवैधानिक कार्य था। जनता पार्टी, इंदिरा गांधी और उनकी समर्थित कांग्रेस का देश से सफ़ाया करने को कृतसंकल्प नज़र आई। लेकिन इस कृत्य को बुद्धिजीवियों द्वारा सराहना प्राप्त नहीं हुई।

वह 81 वर्ष की आयु में प्रधानमंत्री बने थे। इसके पूर्व कई बार उन्होंने प्रधानमंत्री बनने की कोशिश की परंतु असफल रहे। लेकिन ऐसा नहीं हैं कि मोरारजी प्रधानमंत्री बनने के क़ाबिल नहीं थे। वस्तुत: वह दुर्भाग्यशाली रहे कि वरिष्ठतम नेता होने के बावज़ूद उन्हें पंडित नेहरू और लालबहादुर शास्त्री के निधन के बाद भी प्रधानमंत्री नहीं बनाया गया। मोरारजी देसाई मार्च 1977 में देश के प्रधानमंत्री बने लेकिन प्रधानमंत्री के रूप में इनका कार्यकाल पूर्ण नहीं हो पाया। चौधरी चरण सिंह से मतभेदों के चलते उन्हें प्रधानमंत्री पद छोड़ना पड़ा। इनका बाद का जीवन राजनीतिक निर्वासन में ही गुजरा।

छात्र जीवन से ही वे भारतीय कांग्रेस पार्टी के साथ थे। 1969-1971 में वह उत्तर प्रदेश विधानसभा में पहुँचे। उन्होंने उत्तर प्रदेश में मुख्यमंत्री का कार्यभार भी सम्भाला। उनका मुख्यमंत्री कार्यकाल 9 जून 1980 से 28 जून 1982 तक ही रहा। इसके पश्चात्त वह 29 जनवरी 1983 को केन्द्रीय वाणिज्य मंत्री बने। विश्वनाथ प्रताप सिंह राज्यसभा के भी सदस्य रहे। 31 दिसम्बर 1984 को वह भारत के वित्तमंत्री भी बने। भारतीय राजनीति के परिदृश्य में विश्वनाथ प्रताप सिंह उस समय वित्तमंत्री थे जब राजीव गांधी के साथ में उनका टकराव हुआ।

विश्वनाथ प्रताप सिंह के पास यह सूचना थी कि कई भारतीयों द्वारा विदेशी बैंकों में अकूत धन जमा करवाया गया है। इस पर वी.पी. सिंह अर्थात् विश्वनाथ प्रताप सिंह ने अमेरिका की एक जासूस संस्था फ़ेयरफ़ैक्स की नियुक्ति कर दी ताकि ऐसे भारतीयों का पता लगाया जा सके। इसी बीच स्वीडन ने 16 अप्रैल 1987 को यह समाचार प्रसारित किया कि भारत के बोफोर्स कम्पनी की 410 तोपों का सौदा हुआ था, उसमें 60 करोड़ की राशि कमीशन के तौर पर दी गई थी। जब यह समाचार भारतीय मीडिया तक पहुँचा, यह 'समाचार' संसद में मुद्दा बन कर उभरा। इससे जनता को यह पता चला कि 60 करोड़ की दलाली में राजीव गांधी का हाथ था।

बोफोर्स कांड के सुर्खियों में रहते हुए 1989 के चुनाव भी आ गए। वी. पी. सिंह और विपक्ष ने इसे चुनावी मुद्दे के रूप में पेश किया। यद्यपि प्राथमिक जाँच-पड़ताल से यह साबित हो गया कि राजीव गांधी के विरुद्ध जो आरोप लगाया गया था वो बिल्कुल ग़लत तो नहीं है, साथ ही ऑडिटर जनरल ने तोपों की विश्वसनीयता को संदेह के घेरे में ला दिया था। भारतीय जनता के मध्य यह बात स्पष्ट हो गई कि बोफार्स तोपें विश्वसनीयन नहीं हैं तो सौदे में दलाली ली गई थी। इससे पर्दाफाश के कारण राजीव गांधी ने वी. पी. सिंह को कांग्रेस से निष्कासित कर दिया। इस प्रकार इस चुनाव में वी. पी. सिंह की छवि एक ऐसे राजनीतिज्ञ की बन गई जिसकी ईमानदारी और कर्तव्य निष्ठा पर कोई शक़ नहीं किया जा सकता था। उत्तर प्रदेश के युवाओं ने तो उन्हें अपना नायक मान लिया था। वी. पी. सिंह छात्रों की टोलियों के साथ-साथ रहते थे।

