अमेरिकी रक्षा बजट के सामने बौने हुए 178 देश: पाकिस्तान की जीडीपी से 3 गुना ज्यादा खर्च

अमेरिकी संसद ने 1 ट्रिलियन 150 बिलियन डॉलर के रिकॉर्ड रक्षा बजट को मंजूरी दी है, जो दुनिया के 178 देशों की अर्थव्यवस्था से बड़ा और पाकिस्तान की जीडीपी से तीन गुना अधिक है।

हाल ही में अमेरिकी संसद के निचले सदन यानी हाउस ऑफ रिप्रेजेंटेटिव्स ने वित्तीय वर्ष के लिए 1 ट्रिलियन 150 बिलियन डॉलर के एक विशालकाय सैन्य बजट को हरी झंडी दिखा दी है। यह रिकॉर्ड तोड़ रक्षा विधेयक भारतीय मुद्रा में लगभग 111 लाख करोड़ रुपये के बराबर है। यह रकम इतनी विशाल है कि दुनिया के करीब 178 देशों की कुल अर्थव्यवस्था यानी जीडीपी भी इसके सामने छोटी नजर आती है। अमेरिका का यह अकेला रक्षा बजट हमारे पड़ोसी देश पाकिस्तान की पूरी जीडीपी से तीन गुना से भी अधिक है। इस भारी भरकम बजट के पारित होते ही वैश्विक अर्थव्यवस्था और सैन्य विशेषज्ञों के बीच आंकड़ों को लेकर चर्चा तेज हो गई है।

आंकड़ों का गणित: 178 देश कैसे पीछे छूटे?

दुनिया में वर्तमान में लगभग 195 मान्यता प्राप्त देश हैं। यदि हम इंटरनेशनल मॉनेटरी फंड और वर्ल्ड बैंक के जीडीपी आंकड़ों की तुलना करें, तो केवल 17 देशों की जीडीपी ही 1 ट्रिलियन 150 बिलियन डॉलर से अधिक है। इस सूची में अमेरिका, चीन, जर्मनी, जापान, भारत, ब्रिटेन, फ्रांस और इटली जैसे बड़े आर्थिक महाशक्ति देश शामिल हैं। इसका सीधा मतलब यह है कि दुनिया के लगभग 178 देश साल भर में जितना उत्पादन और कमाई करते हैं, अमेरिका उससे कहीं ज्यादा पैसा केवल अपनी सेना और रक्षा जरूरतों पर खर्च करने जा रहा है। यह आंकड़ा अमेरिकी सैन्य शक्ति की आर्थिक मजबूती को दर्शाता है।

पाकिस्तान और बांग्लादेश की जीडीपी से तुलना

अगर हम भारत के पड़ोसियों और क्षेत्रीय अर्थव्यवस्थाओं से इस बजट की तुलना करें, तो आंकड़े और भी चौंकाने वाले सामने आते हैं। पाकिस्तान की कुल जीडीपी वर्तमान में 350 बिलियन डॉलर से 370 बिलियन डॉलर के बीच अनुमानित है। इसका अर्थ है कि अमेरिकी रक्षा बजट पाकिस्तान की पूरी जीडीपी का 3 और 20 प्रतिशत यानी 3 गुना से भी अधिक है। सरल शब्दों में समझें तो पाकिस्तान अपनी कृषि, उद्योग, आईटी और सेवा क्षेत्र को मिलाकर साल भर में जितना कमाता है, अमेरिका उससे तीन गुना ज्यादा रकम अपनी थलसेना, वायुसेना, नौसेना और नए हथियारों के विकास पर खर्च कर देता है। इसी तरह बांग्लादेश की जीडीपी 450 बिलियन डॉलर से 480 बिलियन डॉलर के बीच है, और अमेरिकी रक्षा बजट उसकी अर्थव्यवस्था से भी 2 और 50 प्रतिशत यानी ढाई गुना बड़ा है।

वैश्विक सैन्य खर्च में अमेरिका की हिस्सेदारी

पूरी दुनिया का कुल सैन्य खर्च लगभग 3 ट्रिलियन 400 बिलियन डॉलर के आसपास है। इसमें से अकेला अमेरिका दुनिया के कुल सैन्य खर्च का लगभग 40 प्रतिशत हिस्सा वहन करता है। यह बजट न केवल अमेरिकी सेना के आधुनिक हथियारों, रिसर्च और सैनिकों के वेतन के लिए है, बल्कि इसमें ईरान से बढ़ते तनाव और मिडिल ईस्ट में संभावित युद्ध की तैयारियों के लिए भी अतिरिक्त अरबों डॉलर सुरक्षित रखे गए हैं। अमेरिका अपनी सैन्य सर्वोच्चता बनाए रखने के लिए किसी भी हद तक खर्च करने को तैयार नजर आ रहा है।

कहां खर्च होगी यह विशाल धनराशि?

इस 1 ट्रिलियन 150 बिलियन डॉलर के बजट का एक बड़ा हिस्सा मध्य पूर्व में बढ़ते संघर्षों और रेड सी यानी लाल सागर के समुद्री मार्गों की सुरक्षा के लिए आवंटित किया गया है। ईरान के साथ संभावित सैन्य टकराव के लिए आपातकालीन फंड की व्यवस्था की गई है। इसके अलावा, इंडो पैसिफिक क्षेत्र और चीन पर नजर रखने के लिए भी भारी निवेश किया जा रहा है। ताइवान जलडमरूमध्य और दक्षिण चीन सागर में चीनी प्रभाव को रोकने के लिए नौसेना और लंबी दूरी की मिसाइलों के आधुनिकीकरण पर विशेष ध्यान दिया गया है।

भविष्य के युद्ध और तकनीक पर निवेश

अगली पीढ़ी के युद्ध के लिए अमेरिका आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस और हाइपरसोनिक हथियारों में बड़ा निवेश कर रहा है। बजट में एआई ड्रोन्स, साइबर वॉरफेयर और हाइपरसोनिक मिसाइल टेक्नोलॉजी के लिए विशेष प्रावधान किए गए हैं। साथ ही, अमेरिका के न्यूक्लियर ट्राइएड यानी पनडुब्बी, बॉम्बर और अंतरमहाद्वीपीय मिसाइलों को अपग्रेड करने की योजना है ताकि उसकी परमाणु क्षमता आधुनिक और अचूक बनी रहे। यह निवेश दर्शाता है कि अमेरिका भविष्य की चुनौतियों के लिए खुद को तैयार कर रहा है।

वैश्विक राजनीति और भारत पर प्रभाव

अमेरिका और चीन के बीच बढ़ती सैन्य होड़ आने वाले समय में वैश्विक सुरक्षा समीकरणों को और अधिक जटिल बना सकती है। भारत के लिए अमेरिका का मजबूत डिफेंस इंडस्ट्रियल बेस तकनीकी सहयोग के लिहाज से अहम है। इंडो पैसिफिक क्षेत्र में रणनीतिक संतुलन बनाए रखने के लिए भारत और अमेरिका के रक्षा संबंध महत्वपूर्ण साबित हो सकते हैं। हालांकि, मिडिल ईस्ट में अमेरिकी सैन्य गतिविधियों के बढ़ने से कच्चे तेल की कीमतों और समुद्री व्यापार मार्गों पर सीधा असर पड़ सकता है, जो वैश्विक अर्थव्यवस्था को प्रभावित करेगा। अमेरिका का यह रक्षा बजट केवल एक वित्तीय आंकड़ा नहीं है, बल्कि उसकी वैश्विक सैन्य सर्वोच्चता का प्रमाण है।