नेपाल बाढ़ त्रासदी: रिसर्च में खुलासा, भूकंप नहीं बल्कि ग्लेशियर टूटने और हिमस्खलन से मची तबाही

नेपाल की भोटे कोशी नदी में आई विनाशकारी बाढ़ में करीब 500 लोगों की मौत हो गई है। वैज्ञानिकों की रिसर्च के अनुसार, यह आपदा भूकंप के कारण नहीं बल्कि ल्हेंडे नदी में हुए विशाल हिमस्खलन और मलबे के कारण बने अस्थायी बांध के टूटने से आई थी।

नेपाल में बुधवार को आई अचानक और विनाशकारी प्राकृतिक आपदा ने पूरे क्षेत्र को झकझोर कर रख दिया है। इस जलप्रलय में अब तक करीब 500 लोगों के मारे जाने की दुखद खबर सामने आई है, जबकि हजारों लोग अब भी लापता बताए जा रहे हैं। भोटे कोशी नदी और उसकी सहायक नदियों में आई इस भीषण बाढ़ ने न केवल जान-माल का भारी नुकसान किया है, बल्कि बुनियादी ढांचे को भी तहस-नहस कर दिया है। इस आपदा के कारणों को समझने के लिए वैज्ञानिकों और शोधकर्ताओं ने गहन जांच शुरू की है, जिसमें चौंकाने वाले तथ्य सामने आए हैं। शुरुआत में जिसे भूकंप समझा जा रहा था, वह वास्तव में एक विशाल हिमस्खलन का परिणाम था।

भूकंप का भ्रम और वास्तविक घटनाक्रम

4 मैग्नीट्यूड का भूकंप दर्ज किया था। हालांकि, बाद में विस्तृत वैज्ञानिक विश्लेषण से पता चला कि यह कोई पारंपरिक टेक्टोनिक भूकंप नहीं था। USGS ने अपने संशोधित आकलन में स्पष्ट किया कि लंबी अवधि की भूकंपीय तरंगों के विश्लेषण से यह संकेत मिला है कि यह कंपन ग्लेशियर के टूटने और भारी मात्रा में मलबे के गिरने से उत्पन्न हुआ था और 2 तीव्रता का भूकंपीय घटनाक्रम माना गया, जो पूरी तरह से हिमस्खलन और चट्टानों के गिरने के कारण पैदा हुआ था।

ल्हेंडे नदी में मलबे का अवरोध और तबाही

वैज्ञानिकों की रिसर्च के अनुसार, भोटे कोशी की सहायक नदी ल्हेंडे में बर्फ और चट्टानों का एक विशाल हिस्सा गिर गया था और इस हिमस्खलन के कारण ल्हेंडे नदी का बहाव कुछ समय के लिए पूरी तरह रुक गया और वहां मलबे का एक अस्थायी बांध (लैंडस्लाइड डैम) बन गया। जब पानी का दबाव बढ़ा, तो यह प्राकृतिक बांध अचानक टूट गया, जिससे कीचड़, बड़े पत्थरों और पानी का एक शक्तिशाली सैलाब नीचे की ओर बह निकला। इस सैलाब ने भोटे कोशी नदी में मिलकर तबाही का मंजर पैदा कर दिया। नदी के किनारे बने पुल और अन्य निर्माण इस बहाव के सामने टिक नहीं सके और देखते ही देखते सब कुछ नष्ट हो गया।

सैटेलाइट तस्वीरों और विशेषज्ञों का विश्लेषण

काठमांडू विश्वविद्यालय के जलवायु शोधकर्ता और प्रोफेसर रिजन भक्त कायस्थ ने बताया कि सैटेलाइट तस्वीरों के विश्लेषण से रसुवागढ़ी सीमा क्रॉसिंग से लगभग 20 किलोमीटर उत्तर-पूर्व में एक बड़े हिमस्खलन के निशान मिले हैं। इंटरनेशनल सेंटर फॉर इंटीग्रेटेड माउंटेन डेवलपमेंट (ICIMOD) के सार्थक श्रेष्ठ ने भी पुष्टि की है कि स्याफ्रुबेसी के ऊपर आए एवलांच ने ही नदी का रास्ता रोका था। इस बाढ़ की शक्ति का अंदाजा इसी बात से लगाया जा सकता है कि गल्छी में त्रिशूली नदी का जलस्तर मात्र 30 मिनट के भीतर 9 मीटर तक बढ़ गया, जबकि मलेखु में इसी दौरान जलस्तर में 7 मीटर की वृद्धि दर्ज की गई।

चीन की भूमिका और नया खतरा

इस आपदा का एक पहलू तिब्बत से भी जुड़ा है। चीनी अधिकारियों ने जानकारी दी है कि नेपाल में छोचेन खोला और पुरेपु त्सांगपो नदियों के संगम के पास एक बड़ी रुकावट वाली झील (बैरियर लेक) बन गई है। चाइना सेंट्रल टेलीविज़न की रिपोर्ट के अनुसार, गुरुवार सुबह तक इस झील में लगभग 20 लाख क्यूबिक मीटर पानी जमा हो चुका था। अनुमान है कि अगले तीन दिनों में इसमें 30 लाख क्यूबिक मीटर पानी और जुड़ सकता है। चीनी अधिकारी इस झील पर लगातार नज़र रख रहे हैं और बाढ़ सिमुलेशन के जरिए संभावित खतरे का आकलन कर रहे हैं, क्योंकि ये नदियां आगे चलकर नेपाल में भोटे कोशी का रूप ले लेती हैं।

ग्लेशियर झीलों का जोखिम और भविष्य की चेतावनी

वैज्ञानिकों ने चेतावनी दी है कि हिमालयी क्षेत्र में खतरा अभी टला नहीं है। ICIMOD और संयुक्त राष्ट्र विकास कार्यक्रम (UNDP) के एक अध्ययन में नेपाल, भारत और तिब्बत में कुल 3624 ग्लेशियल झीलों की पहचान की गई है। इनमें से 47 झीलों को संभावित रूप से बेहद खतरनाक माना गया है, जिनमें से 21 झीलें अकेले नेपाल में स्थित हैं। प्रोफेसर कायस्थ के अनुसार, तापमान बढ़ने से ग्लेशियरों के पिघलने और हिमस्खलन की घटनाएं बढ़ सकती हैं। वर्तमान में बादलों के कारण सैटेलाइट निगरानी में भी बाधा आ रही है, जिससे नदी के ऊपरी हिस्सों में बनने वाले नए अस्थायी जलाशयों का पता लगाना चुनौतीपूर्ण हो गया है।