वी. पी. सिंह ने विद्याचरण शुक्ल, रामधन तथा सतपाल मलिक और अन्य असंतुष्ट कांग्रेसियों के साथ मिलकर 2 अक्टूबर 1987 को अपना एक पृथक मोर्चा गठित कर लिया। इस मोर्चे में भारतीय जनता पार्टी भी सम्मिलित हो गई। वामदलों ने भी मोर्चे को समर्थन देने की घोषणा कर दी। इस प्रकार सात दलों के मोर्चे का निर्माण 6 अगस्त 1988 को हुआ और 11 अक्टूबर 1988 को राष्ट्रीय मोर्चा का विधिवत गठन कर लिया गया। राष्ट्रीय मोर्चा की सरकार में वीपी सिंह प्रधानमंत्री बने।

चन्द्र शेखर अपने छात्र जीवन से ही राजनीति की ओर आकर्षित थे और क्रांतिकारी जोश एवं गर्म स्वभाव वाले वाले आदर्शवादी के रूप में जाने जाते थे। इलाहाबाद विश्वविद्यालय (1950-51) से राजनीति विज्ञान में अपनी मास्टर डिग्री करने के बाद वे समाजवादी आंदोलन में शामिल हो गए। उन्हें आचार्य नरेंद्र देव के साथ बहुत निकट से जुड़े होने का सौभाग्य प्राप्त था। वे बलिया में जिला प्रजा समाजवादी पार्टी के सचिव चुने गए एक साल के भीतर वे उत्तर प्रदेश में राज्य प्रजा समाजवादी पार्टी के संयुक्त सचिव बने। 1955-56 में वे उत्तर प्रदेश में राज्य प्रजा समाजवादी पार्टी के महासचिव बने। 1962 में वे उत्तर प्रदेश से राज्यसभा के लिए चुने गए। वे जनवरी 1965 में भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस में शामिल हो गए। 1967 में उन्हें कांग्रेस संसदीय दल का महासचिव चुना गया। संसद के सदस्य के रूप में उन्होंने दलितों के हित के लिए कार्य करना शुरू किया एवं समाज में तेजी से बदलाव लाने के लिए नीतियाँ निर्धारित करने पर जोर दिया। इस संदर्भ में जब उन्होंने समाज में उच्च वर्गों के गलत तरीके से बढ़ रहे एकाधिकार के खिलाफ अपनी आवाज उठाई तो सत्ता पर आसीन लोगों के साथ उनके मतभेद हुए। 

यहां तक कि इन्दिरा गांधी की इच्छा के खिलाफ उन्होंने सीडब्ल्यूसी का चुनाव लड़ा और जीते। वे एक ऐसे ‘युवा तुर्क’ नेता के रूप में सामने आए जिसने दृढ़ता, साहस एवं ईमानदारी के साथ निहित स्वार्थ के खिलाफ लड़ाई लड़ी। आपातकाल लगाने के खिलाफ चन्द्रशेखर को जेल या मंत्री पद में से एक चुनने का आफर हुआ, लेकिन उन्होंने जेल को चुना। कांग्रेस त्यागने के बाद चन्द्रशेखर 18 महीने तक एकल कारावास में रहे। 25 जून 1975 को आपातकाल घोषित किये जाने के समय आंतरिक सुरक्षा अधिनियम के तहत उन्हें गिरफ्तार किया गया था जबकि उस समय वे भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस के शीर्ष निकायों, केंद्रीय चुनाव समिति तथा कार्य समिति के सदस्य थे।

