संसद मॉनसून सत्र: आखिरी 4 दिन क्यों हैं खास? महिला आरक्षण और परिसीमन पर सस्पेंस

संसद के मॉनसून सत्र के अंतिम चार दिन बेहद महत्वपूर्ण हैं क्योंकि सरकार परिसीमन, महिला आरक्षण और FCRA जैसे बड़े बिल ला सकती है। बीजेपी और कांग्रेस दोनों ने अपने सांसदों को सदन में उपस्थित रहने के लिए व्हिप जारी किया है, जिससे राजनीतिक सरगर्मी बढ़ गई है।

संसद के वर्तमान मॉनसून सत्र के आखिरी 4 दिन भारतीय राजनीति के लिए अत्यंत महत्वपूर्ण मोड़ साबित हो सकते हैं। सत्ता पक्ष और विपक्ष दोनों ने अपनी कमर कस ली है और सदन के भीतर अपनी पूरी ताकत दिखाने की तैयारी में हैं। कांग्रेस पार्टी ने अपने सभी सांसदों के लिए तीन लाइन का व्हिप जारी कर उन्हें अनिवार्य रूप से सदन में उपस्थित रहने का निर्देश दिया है। दूसरी ओर, भारतीय जनता पार्टी ने भी अपने सांसदों और एनडीए के सहयोगी दलों को दिल्ली में ही रहने और विधायी कार्यों में भाग लेने को कहा है। इस सक्रियता के पीछे सबसे बड़ी वजह उन बड़े विधेयकों को लेकर बना सस्पेंस है, जिन्हें सरकार सत्र के समापन से पहले पेश कर सकती है।

महत्वपूर्ण विधेयकों पर टिकी सबकी नजरें

संसद के गलियारों में इस बात की प्रबल चर्चा है कि सरकार परिसीमन (डिलिमिटेशन), महिला आरक्षण और विदेशी अंशदान विनियमन अधिनियम (FCRA) से जुड़े विधेयकों को सदन के पटल पर रख सकती है। विपक्ष को इस बात की आशंका है कि सरकार अंतिम समय में इन बड़े बदलावों को लाकर उन्हें चौंका सकती है और कांग्रेस नेता राहुल गांधी ने विपक्षी गठबंधन के दलों से अपील की है कि वे अपने सांसदों की शत प्रतिशत मौजूदगी सुनिश्चित करें ताकि किसी भी विधायी कदम का मजबूती से सामना किया जा सके। हालांकि, सरकार की ओर से अभी तक इन विधेयकों को लेकर कोई आधिकारिक कार्यसूची जारी नहीं की गई है, लेकिन राजनीतिक हलचल कुछ और ही संकेत दे रही है।

किरेन रिजिजू का बयान और सरकार की प्राथमिकता

संसदीय कार्य मंत्री किरेन रिजिजू ने हाल ही में दिए अपने बयानों में स्पष्ट किया है कि परिसीमन और महिला आरक्षण विधेयक सरकार की प्राथमिकताओं में शामिल हैं। उन्होंने कहा कि ये दोनों विधेयक निश्चित रूप से सदन में आएंगे, लेकिन उन्होंने इनके पेश होने की सटीक तारीख या समय का खुलासा नहीं किया। इसी बीच, प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी द्वारा नए सांसदों के साथ की गई बैठकें और गृह मंत्री अमित शाह की विभिन्न राजनीतिक दलों के नेताओं से मुलाकातों ने इन अटकलों को और बल दिया है। राजनीतिक विश्लेषकों का मानना है कि सरकार इन 4 दिनों के भीतर कोई बड़ा विधायी दांव खेल सकती है।

FCRA बिल और बहुमत का गणित

रणनीतिक रूप से देखा जाए तो सरकार पहले FCRA बिल को पेश कर सकती है। इसका मुख्य कारण यह है कि परिसीमन और महिला आरक्षण जैसे संवैधानिक संशोधनों के लिए संसद में दो तिहाई बहुमत की आवश्यकता होती है, जबकि FCRA बिल को साधारण बहुमत से पारित किया जा सकता है। सरकार चाहती है कि पहले छोटे विधेयकों पर समर्थन जुटाकर एक सकारात्मक माहौल बनाया जाए। इसी सिलसिले में अमित शाह ने चर्च के प्रतिनिधियों और FCRA से प्रभावित होने वाले विभिन्न पक्षों से मुलाकात की है। इस प्रतिनिधिमंडल का नेतृत्व डीएमके सांसद पी विल्सन ने किया था। उन्होंने सरकार से मांग की है कि बिल के विवादित प्रावधानों को हटाया जाए या इसे संयुक्त संसदीय समिति (जेपीसी) के पास भेजा जाए। ईसाई संगठनों को डर है कि नए प्रावधानों के तहत विदेशी चंदे का हिसाब न मिलने पर उनकी संपत्तियों पर सरकारी कब्जा हो सकता है।

डीएमके और वाईएसआर कांग्रेस की भूमिका

दो तिहाई बहुमत जुटाने के लिए सरकार की नजरें अब डीएमके और वाईएसआर कांग्रेस जैसे क्षेत्रीय दलों पर टिकी हैं और सूत्रों के अनुसार, परिसीमन बिल को लेकर डीएमके और सरकार के बीच बातचीत का दौर जारी है। डीएमके ने सरकार के सामने अपनी 3 शर्तें रखी हैं। पहली शर्त यह है कि जनगणना के आधार पर सीटों की संख्या बढ़ाने पर लगी रोक को अगले 25 साल तक और बढ़ाया जाए। दूसरी शर्त यह है कि सभी राज्यों की लोकसभा सीटों में 50 प्रतिशत की समान वृद्धि की जाए। तीसरी शर्त के रूप में उन्होंने मांग की है कि नए परिसीमन के बाद संशोधित सीटों की पूरी सूची सार्वजनिक की जाए और वहीं, वाईएसआर कांग्रेस के सांसदों ने भी अमित शाह से मुलाकात की है। हालांकि आधिकारिक तौर पर यह मुलाकात जगन मोहन रेड्जी की सुरक्षा को लेकर थी, लेकिन माना जा रहा है कि परिसीमन पर भी चर्चा हुई है। पार्टी सांसद जी बाबू राव ने कहा कि परिसीमन एक संवैधानिक प्रक्रिया है और उन्हें उम्मीद है कि सरकार आवश्यक समर्थन जुटाने के बाद ही इसे सदन में लाएगी।

निष्कर्ष और आगे की राह

संसद के मॉनसून सत्र के ये अंतिम 4 दिन न केवल विधायी कार्यों के लिए बल्कि भविष्य की चुनावी राजनीति के लिए भी दिशा तय करेंगे। यदि सरकार परिसीमन और महिला आरक्षण जैसे बिलों को पारित कराने में सफल रहती है, तो यह एक बड़ी राजनीतिक जीत मानी जाएगी। विपक्ष की एकजुटता और क्षेत्रीय दलों का रुख इस पूरे घटनाक्रम में निर्णायक साबित होगा। फिलहाल, दिल्ली के सियासी गलियारों में सस्पेंस बरकरार है और सबकी नजरें संसद की कार्यवाही पर टिकी हैं।