संसद का मानसून सत्र 2026 आज यानी 13 अगस्त 2026 को अनिश्चितकाल के लिए स्थगित हो गया। यह सत्र भारतीय संसदीय इतिहास में हंगामे और कम उत्पादकता के लिए याद किया जाएगा। 19 दिनों तक चले इस सत्र में लोकसभा और राज्यसभा दोनों ही अपने निर्धारित समय का सही उपयोग करने में विफल रहीं। 17 प्रतिशत पर सिमट गई। इस हंगामे और बार-बार होने वाले स्थगन के कारण देश के करदाताओं के लगभग 175 करोड़ रुपये बर्बाद हो गए।
लोकसभा और राज्यसभा की कार्यक्षमता का विश्लेषण
मानसून सत्र के दौरान दोनों सदनों में कुल 19 बैठकें प्रस्तावित थीं। योजना के अनुसार, दोनों सदनों को लगभग 114-114 घंटे कामकाज करना था। लेकिन जमीनी हकीकत इसके बिल्कुल विपरीत रही और लोकसभा में केवल 17 घंटे 30 मिनट ही काम हो सका, जिसका अर्थ है कि 96 घंटे 30 मिनट का कीमती समय हंगामे की भेंट चढ़ गया। राज्यसभा की स्थिति भी बहुत अच्छी नहीं थी; वहां 114 घंटों के मुकाबले केवल 37 घंटे 20 मिनट ही कार्यवाही चली और 76 घंटे 40 मिनट का समय बर्बाद हुआ। कुल मिलाकर, इस सत्र में 173 घंटे 10 मिनट का समय नेताओं के आपसी झगड़ों और नारेबाजी में स्वाहा हो गया।
हंगामे के प्रमुख मुद्दे और विधायी कार्य
इस सत्र में कई ऐसे मुद्दे रहे जो चर्चा के केंद्र में थे लेकिन उन पर सार्थक बहस के बजाय हंगामा अधिक हुआ और चंदा चोरी, जंतर-मंतर पर छात्रों का प्रदर्शन और उन पर हुआ लाठीचार्ज, तथा एफसीआरए बिल जैसे मुद्दों पर विपक्ष ने सरकार को घेरने की कोशिश की। हंगामे के कारण सदन की कार्यवाही लगभग हर दिन दोपहर 12 बजे, फिर 2 बजे और कई बार शाम 5 बजे तक के लिए स्थगित करनी पड़ी। विधायी कामकाज की बात करें तो सरकार ने दोनों सदनों से 12 बिल पास कराए। इनमें सार्वजनिक परीक्षाओं में अनुचित साधन रोकथाम, राष्ट्रीय सम्मान, जन्म-मृत्यु पंजीकरण, सुप्रीम कोर्ट जजों की संख्या, एमएसएमई, टैक्सेशन, बैंकर्स बुक्स एविडेंस, ट्रिब्यूनल्स रिफॉर्म्स, केरल नाम परिवर्तन, एनसीडीसी और एमएमडीआर संशोधन विधेयक शामिल हैं।
विधेयकों पर चर्चा का विस्तृत विवरण
आंकड़ों से पता चलता है कि विधेयकों पर चर्चा का समय बहुत ही असमान रहा। सबसे अधिक चर्चा पब्लिक एग्जामिनेशन (एंटी-चीटिंग) बिल पर हुई, जिस पर लोकसभा में 10 घंटे 55 मिनट और राज्यसभा में 6 घंटे 39 मिनट, यानी कुल 17 घंटे 34 मिनट बहस हुई। इसके विपरीत, कई महत्वपूर्ण बिल लोकसभा में बिना किसी विशेष चर्चा के पारित कर दिए गए। सुप्रीम कोर्ट जजों की संख्या वाले बिल पर लोकसभा में केवल 4 मिनट और राज्यसभा में 2 घंटे 21 मिनट चर्चा हुई। केरल नाम परिवर्तन बिल पर लोकसभा में 4 मिनट और राज्यसभा में 2 घंटे 16 मिनट चर्चा हुई। टैक्सेशन एंड अदर लॉज बिल पर लोकसभा में 3 मिनट और राज्यसभा में 2 घंटे 7 मिनट, जबकि ट्रिब्यूनल्स रिफॉर्म्स बिल पर 12 मिनट और 1 घंटा 52 मिनट चर्चा हुई। एनसीडीसी संशोधन बिल पर लोकसभा में 10 मिनट और राज्यसभा में 1 घंटा 42 मिनट लगे। एमएसएमई बिल पर 3 मिनट और 1 घंटा 19 मिनट, राष्ट्रीय सम्मान अपमान बिल पर 14 मिनट और 1 घंटा 1 मिनट, बैंकर्स बुक्स बिल पर 5 मिनट और 52 मिनट तथा जन्म-मृत्यु रजिस्ट्रेशन बिल पर लोकसभा में मात्र 4 मिनट और राज्यसभा में 50 मिनट चर्चा हुई।
राज्यसभा के आंकड़े और अंतिम दिन का घटनाक्रम
राज्यसभा के आंकड़े भी सत्र की निराशाजनक तस्वीर पेश करते हैं। सदस्यों के पास 285 सवाल, 380 शून्यकाल प्रस्ताव और 380 विशेष उल्लेख के अवसर थे, लेकिन सदन में केवल 16 सवाल, 52 शून्यकाल प्रस्ताव और 93 विशेष उल्लेख ही उठाए जा सके। सत्र के अंतिम दिन भी गतिरोध बना रहा। लोकसभा वंदे मातरम के गायन के बाद स्थगित हो गई, जबकि राज्यसभा में एमएमडीआर संशोधन बिल पास होने के बाद मल्लिकार्जुन खड़गे ने हल्द्वानी में उनके कार्यक्रम के बाद मंच के कथित शुद्धिकरण का मुद्दा उठाया। इस प्रकार, जनता के मुद्दों पर बहस के लिए मिलने वाला संसद का बहुमूल्य समय और पैसा एक बार फिर राजनीतिक खींचतान की भेंट चढ़ गया।