कांग्रेस छोड़ने के बाद उन्होंने 1977 के चुनाव में जेपी की सदारत में इंदिरा गांधी को प्रधानमंत्री की कुर्सी छोड़ने पर मजबूर कर दिया। चन्द्रशेखर जनता पार्टी के अध्यक्ष बने। वह इस पद पर 1977 से 1988 तक रहे। उन्होंने जमीनी स्तर पर काम किया। चन्द्र शेखर ने 6 जनवरी 1983 से 25 जून 1983 तक दक्षिण के कन्याकुमारी से नई दिल्ली में राजघाट (महात्मा गांधी की समाधि) तक लगभग 4260 किलोमीटर की मैराथन दूरी पैदल (पदयात्रा) तय की थी। उनके इस पदयात्रा का एकमात्र लक्ष्य था – लोगों से मिलना एवं उनकी महत्वपूर्ण समस्याओं को समझना। उन्होंने सामाजिक एवं राजनीतिक कार्यकर्ताओं को प्रशिक्षित करने के उद्देश्य से केरल, तमिलनाडु, कर्नाटक, महाराष्ट्र, मध्य प्रदेश, गुजरात, उत्तर प्रदेश एवं हरियाणा सहित देश के विभिन्न भागों में लगभग पंद्रह भारत यात्रा केंद्रों की स्थापना की थी ताकि वे देश के पिछड़े इलाकों में लोगों को शिक्षित करने एवं जमीनी स्तर पर कार्य कर सकें। 1990 में वीपी सिंह की सरकार गिरने के बाद वे देश के प्रधानमंत्री भी बने। हालांकि यह कांग्रेस के सहयोग से ही संभव हो पाया, लेकिन कांग्रेस ही ने उनसे समर्थन वापस ले लिया।

कभी कांग्रेस में महात्मा गांधी के साथ दांडी नमक यात्रा से लेकर आजादी के संघर्ष में शामिल रहे चौधरी चरण सिंह अंग्रेजी हुकुमत के खिलाफ जबरदस्त लड़ाई लड़ने वाले शख्स रहे हैं। इंदिरा से बगावत करके चौधरी चरण सिंह ने अपनी पार्टी बनाई और यूपी के मुख्यमंत्री बने। इंदिरा ने राष्ट्रपति शासन लगवाया। करीब नौ महीने कांग्रेस के मुख्यमंत्री को रखा। फिर चरणसिंह चुने गए। बाद में जेपी के आन्दोलन से जुड़े चरण सिंह मोरारजी के शासन काल में उप प्रधानमंत्री बने। मोरारजी की सत्ता जाने पर इन्दिरा गांधी के सहयोग से चौधरी चरण सिंह जुलाई 1979 में भारत के प्रधानमंत्री भी बने। वे जन नेता थे उनकी राजनीतिक विरासत कई जगह बंटी। आज जितनी भी जनता दल परिवार की पार्टियाँ हैं, उड़ीसा में बीजू जनता दल हो या बिहार में राष्ट्रीय जनता दल हो या जनता दल यूनाएटेड ले लीजिए या ओमप्रकाश चौटाला का लोक दल, अजीत सिंह का ऱाष्ट्रीय लोक दल हो या मुलायम सिंह की समाजवादी पार्टी हो, ये सब चरण सिंह की विरासत हैं।

