Lok Sabha Elections / UP में इस जाति के लिए गरमाई पॉलिटिक्स- लोकसभा चुनाव के लिए अब OBC पर राजनीती

Zoom News : Nov 26, 2023, 05:25 PM
Lok Sabha Elections: देश में इन दिनों OBC पॉलिटिक्स का ट्रेंड चल रहा है. इंडिया गठबंधन का तो ये सबसे बड़ा एजेंडा है. आरजेडी, जेडीयू और समाजवादी पार्टी तो शुरू से ये मुद्दा उठाती रही है, पर अब तो राहुल गांधी इसके सबसे बड़े पैरोकार बन गए हैं. वे इन दिनों हर मंच से कास्ट सेन्सस कराने का वादा कर रहे हैं. जिसकी जितनी संख्या भारी, उसकी उतनी हिस्सेदारी के नारे फिर से बुलंद हैं. अगले लोकसभा चुनाव के लिए बीजेपी के खिलाफ इंडिया गठबंधन ने इसे सबसे बड़ा हथियार बना लिया है. गठबंधन के घटक दल इसी बहाने बीजेपी के सोशल इंजीनियरिंग को तोड़ने की जुगाड़ में है.

यूपी में पिछड़ी बिरादरी के वोटर अलग-अलग पार्टी और नेताओं से जुड़े हुए हैं. यादव, राजभर और निषाद समाज के वोटर अपनी पसंद के झंडे थाम चुके हैं. आंकड़े बताते हैं कि यादव के बाद सबसे प्रभावशाली कुर्मी वोटर हैं. यूपी में इनकी आबादी करीब छह प्रतिशत बताई जाती है.

यूपी में पिछले लोकसभा और विधानसभा चुनाव में कुर्मी वोटरों ने किसी एक पार्टी का समर्थन नहीं किया. इस बिरादरी का एक बड़ा हिस्सा बीजेपी को मिला. समाजवादी पार्टी और कांग्रेस को भी कई सीटों पर कुर्मी वोट मिले. अब असली चुनौती तो लोकसभा चुनाव की है. अपना सामाजिक समीकरण दुरुस्त करने के लिए बीजेपी ने अपना दल से गठबंधन किया है. कुर्मी वोट के लिए अखिलेश यादव ने अपना दल कमेरावादी पार्टी से चुनावी तालमेल किया है.

कुर्मी समाज की बदलती रहती है पसंद और नापसंद

कुर्मी वोट कभी किसी एक पार्टी के साथ नहीं रहा. हर चुनाव में इस समाज की पसंद और नापसंद बदल जाती है. पिछले विधानसभा चुनाव में समाजवादी पार्टी के 13 कुर्मी विधायक चुने गए थे, जबकि पांच साल पहले हुए चुनाव में पार्टी के पास बस दो ही कुर्मी एमएलए थे. चुनावी नतीजे बताते हैं कि समाजवादी पार्टी को भी इस बिरादरी के खूब वोट मिले. यही संकेत बीजेपी के लिए खतरे की घंटी है, जबकि यूपी में बीजेपी गैर यादव पिछड़ों के एकजुटता के दावे करती रही है. पिछले विधानसभा चुनाव में बीजेपी के 22 कुर्मी विधायक बने थे. इसी बिरादरी के 24 विधायक 2017 में चुने गए थे, लेकिन 2022 के यूपी चुनाव में बीजेपी के कुर्मी विधायकों की संख्या घट कर 22 रह गई.

अपना दल 2014 के आम चुनाव से ही यूपी में बीजेपी की सहयोगी दल है. कुर्मी वोटरों को साधने के लिए अमित शाह ने अनुप्रिया पटेल के साथ गठबंधन किया. पिछले विधानसभा चुनाव में अपना दल के 12 नेता जीत कर विधायक बने. इनमें से 5 कुर्मी जाति के हैं. अगस्त के महीने से अपना दल एक्शन में है. पार्टी के पास दो लोकसभा सांसद हैं. अगली चुनौती लोकसभा चुनाव की है.

अनुप्रिया पटेल के सामने चुनौती

मोदी सरकार में मंत्री अनुप्रिया पटेल के सामने दूसरी चुनौती उनकी अपनी बहन पल्लवी पटेल हैं, जो अखिलेश यादव के साथ हैं. पल्लवी ने अपना मां के साथ मिलकर अपना दल कमेरावादी पार्टी बना लिया है. उन्होंने पिछले विधानसभा चुनाव में डिप्टी सीएम केशव प्रसाद मौर्य को हरा कर सबको चौंका दिया था. पल्लवी को आगे कर अखिलेश यादव ने कुर्मी वोट बटोरने की तैयारी की है. पार्टी के पास इस समाज के अपने बड़े नेता भी हैं. राम प्रसाद चौधरी, लालजी वर्मा, नरेन्द्र वर्मा और नरेश उत्तम पटेल में से कुछ को लोकसभा चुनाव लड़ाने की चर्चा है.

कांग्रेस ने भी कुर्मी वोटर के लिए जमीन आसमान एक कर रखा है. पार्टी के इस समाज से अपना कोई बड़ा नेता तो नहीं है इसलिए दूसरी पार्टियों से नेता तोड़े जा रहे हैं. पहले रवि वर्मा और अब प्रमोद पटेल को समाजवादी पार्टी से कांग्रेस में शामिल कराया गया है. बीएसपी में एक दौर में कुर्मी समाज के कई बड़े नेता हुआ करते थे. पर इनमें से कुछ समाजवादी पार्टी में चले गए तो कई बीजेपी के साथ हो गए.

कुर्मी जाति के वोटर बड़े सजग और सतर्क

महाराजगंज से लोकसभा सांसद पंकज चौधरी मोदी सरकार में मंत्री हैं. बीजेपी के प्रदेश अध्यक्ष रहे स्वतंत्र देव सिंह योगी सरकार में सिंचाई मंत्री हैं. बीजेपी के सामने चुनौती कुर्मी वोटरों को अपना बनाए रखने की है. यूपी की 80 में से कम से कम डेढ़ दर्जन सीटें कुर्मी जाति के दबदबे वाली हैं. इन लोकसभा क्षेत्रों में इस बिरादरी के लोग हार जीत का फैसला करते रहे हैं. बाराबंकी, पीलीभीत, लखीमपुर खीरी, वाराणसी, चंदौली, प्रतापगढ़, बरेली, मिर्जापुर, बांदा, फूलपुर ऐसी ही सीटें हैं. राजनीतिक रूप से कुर्मी जाति के वोटर बड़े सजग और सतर्क माने जाते हैं.

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