केंद्रीय वाणिज्य एवं उद्योग मंत्री पीयूष गोयल ने जलवायु परिवर्तन और व्यापार नीतियों को लेकर यूरोप पर तीखा हमला बोला है और जर्मनी की राजधानी बर्लिन में आयोजित बर्लिन ग्लोबल डायलॉग 2026 में उन्होंने यूरोपीय संघ के कार्बन बॉर्डर एडजस्टमेंट मैकेनिज्म यानी सीबीएएम और व्यापार नीतियों की कड़ी आलोचना की। साथ ही क्लाइमेट फाइनेंसिंग पर 100 बिलियन डॉलर वाले वादे को याद दिलाया और विकसित देशों की नीतियों पर गंभीर सवाल खड़े किए।
पीयूष गोयल 22 से 27 अक्टूबर 2026 तक जर्मनी और नीदरलैंड के आधिकारिक दौरे पर हैं। बर्लिन में उन्होंने जलवायु वित्तपोषण पर भारत का पक्ष रखते हुए विकसित देशों की ऐतिहासिक जिम्मेदारियों को लेकर सवाल उठाए। उन्होंने तीखे शब्दों में कहा कि वे कम विकसित देशों की जरूरतों को ठीक से पूरा करने या उनके डीकार्बनाइजेशन की कोशिशों में उनका साथ देने में पूरी तरह नाकाम रहे हैं।
गोयल ने क्लाइमेट फाइनेंसिंग पर सवाल उठाते हुए कहा कि 2015 में पेरिस जलवायु सम्मेलन में पूरी दुनिया एक साथ आई थी। प्रधानमंत्री मोदी ने ही ग्लोबल साउथ को एक साथ लाया और देशों को सीओपी21 में जलवायु परिवर्तन को संबोधित करने के लिए प्रतिबद्ध होने के लिए प्रोत्साहित किया। इसमें सहमति हुई थी कि विकसित देश, जिन्होंने दशकों तक जलवायु को गड़बड़ाने का फल भोगा है, अधिक कीमत चुकाएंगे।
उन्होंने आगे कहा कि यह तय हुआ था कि विकसित देश, विकासशील और कम विकसित देशों का समर्थन करेंगे और इसमें प्रशांत और कैरेबियन में द्वीप राष्ट्र को भी शामिल किया गया था। इसके बाद विकसित देशों ने 100 बिलियन डॉलर प्रति वर्ष का वादा किया था, जो एक बड़ी प्रतिबद्धता थी। लेकिन वे कम विकसित देशों की जरूरतों को ठीक से पूरा करने और उनका साथ देने में पूरी तरह नाकाम हो गए हैं।
पीयूष गोयल ने नाराजगी जताते हुए कहा कि आज 2015 में हुए पेरिस जलवायु सम्मेलन के 11 साल पूरे हो चुके हैं, लेकिन हमने इसका एक पैसा भी नहीं देखा है। उन्होंने कहा कि ये सब केवल वादे हैं और साथ ही यह एक बड़ा सवाल भी है जिसका जवाब यूरोपीय संघ और सीबीएएम यानी कार्बन बॉर्डर एडजस्टमेंट मैकेनिज्म नहीं दे पाए हैं।
गोयल ने आगे तीखे शब्दों में कहा कि सबसे पहले इस गड़बड़ी के लिए आखिर कौन जिम्मेदार है। ओजोन लेयर को कहां नुकसान हुआ और इतना सारा कार्बन एटमॉस्फियर में किसने भेजा। मैं दुनिया की 17 प्रतिशत आबादी का रिप्रेजेंटेटिव हूं, लेकिन ग्लोबल कार्बन एमिशन में मेरा कंट्रीब्यूशन 3 प्रतिशत से भी कम है। यूरोप शायद दुनिया की आबादी का 3 प्रतिशत या 4 प्रतिशत रिप्रेजेंटेटिव है, और यह पूरी प्रॉब्लम आपकी वजह से हुई है।
गोयल ने कहा कि भारत क्लाइमेट एक्शन में अपनी भूमिका के प्रति पूरी तरह जागरूक और प्रतिबद्ध है, लेकिन पश्चिम बनाम भारत की आबादी के आकार और एमिशन आउटपुट के बीच साफ असंतुलन है। इसके बावजूद यूरोपीय संघ के कार्बन टैक्स यानी सीबीएएम और वनों की कटाई से जुड़े नियमों यानी ईयूडीआर को थोपना पूरी तरह से अनुचित है। यह अपने ही पैर पर कुल्हाड़ी मारना है और खुद आपदा को आमंत्रण देना है।
दरसअल, यूरोपीय संघ ने जलवायु परिवर्तन के नाम पर दो कड़े नियम लागू किए हैं। इनमें सीबीएएम कार्बन टैक्स शामिल है, जिसका उद्देश्य उन विदेशी सामानों पर टैक्स लगाना है, जिसे बनाने में कार्बन ज्यादा निकलता है। इसमें स्टील, एल्युमीनियम, लोहा और सीमेंट आते हैं। दूसरा नियम यह है कि यूरोप में सिर्फ वही सामान बेचे जा सकते हैं, जिसे बनाने में पेड़ों की कटाई नहीं की गई हो।