कभी कांग्रेस में महात्मा गांधी के साथ दांडी नमक यात्रा से लेकर आजादी के संघर्ष में शामिल रहे चौधरी चरण सिंह अंग्रेजी हुकुमत के खिलाफ जबरदस्त लड़ाई लड़ने वाले शख्स रहे हैं। इंदिरा से बगावत करके चौधरी चरण सिंह ने अपनी पार्टी बनाई और यूपी के मुख्यमंत्री बने। इंदिरा ने राष्ट्रपति शासन लगवाया। करीब नौ महीने कांग्रेस के मुख्यमंत्री को रखा। फिर चरणसिंह चुने गए। बाद में जेपी के आन्दोलन से जुड़े चरण सिंह मोरारजी के शासन काल में उप प्रधानमंत्री बने। मोरारजी की सत्ता जाने पर इन्दिरा गांधी के सहयोग से चौधरी चरण सिंह जुलाई 1979 में भारत के प्रधानमंत्री भी बने। वे जन नेता थे उनकी राजनीतिक विरासत कई जगह बंटी। आज जितनी भी जनता दल परिवार की पार्टियाँ हैं, उड़ीसा में बीजू जनता दल हो या बिहार में राष्ट्रीय जनता दल हो या जनता दल यूनाएटेड ले लीजिए या ओमप्रकाश चौटाला का लोक दल, अजीत सिंह का ऱाष्ट्रीय लोक दल हो या मुलायम सिंह की समाजवादी पार्टी हो, ये सब चरण सिंह की विरासत हैं।

भारतीय राजनीति में ताउ के नाम से मशहूर देवीलाल भी कांग्रेस छोड़ने के बाद ही मुख्यमंत्री बने। जब हरियाणा राज्य पंजाब में ही शामिल था। तब 1952 में कांग्रेस के टिकट पर देवीलाल चुनाव जीतकर विधानसभा पहुंचे और उसी वक्त पंजाब कांग्रेस के अध्यक्ष भी बनाए गए। बाद में इन्होंने जनता पार्टी में शामिल होना स्वीकार किया और 1977 में हरियाणा के मुख्यमंत्री बने। देवीलाल ने वीपी सिंह को प्रधानमंत्री बनाने के लिए चन्द्रशेखर को धोखा भी दिया, लेकिन वे खुद ही धोखे के शिकार हो गए और भारत के प्रधानमंत्री बनते—बनते रह गए। वे वीपीसिंह और चन्द्रशेखर दोनों के वक्त में देश के उप प्रधानमंत्री रहे हैं।

सुश्री ममता बैनर्जी का राजनीतिक सफर 1970 में शुरू हुआ, जब वे कांग्रेस पार्टी की कार्यकर्ता बनीं। 1976 से 1980 तक वे महिला कांग्रेस की महासचिव रहीं। 1984 में ममता ने मार्क्सवादी कम्युनिस्ट पार्टी (माकपा) के वरिष्ठ नेता सोमनाथ चटर्जी को जादवपुर लोकसभा सीट से हराया। उन्हें देश की सबसे युवा सांसद बनने का गौरव भी प्राप्त हुआ। उन्हें अखिल भारतीय युवा कांग्रेस का महासचिव बनाया गया। मगर 1989 में कांग्रेस विरोधी लहर के कारण जादवपुर लोकसभा सीट पर ममता को मालिनी भट्टाचार्य के खिलाफ हार का स्वाद चखना पड़ा। पश्चात 1991 का चुनाव उन्होंने कलकत्ता दक्षिण संसदीय सीट से लड़ा और जीता भी। उन्होंने दक्षिणी कलकत्ता (कोलकाता) लोकसभा सीट से माकपा के बिप्लव दासगुप्ता को पराजित किया और वर्ष 1996, 1998, 1999, 2004 व 2009 में वह इसी सीट से लोकसभा सदस्य निर्वाचित हुईं। 1991 में कोलकाता से लोकसभा के लिए चुनी गईं। नरसिम्हा राव सरकार में मानव संसाधन विकास, युवा मामलों और महिला एवं बाल विकास विभाग में राज्यमंत्री बनीं। नरसिम्हां राव सरकार में खेल मंत्री बनाई गईं। इससे पहले वे केन्द्र में दो बार रेलमंत्री बन चुकी हैं। रेलमंत्री बनने वाली वे पहली महिला थीं। वे केन्द्र में कोयला, मानव संसाधन विकास राज्यमंत्री, युवा मामलों और खेल तथा महिला व बाल विकास की राज्यमंत्री भी रह चुकी हैं। वर्ष 2012 में टाइम पत्रिका ने उन्हें विश्व के 100 प्रभावी लोगों की सूची में स्थान दिया था।

