पेपर लीक मामलों के लिए फास्ट ट्रैक कोर्ट का ऐलान: जानें कैसे काम करती हैं ये अदालतें

प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने पेपर लीक के दोषियों को कड़ी सजा दिलाने के लिए फास्ट ट्रैक कोर्ट के गठन की घोषणा की है। ये अदालतें सामान्य कोर्ट की तुलना में तीन गुना तेजी से मामलों का निपटारा करती हैं और अब तक लाखों केस सुलझा चुकी हैं।

प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने देश में परीक्षाओं की शुचिता बनाए रखने के लिए एक बड़ा कदम उठाया है। युवाओं के भविष्य के साथ खिलवाड़ करने वालों पर नकेल कसने के लिए पीएम मोदी ने ऐलान किया है कि पेपर लीक से जुड़े मामलों की सुनवाई अब फास्ट ट्रैक कोर्ट के जरिए की जाएगी। उन्होंने अपने एक्स (X) अकाउंट पर जानकारी साझा करते हुए कहा कि पेपर लीक में शामिल दोषियों को सख्त से सख्त सजा सुनिश्चित की जाएगी। फास्ट ट्रैक कोर्ट का मुख्य उद्देश्य रिकॉर्ड समय में न्याय दिलाना है ताकि अपराधियों में कानून का खौफ बना रहे।

क्या होती है फास्ट ट्रैक कोर्ट और कैसे करती है काम?

फास्ट ट्रैक कोर्ट का सीधा अर्थ है ऐसी अदालत जो किसी भी मामले की कम से कम समय में सुनवाई पूरी कर अपना फैसला सुनाती है। भारत में इस तरह की अदालतों की शुरुआत सबसे पहले साल 2000 में हुई थी। इसकी स्थापना 11वें वित्त आयोग की सिफारिशों के आधार पर की गई थी। उस समय इसका मुख्य उद्देश्य जिला और अधीनस्थ अदालतों में वर्षों से लंबित पड़े मुकदमों का तेजी से निपटारा करना था। इस योजना को 2011 तक चलाया गया था, जिसके बाद इसे कुछ समय के लिए रोक दिया गया था।

निर्भया कांड के बाद फिर बढ़ी अहमियत

देश में फास्ट ट्रैक कोर्ट की चर्चा दिल्ली के जघन्य निर्भया कांड के बाद एक बार फिर तेज हुई थी। उस समय जनता की मांग और अपराध की गंभीरता को देखते हुए दिल्ली उच्च न्यायालय ने बलात्कार और यौन उत्पीड़न के मामलों की त्वरित सुनवाई के लिए शुरुआत में 5 फास्ट ट्रैक कोर्ट को मंजूरी दी थी। बाद में इन अदालतों की संख्या बढ़ाकर 6 कर दी गई थी। इनमें से पहला विशेष फास्ट ट्रैक कोर्ट 2 जनवरी 2013 को दक्षिण दिल्ली के साकेत कोर्ट परिसर में शुरू हुआ था। निर्भया मामले की कानूनी कार्यवाही इसी कोर्ट से शुरू हुई थी। इसके बाद कई राज्यों ने अपने स्तर पर जघन्य अपराधों के लिए ऐसी व्यवस्थाएं लागू कीं।

2019 की फास्ट ट्रैक स्पेशल कोर्ट (FTSC) योजना

साल 2018 में केंद्र सरकार की निर्भया फंड समिति ने देश भर में 1023 फास्ट ट्रैक स्पेशल कोर्ट स्थापित करने के प्रस्ताव को हरी झंडी दी थी। इसे अक्टूबर 2019 में क्रिमिनल लॉ (संशोधन) अधिनियम 2018 और सुप्रीम कोर्ट के निर्देशों के बाद फास्ट ट्रैक स्पेशल कोर्ट (FTSC) योजना के तहत लागू किया गया। इस योजना का मुख्य लक्ष्य बलात्कार और पॉक्सो (POCSO) एक्ट के तहत दर्ज मामलों का त्वरित निपटारा करना है। सरकार का मानना है कि ऐसे संवेदनशील मामलों में देरी न्याय की मूल भावना के खिलाफ है।

फास्ट ट्रैक कोर्ट की स्थापना के पीछे के मुख्य कारण

फास्ट ट्रैक कोर्ट बनाने की जरूरत कई कारणों से महसूस की गई। सबसे बड़ा कारण यह था कि हत्या, बलात्कार और महिलाओं व बच्चों के खिलाफ होने वाले गंभीर अपराधों में फैसला आने में कई साल लग जाते थे और इसके अलावा अदालतों में लंबित मामलों का बोझ कम करना भी एक बड़ी प्राथमिकता थी। महिलाओं और बच्चों से जुड़े मामलों का तत्काल निपटारा करने और न्याय व्यवस्था पर आम जनता का भरोसा मजबूत करने के लिए इन अदालतों का गठन अनिवार्य हो गया था।

बजट और वित्तीय आवंटन का विवरण

केंद्र सरकार ने फास्ट ट्रैक स्पेशल कोर्ट (FTSC) योजना के सुचारू संचालन के लिए 1952 करोड़ 23 लाख रुपये का भारी-भरकम बजट आवंटित किया है। इस कुल राशि में से केंद्र सरकार निर्भया फंड के माध्यम से 1207 करोड़ 24 लाख रुपये का योगदान दे रही है। शेष खर्च संबंधित राज्य सरकारों द्वारा वहन किया जाता है। अब तक केंद्र सरकार की ओर से विभिन्न राज्यों और केंद्र शासित प्रदेशों को 1034 करोड़ 55 लाख रुपये की राशि जारी की जा चुकी है। वर्तमान में मध्य प्रदेश में 67 और केरल में 55 फास्ट ट्रैक कोर्ट सक्रिय रूप से काम कर रहे हैं।

