RSS महासचिव दत्तात्रेय होसबोले का वाशिंगटन में संबोधन: भारत की गलत धारणाओं पर प्रहार

RSS महासचिव दत्तात्रेय होसबोले ने वाशिंगटन के हडसन इंस्टीट्यूट में भारत के प्रति अमेरिकी धारणाओं को चुनौती दी। उन्होंने भारत को चौथी सबसे बड़ी अर्थव्यवस्था और टेक हब बताते हुए हिंदू पहचान को सभ्यतागत बताया। होसबोले ने भारत-अमेरिका संबंधों में आपसी भरोसे और संवाद की आवश्यकता पर बल दिया।

भारत की छवि और वैश्विक वास्तविकता

राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ (RSS) के महासचिव दत्तात्रेय होसबोले ने वाशिंगटन स्थित हडसन इंस्टीट्यूट में भारत-अमेरिका संबंधों पर अपने विचार साझा किए। उन्होंने स्पष्ट रूप से कहा कि अमेरिका में भारत को लेकर कई गलत धारणाएं व्याप्त हैं। होसबोले के अनुसार, भारत को अक्सर केवल गरीबी, झुग्गियों और सांप-सपेरों के देश के रूप में देखा जाता है, जबकि वास्तविकता इसके विपरीत है। उन्होंने जोर देकर कहा कि भारत आज एक प्रमुख टेक हब बन चुका है और दुनिया की चौथी सबसे बड़ी अर्थव्यवस्था के रूप में उभर रहा है। उन्होंने खेद व्यक्त किया कि ये महत्वपूर्ण तथ्य अक्सर आम धारणाओं में नजरअंदाज कर दिए जाते हैं।

नकारात्मक नैरेटिव और हिंदू पहचान की व्याख्या

दत्तात्रेय होसबोले ने उन नैरेटिव्स पर भी प्रहार किया जो भारत को हिंदू सुप्रीमेसी, एंटी-माइनॉरिटी, एंटी-महिला और एंटी-मॉडर्न के रूप में चित्रित करते हैं। उन्होंने कहा कि इस तरह के नैरेटिव जानबूझकर बनाए गए हैं, जिसके कारण भारत में हो रहे सकारात्मक कार्यों को अक्सर सामने नहीं लाया जाता। जब उनसे भारत की बढ़ती हिंदू पहचान और पड़ोसी देशों के साथ तनाव पर सवाल पूछा गया, तो उन्होंने स्पष्ट किया कि RSS की दृष्टि में हिंदू पहचान एक सभ्यतागत पहचान है, न कि केवल एक धार्मिक पहचान। उन्होंने कहा कि संघ ने हमेशा सांस्कृतिक मूल्यों और सभ्यतागत आदर्शों पर जोर दिया है, जिनका किसी विशेष धर्म से सीधे तौर पर कोई लेना-देना नहीं है।

पड़ोसी देशों के साथ संबंध और संवाद की नीति

होसबोले ने बताया कि राजनीतिक स्वार्थ और इतिहास की गलत व्याख्या के कारण समय-समय पर तनाव पैदा होता रहा है और उन्होंने कहा कि RSS का मानना है कि विभिन्न समूहों के साथ लगातार और व्यापक बातचीत करने से गलतफहमियों को दूर करने में मदद मिलेगी। उन्होंने जानकारी दी कि RSS वर्तमान में अल्पसंख्यकों के एक समूह और उनके नेताओं के साथ इस तरह के संवाद में सक्रिय रूप से लगा हुआ है और पड़ोसी देशों के साथ तनाव के मुद्दे पर उन्होंने कहा कि इसके पीछे कई कारण हैं, जिनमें वहां का राजनीतिक नेतृत्व भी शामिल है। उन्होंने स्वीकार किया कि पिछले कुछ दशकों में आपसी तालमेल और भरोसे को चोट पहुंची है।

रणनीतिक साझेदारी और भविष्य की राह

दत्तात्रेय होसबोले ने विशेष रूप से एक पड़ोसी देश का उल्लेख करते हुए कहा कि असल समस्या सिर्फ उस देश के साथ है जो भारत की ही कोख से पैदा हुआ था। उन्होंने कहा कि अब वह एक अलग पड़ोसी देश बन चुका है, लेकिन कई लोग उस देश के पीछे पड़कर समस्याएं खड़ी कर रहे हैं। भारत की पूरी क्षमता के इस्तेमाल के सवाल पर उन्होंने कहा कि यदि अमेरिका भारत के साथ एक मजबूत रणनीतिक साझेदारी चाहता है, तो इसके लिए एक बेहतर रिश्ते की जरूरत है। उन्होंने जोर दिया कि यह साझेदारी केवल आपसी भरोसे, संवाद और सभी को समान अवसर देकर ही संभव हो सकती है। उन्होंने अंत में लोगों के बीच आपसी संबंधों को और अधिक मजबूत करने की आवश्यकता पर बल दिया।