अपने समूचे राजनीतिक जीवन में ममता ने सादा जीवन शैली अपनाई और वे हमेशा ही परम्परागत बंगाली सूती की साड़ी (जिसे तंत कहा जाता है) पहनती रही हैं। उन्होंने कभी कोई आभूषण या श्रृंगार प्रसाधन की चीज नहीं अपनाई। वे अपने जीवन में अविवाहित रही हैं। उनके कंधे पर आमतौर पर एक सूती थैला लटका नजर आता है जो कि उनकी पहचान बन गया है। वर्ष 1991 में जब राव की सरकार बनी तो उन्हें मानव संसाधन विकास, युवा मामले और खेल तथा महिला और बाल विकास राज्यमंत्री बनाया गया। खेलमंत्री के तौर पर उन्होंने देश में खेलों की दशा सुधारने को लेकर सरकार से मतभेद होने पर इस्तीफा देने की घोषणा कर दी थी। 1993 में उन्हें इस मंत्रालय से छुट्‍टी दे दी गई। अप्रैल 1996 में उन्होंने कांग्रेस पर बंगाल में माकपा की कठपुतली होने का आरोप लगाया। और इसके अगले ही वर्ष 1997 में उन्होंने अखिल भारतीय तृणमूल कांग्रेस बनाई। वे पार्टी की अध्यक्ष बनीं। आमतौर पर उन्हें 'दीदी' कहकर बुलाया जाता है। 2011 के राज्य विधानसभा चुनावों में उन्होंने माकपा और वामपंथी दलों की सरकार को 34 वर्षों के लगातार शासन के बाद उखाड़ फेंका था। वर्ष 1999 में उनकी पार्टी भाजपा के नेतृत्व में बनी राष्ट्रीय जनतांत्रिक गठबंधन (एनडीए) सरकार का हिस्सा बन गई और उन्हें रेलमंत्री बना दिया गया। वर्ष 2002 में उन्होंने अपना पहला रेल बजट पेश किया और इसमें उन्होंने बंगाल को सबसे ज्यादा सुविधाएं देकर सिद्ध कर दिया कि उनकी दृष्टि बंगाल से आगे का नहीं देख पाती है। हालांकि ममता वो मुख्यमंत्री है जो केन्द्र सरकार से आज भी अपने ही अंदाज में बात करती हैं।


तेलंगाना के वर्तमान मुख्यमंत्री के. चन्द्रशेखर राव कभी कांग्रेस में हुआ करते थे। उन्होंने मेड़क जिले में यूथ कांग्रेस से अपना कॅरियर शुरू किया। एक समय पर उन्होंने कांग्रेस का दामन छोड़ दिया और तेलुगु देशम पार्टी में शामिल हो विधायक बने। 1987-88 तक वे आंध्रप्रदेश में राज्यमंत्री रहे। 1992-93 तक वे लोक उपक्रम समिति के अध्यक्ष रहे। 1997-99 तक वे केंद्रीय मंत्री रहे। 1999 से 2001 तक वे आंध्रप्रदेश विधानसभा में उपाध्यक्ष रहे। इस पद से इस्तीफा देने के बाद तेलगू देशम से बाहर आ गए और एकसूत्रीय एजेंडा के तहत तेलंगाना राष्ट्र समिति की स्थापना की। 2004 में वे करीमनगर से लोकसभा सदस्य चुने गए। 2004-06 तक उन्होंने केंद्रीय श्रम और नियोजन मंत्री के पद पर कार्य किया। 2006 में उन्होंने संसद की सदस्यता से इस्तीफा दे दिया और फिर भारी बहुमत से सांसद चुने गए। 2008 में उन्होंने अपने तीन सांसदों और 16 विधायकों के साथ फिर इस्तीफा दिया और दूसरी बार सांसद चुने गए। केसीआर का मुख्य उद्देश्य अलग तेलंगाना की स्थापना था। उसमें वे सफल भी रहे।  