देश में फास्ट ट्रैक कोर्ट की वर्तमान स्थिति

केंद्र सरकार ने 2025 के मॉनसून सत्र के दौरान संसद में जानकारी दी थी कि 30 जून 2025 तक देश के 29 राज्यों और केंद्र शासित प्रदेशों में कुल 725 फास्ट ट्रैक स्पेशल कोर्ट कार्य कर रहे हैं। इन अदालतों में 392 एक्सक्लूसिव पॉक्सो (POCSO) कोर्ट भी शामिल हैं। ये एक्सक्लूसिव कोर्ट केवल बच्चों के खिलाफ होने वाले यौन अपराधों की सुनवाई के लिए समर्पित हैं। आंकड़ों के अनुसार, अब तक इन फास्ट ट्रैक अदालतों में 334213 मामलों का सफलतापूर्वक निपटारा किया जा चुका है।

कार्यक्षमता: सामान्य अदालतों से तीन गुना तेज

सरकार द्वारा जारी आंकड़ों से पता चलता है कि सामान्य अदालतों में बलात्कार और पॉक्सो मामलों के निपटारे की औसत दर 3 दशमलव 26 मामले प्रति कोर्ट प्रति माह है। वहीं, फास्ट ट्रैक स्पेशल कोर्ट में यह औसत बढ़कर 9 दशमलव 51 मामले प्रति कोर्ट प्रति माह हो जाता है। इसका मतलब है कि ये अदालतें सामान्य अदालतों की तुलना में लगभग तीन गुना अधिक तेजी से काम कर रही हैं और राज्यों की बात करें तो सबसे ज्यादा 218 फास्ट ट्रैक कोर्ट उत्तर प्रदेश में स्थित हैं।

किन मामलों की होती है इन अदालतों में सुनवाई?

फास्ट ट्रैक कोर्ट में मुख्य रूप से बलात्कार, बच्चों के खिलाफ यौन अपराध, महिलाओं के खिलाफ गंभीर हिंसा और हत्या जैसे जघन्य अपराधों की सुनवाई की जाती है और इसके अलावा वरिष्ठ नागरिकों से जुड़े विशेष मामले और लंबे समय से लंबित गंभीर आपराधिक मामलों को भी यहां प्राथमिकता दी जाती है। राज्य सरकार या संबंधित हाईकोर्ट द्वारा चिन्हित किए गए विशेष मामलों को भी त्वरित सुनवाई के लिए इन अदालतों में भेजा जा सकता है।

फास्ट ट्रैक कोर्ट के प्रकार

ये अदालतें मुख्य रूप से दो प्रकार की होती हैं। पहली है सामान्य फास्ट ट्रैक स्पेशल कोर्ट, जो बलात्कार और पॉक्सो अधिनियम दोनों से जुड़े मामलों की एक साथ सुनवाई करती है। इनका लक्ष्य 6 महीने से 1 साल के भीतर फैसला सुनाना होता है। दूसरी है एक्सक्लूसिव पॉक्सो फास्ट ट्रैक कोर्ट, जो केवल और केवल बच्चों के यौन शोषण से जुड़े मामलों के लिए समर्पित होती है। इन अदालतों में पीड़ित बच्चों के लिए विशेष सुविधाएं होती हैं और उनके बयान दर्ज करते समय विशेष सावधानी बरती जाती है।

रिकॉर्ड समय में सुनाए गए कुछ प्रमुख फैसले

फास्ट ट्रैक अदालतों ने कई बार बहुत कम समय में न्याय देकर मिसाल कायम की है। गोरखपुर में 6 महीने की मासूम के साथ दुष्कर्म के आरोपी को अप्रैल 2026 में फास्ट ट्रैक कोर्ट ने मात्र 24 दिनों के भीतर आजीवन कारावास की सजा सुनाई। मध्य प्रदेश के इटारसी में साल 2023 में अपनी नाबालिग भतीजी से दुष्कर्म करने वाले को केवल 21 दिन में फांसी की सजा दी गई। दिल्ली में अप्रैल 2025 में एक 16 साल की नाबालिग से रेप के आरोपी को आजीवन कारावास मिला। वहीं, जून 2026 में महाराष्ट्र के नरसापुर में 3 साल की बच्ची से दुष्कर्म के मामले में केवल 55 दिन के अंदर फैसला सुनाया गया।

क्या इन फैसलों को चुनौती दी जा सकती है?

फास्ट ट्रैक स्पेशल कोर्ट कोई अलग न्यायिक प्रणाली नहीं है, बल्कि यह मौजूदा व्यवस्था का ही एक हिस्सा है। इनमें वही जज नियुक्त किए जाते हैं जिन्हें हाईकोर्ट या राज्य सरकार चुनती है। यहां भी भारतीय नागरिक सुरक्षा संहिता (BNSS) की वही धाराएं लागू होती हैं जो सामान्य अदालतों में होती हैं। इसलिए, फास्ट ट्रैक कोर्ट के फैसलों के खिलाफ भी उच्च अदालतों में अपील की जा सकती है। जिला स्तर की फास्ट ट्रैक कोर्ट के फैसले को हाईकोर्ट में और हाईकोर्ट स्तर के फैसले को सुप्रीम कोर्ट में चुनौती दी जा सकती है।