भारतीय रिजर्व बैंक यानी आरबीआई द्वारा आगामी मौद्रिक नीति बैठकों में रेपो रेट को 5 पॉइंट 25 फीसदी पर स्थिर रखने की प्रबल संभावना जताई जा रही है। वैश्विक स्तर पर बदलती परिस्थितियों और विशेष रूप से अमेरिका और ईरान के बीच हुए शांति समझौते के बाद अंतरराष्ट्रीय अनिश्चितता में कमी आई है। इस कूटनीतिक विकास ने भारतीय केंद्रीय बैंक को एक स्थिर वातावरण प्रदान किया है, जिससे फिलहाल ब्याज दरों में किसी भी बदलाव की जल्दबाजी नहीं दिख रही है। ब्रोकरेज फर्म बोफा सिक्योरिटीज (BofA Securities) की एक ताजा रिपोर्ट के अनुसार, आरबीआई फिलहाल इंतजार और निगरानी यानी वेट एंड वॉच की रणनीति पर कायम रहेगा। बैंक का मुख्य ध्यान घरेलू और अंतरराष्ट्रीय कारकों के बीच संतुलन बनाने पर है ताकि आर्थिक स्थिरता बनी रहे और विकास की गति प्रभावित न हो।
वैश्विक अनिश्चितता में कमी और आरबीआई का रुख
बोफा सिक्योरिटीज की रिपोर्ट में इस बात का उल्लेख किया गया है कि जून की मौद्रिक नीति समिति यानी एमपीसी की बैठक के बाद से आर्थिक माहौल पहले की तुलना में काफी अधिक स्थिर हुआ है। अमेरिका और ईरान के बीच शांति समझौते ने भू-राजनीतिक जोखिमों को कम किया है, जिसका सकारात्मक असर वैश्विक बाजारों पर पड़ा है और हालांकि, आरबीआई के लिए चुनौतियां पूरी तरह समाप्त नहीं हुई हैं। खाद्य पदार्थों और ईंधन की कीमतों में होने वाला उतार-चढ़ाव अभी भी चिंता का एक बड़ा विषय बना हुआ है। आरबीआई गवर्नर संजय मल्होत्रा ने भी इस ओर संकेत दिया है कि हालांकि कोर इंफ्लेशन यानी मुख्य मुद्रास्फीति नियंत्रण में है, लेकिन महंगाई को लेकर कुछ जोखिम अभी भी बरकरार हैं और रिपोर्ट के अनुसार, केंद्रीय बैंक मानसून की प्रगति, खाद्य कीमतों के रुझान और कच्चे तेल की अंतरराष्ट्रीय कीमतों पर पैनी नजर रखेगा। इन सभी कारकों का स्पष्ट प्रभाव सामने आने के बाद ही भविष्य में किसी नीतिगत बदलाव पर विचार किया जाएगा।
विकास दर और महंगाई के अनुमानों में बदलाव
जून में हुई एमपीसी की बैठक में सभी सदस्यों ने सर्वसम्मति से रेपो रेट को 5 पॉइंट 25 फीसदी पर बरकरार रखने का निर्णय लिया था। इसके साथ ही आरबीआई ने अपनी न्यूट्रल यानी तटस्थ नीति के रुख को भी जारी रखा है। हालांकि, भविष्य की चुनौतियों को देखते हुए बैंक ने कुछ महत्वपूर्ण अनुमानों में संशोधन किया है। वित्त वर्ष 2026-27 के लिए आर्थिक विकास दर के अनुमान को 30 बेसिस पॉइंट घटाकर 6 पॉइंट 6 फीसदी कर दिया गया है। इसके विपरीत, मौसम से जुड़े जोखिमों और कृषि उत्पादन पर पड़ने वाले संभावित असर को देखते हुए महंगाई का अनुमान 50 बेसिस पॉइंट बढ़ाकर 5 पॉइंट 1 फीसदी कर दिया गया है। समिति के सदस्यों का मानना है कि वैश्विक हालात और महंगाई का दबाव अभी भी भारतीय अर्थव्यवस्था के लिए एक बड़ी चुनौती बने हुए हैं, जिसके लिए निरंतर सतर्कता आवश्यक है।
एमपीसी सदस्यों की सतर्कता और भविष्य की राह
मौद्रिक नीति समिति के आंतरिक सदस्यों ने समय से पहले ब्याज दरों में बढ़ोतरी करने के खिलाफ चेतावनी दी है। उनका तर्क है कि वर्तमान में महंगाई का मुख्य कारण सप्लाई यानी आपूर्ति से जुड़ी बाधाएं और आयातित लागत में वृद्धि है। ऐसी स्थिति में यदि ब्याज दरों में जल्दबाजी में सख्ती की जाती है, तो इसका सीधा असर देश की आर्थिक गतिविधियों और विकास की गति पर पड़ सकता है। वहीं, समिति के बाहरी सदस्यों ने भी आर्थिक विकास को गति देने की आवश्यकता पर बल दिया है। उनका कहना है कि हालांकि कच्चे तेल की ऊंची कीमतें भविष्य में महंगाई बढ़ा सकती हैं, लेकिन वर्तमान परिस्थितियों में ब्याज दरों में बढ़ोतरी की कोई तत्काल आवश्यकता नहीं है। बोफा सिक्योरिटीज के विश्लेषण के अनुसार, जून में एमपीसी का रुख न तो बहुत सख्त था और न ही बहुत नरम। समिति का झुकाव तटस्थ से हल्का नरम बना हुआ है, जिससे निकट भविष्य में रेपो रेट में बढ़ोतरी की संभावना काफी कम है और ब्याज दरें 5 पॉइंट 25 फीसदी पर ही बनी रह सकती हैं।