कांग्रेस में महाराष्ट्र के सीएम और देश के रक्षा मंत्री  जैसे महत्वपूर्ण दायित्वों पर रहे महाराष्ट्र की राजनीति के क्षत्रप शरद पवार ने कांग्रेस से अलग होकर एनसीपी बनाई और अपनी अलग पहचान कायम की। आज शरद पवार  भारतीय राजनीति में किसी परिचय के मोहताज नहीं है। महाराष्ट्र चुनावों में उनकी राजनीति का लोहा देश ने माना है कि किस तरह उन्होंने बीजेपी को सत्ता से दूर किया है। शरद पवार एक ऐसे राजनेता है जो आज तक कोई चुनाव नहीं हारे हैं।

बंशीलाल एक भारतीय स्वतंत्रता सेनानी, वरिष्ठ कांग्रेसी नेता, हरियाणा के पूर्व मुख्यमंत्री एवं कई लोगों द्वारा आधुनिक हरियाणा के निर्माता माने जाते हैं। उनका जन्म हरियाणा के भिवानी जिले के गोलागढ़ गांव के जाट परिवार में हुआ था। उन्होंने तीन अलग-अलग अवधियों: 1968-77, 1985-87 एवं 1996-99 तक हरियाणा के मुख्यमंत्री के रूप में कार्य किया। बंसीलाल को 1975 में आपातकाल के दौरान पूर्व प्रधानमंत्री इंदिरा गांधी और उनके पुत्र संजय गांधी का एक करीबी विश्वासपात्र माना जाता था। उन्होंने दिसंबर 1975 से मार्च 1977 तक रक्षा मंत्री के रूप में अपनी सेवाएं दी एवं 1975 में केंद्र सरकार में बिना विभाग के मंत्री के रूप में उनका एक संक्षिप्त कार्यकाल रहा। उन्होंने रेलवे और परिवहन विभागों का भी संचालन किया। लगातार सात बार राज्य विधानसभा के लिए चुने गए, पहली बार 1967 में वे विधायक बने थे। उन्होंने 1996 में भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस से अलग होकर हरियाणा विकास पार्टी की स्थापना की और हरियाणा के एक बार फिर से सीएम बने। 

कांग्रेस आई का  सदस्य बनने के बाद चन्द्रबाबू नायडू 1978 में चन्द्रगिरी से विधायक बने। वहां वे तकनीकी शिक्षा मंत्री भी बने 1982 में नायडू के ससुर एनटी रामाराव ने तेलगूदेशम पार्टी बनाई। 1983 में नायडू ने कांग्रेस से ही चुनाव लड़ा, लेकिन टीडीपी प्रत्याशी से हार गए। बाद में उन्होंने कांग्रेस छोड़ दी और टीडीपी का काम संभाल लिया। 1995 में चन्द्रबाबू ने अपने ससुर को ही पीछे रखते हुए मुख्यमंत्री का पद संभाल लिया। रामा राव ने अपनी तुलना शाहजहां से की। अभी नायडू आन्ध्र विधानसभा में नेता प्रतिपक्ष हैं।

2009 में आंध्र प्रदेश के तत्कालीन मुख्यमंत्री डॉ. वाई.एस. राजशेखर रेड्डी की हेलिकॉप्टर दुर्घटना में मौत हो गई थी. इस मौत के बाद से ही उनके बेटे वाई. एस. जगनमोहन रेड्डी आंध्र प्रदेश में सियासी ख़ालीपन को भरने की कोशिश कर रहे थे। 2009 में वो कडप्पा लोकसभा क्षेत्र से सांसद बने। अगर उनके पिता जीवित होते तो जगन भी कांग्रेस में होते। पिता के असामयिक निधन के बाद जगन को कांग्रेस में मन मुताबिक़ तवज्जो नहीं मिली और उन्होंने कांग्रेस से अलग राह चुन ली। राजनीति में दस्तक के कुछ ही महीनों बाद जगनमोहन ने अपने पिता को खो दिया। इसके बाद कांग्रेस पार्टी के साथ उनका टकराव, वित्तीय मामलों में फँसने के बाद 16 महीनों की जेल उनके इर्द-गिर्द घूमती रहीं। हालांकि जगनमोहन ने राजनीतिक रूप से कभी सरेंडर नहीं किया।

पहली बार वह कांग्रेस पार्टी के उम्मीदवार के रूप में संसद पहुंचे. उनके पिता राजशेखर रेड्डी की असामयिक मृत्यु के बाद उनके पिता के कई चाहने वालों ने आत्महत्या कर ली थी। उस समय जगन ने सोचा कि आत्महत्या करने वाले लोगों के घरों में जाकर उन्हें सांत्वना दी जानी चाहिए. इसको लेकर उन्होंने एक सांत्वना यात्रा शुरू की। हालांकि, कांग्रेस के हाई कमान ने उन्हें इस यात्रा को समाप्त करने के निर्देश दिए लेकिन जगन ने इसकी परवाह किए बिना यात्रा जारी रखी। उन्होंने कहा कि यह उनका व्यक्तिगत मामला था और इसके बाद उन्होंने कांग्रेस पार्टी को ख़ुद से अलग कर लिया। 29 नवंबर 2010 को उन्होंने लोकसभा की सदस्यता से इस्तीफ़ा दे दिया। सात दिसंबर 2010 को उन्होंने घोषणा की कि वह 45 दिनों में अपनी नई राजनीतिक पार्टी का गठन करेंगे। पूर्वी गोदावरी में मार्च 2011 में उन्होंने घोषणा की कि उनकी पार्टी का नाम वाईएसआर कांग्रेस होगा। वाईएसआर का मतलब वाईएस राजशेखर रेड्डी से नहीं था।

इसका मतलब युवजन श्रमिक रायतू कांग्रेस पार्टी है। इसके बाद उन्होंने वाईएसआर कांग्रेस पार्टी से कडप्पा चुनाव क्षेत्र से चुनाव लड़ा और उन्होंने 5,45,043 वोट पाकर बड़ी जीत दर्ज की। आज वे आन्ध्र के मुख्यमंत्री हैं। 2014 में मात्र 67 सीटें पाकर नेता प्रतिपक्ष बने जगन ने 6 नवंबर 2017 को 'प्रजा संकल्प यात्रा' की शुरुआत की जिसमें उन्होंने आंध्र प्रदेश में 3648 किलोमीटर की यात्रा पूरी की। 430 दिनों तक यात्रा 13 ज़िलों में चली और इसमें 125 विधानसभा क्षेत्र शामिल थे। यह यात्रा 9 जनवरी 2019 को समाप्त हुई। इस यात्रा के दौरान 'हम जगन चाहते हैं, जगन को आना चाहिए' नारा गूंजा। कांग्रेस में रहते हुए उन्होंने केंद्रीय मंत्री बनना बेहतर नहीं समझा बल्कि वह उचित मौक़े पर मुख्यमंत्री बनने की संभावनाएं तलाश रहे थे। वह दृढ़ता से अपने मक़सद में लगे रहे और किसी भी स्थिति में नहीं झुके। ऐसी क्षमता उनके समकालीन राजनीतिज्ञों में कम ही है।

जगन में बहुत सी विशेषताएं हैं, वह कार्यकर्ताओं को नेतृत्व देते हुए उनमें उत्साह भरते हैं। पार्टी बनाने के कम समय बाद ही उन्होंने चुनावों का सामना किया और उसमें उन्हें हार का भी सामना करना पड़ा। पार्टी कैडरों की झुंझलाहट और दूसरे दलों की अदला-बदली के बाद जगन ने कुछ शर्तें भी बनाईं। उन्होंने कहा कि अगर कोई दूसरी पार्टी का उम्मीदवार चुनाव जीतता है और उनकी पार्टी में शामिल होना चाहता है तो उसे इस्तीफ़ा देकर उनकी पार्टी में आना होगा। वह इस सिद्धांत को बनाए हुए हैं। राष्ट्रीय स्तर पर यह नीति राजनीतिक दलों के लिए आदर्श है। जगनमोहन रेड्डी की उम्र को ध्यान में रखते हुए कहा जा सकता है कि वह ऐसे नेता हैं जिन्हें राजनीति में एक लंबा रास्ता तय करना है।

मध्य प्रदेश में सियासी भूचाल के बीच कांग्रेस छोड़ चुके ज्योतिरादित्य सिंधिया (Jyotiraditya Scindia) बीजेपी में शामिल हो गए हैं। पिछले कुछ सालों में कांग्रेस के कई दिग्गज नेता बीजेपी में शामिल हुए हैं। उन्हें राज्यसभा में भेजा गया है। सिंधिया के पिता माधवराव कांग्रेस के दिग्गज नेता रहे हैं और बताया जाता है एक समय  पीएम पद के दावेदार भी। वहीं इनकी दादी श्रीमती विजयाराजे सिंधिया बीजेपी की संस्थापक सदस्यों में से एक हैं।

कांग्रेस की पूर्व दिग्गज नेता ने 2016 में बीजेपी में शामिल हुई थीं। उन्होंने 2017 के यूपी विधानसभा चुनाव में लखनऊ कैंट से चुनाव लड़ा था। रीता ने मुलायम सिंह यादव की छोटी बहू अपर्णा यादव को हराकर यहां से जीत दर्ज की थी। रीता को योगी आदित्यनाथ सरकार में कैबिनेट मंत्री भी बनाया गया था। हालांकि, 2019 के लोकसभा चुनाव में बीजेपी ने उन्हें इलाहाबाद (अब प्रयागराज) से उम्मीदवार बनाया। रीता यहां से अभी सांसद हैं।

पूर्वोत्तर के इस कद्दावर नेता ने 2015 में बीजेपी जॉइन किया था। बीजेपी में इनके रुतबे का अंदाजा इस बात से ही लगाया जा सकता है कि पूर्वोत्तर राज्य में जब भी कोई संकट आता है शर्मा पार्टी की तरफ से ऐक्टिव होते हैं। असम में शर्मा पार्टी के भरोसेमंद चेहरों में शुमार हैं। असम में शर्मा के पास वित्त, शिक्षा और स्वास्थ्य जैसे विभाग हैं।

यूपी में एक दिन के मुख्यमंत्री रहे जगदंबिका पाल ने 2014 में बीजेपी में शामिल हुए थे। वह लगातार दो बार से बीजेपी के टिकट पर डुमरियागंज से सांसद हैं।

चौधरी बीरेंद्र सिंह 2014 में कांग्रेस छोड़कर बीजेपी में शामिल हो गए थे। उन्होंने पीएम नरेंद्र मोदी के पहले कार्यकाल में वह इस्पात मंत्रालय का काम संभाला था। इस साल जनवरी ने बीरेंद्र सिंह ने राज्यसभा की सदस्यता से इस्तीफा दे दिया था।

महाराष्ट्र में कांग्रेस के दिग्गज नेता राधाकृष्ण विखे पाटिल पिछले साल कांग्रेस छोड़ बीजेपी में शामिल हुए थे। पाटिल ने जिस समय इस्तीफा दिया था वह विधानसभा में विपक्ष के नेता थे। फिलहाल बीजेपी में हाशिए पर चल रहे हैं। उनके महा विकास अघाड़ी में शामिल होने की अटकलें हैं।

महाराष्ट्र के पूर्व मुख्यमंत्री और कांग्रेस के दिग्गज नेता रहे नारायण राणे ने पिछले साल बीजेपी का दामन थाम लिया था। कांग्रेस छोड़ने के बाद राणे को बीजेपी के समर्थन से राज्यसभा में चुना गया था। बीजेपी ने अभी राणे को महाराष्ट्र में कोई बड़ी जिम्मेदारी नहीं दी है।

पूर्व विदेश मंत्री रहे एस एम कृष्णा 2017 में कांग्रेस छोड़ बीजेपी में शामिल हो गए थे। कर्नाटक के इस कद्दावर नेता के पास अभी कोई अहम जिम्मेदारी नहीं है।

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