रूस में पहली युद्धकालीन संसदीय चुनाव प्रक्रिया रविवार को समाप्त हो गई है, जिसमें राष्ट्रपति व्लादिमीर पुतिन की नीतियों का लगभग कोई विरोध नहीं देखा गया। इस चुनाव प्रक्रिया से क्रेमलिन के प्रभुत्व के और अधिक मजबूत होने की पूरी संभावना जताई जा रही है। यह चुनाव ऐसे समय में हुए हैं जब रूस और यूक्रेन के बीच संघर्ष जारी है, और क्रेमलिन इस मतदान के जरिए अपनी नीतियों के लिए व्यापक जनसमर्थन दिखाना चाहता है। निचले सदन स्टेट ड्यूमा में क्रेमलिन की मुख्य पार्टी 'यूनाइटेड रशिया' के अपना भारी बहुमत बरकरार रखने की व्यापक उम्मीद है।
युद्ध के बीच मतदान और सुरक्षा की स्थिति
चुनाव के अंतिम दिन सुरक्षा की स्थिति काफी तनावपूर्ण रही। यूक्रेनी बलों ने रातभर रूस पर 1000 से अधिक ड्रोन दागे, जिनमें से सैकड़ों ड्रोन सीधे मॉस्को की ओर भेजे गए थे। इन हमलों के बावजूद मतदान की प्रक्रिया जारी रही। क्रेमलिन ने इन चुनावों का उपयोग यह दिखाने के लिए किया है कि 2022 में यूक्रेन पर पूर्ण पैमाने पर हमला शुरू होने के बाद भी जनता सरकार के साथ खड़ी है। सरकार ने असहमति की हर आवाज को दबाकर राजनीतिक जोखिमों को कम करने की पूरी कोशिश की है।
मतदान प्रक्रिया और मतदाताओं की भागीदारी
यह मतदान प्रक्रिया शुक्रवार को शुरू हुई थी। रूस के 111 मिलियन पात्र मतदाताओं की भागीदारी बढ़ाने के लिए प्रशासन ने ऑनलाइन मतदान को काफी प्रोत्साहित किया। इस चुनाव की एक बड़ी विशेषता यह रही कि इसमें पहली बार यूक्रेन के उन चार क्षेत्रों के निवासियों को भी शामिल किया गया, जिन्हें युद्ध शुरू होने के बाद मॉस्को ने अपने क्षेत्र में मिला लिया था। हालांकि, इन क्षेत्रों पर अभी भी रूस का पूरी तरह से नियंत्रण नहीं है और इसके अलावा, 2014 में रूस द्वारा कब्जा किए गए क्रीमिया प्रायद्वीप में भी मतदान संपन्न हुआ।
अंतरराष्ट्रीय प्रतिक्रिया और कीव का विरोध
यूक्रेन की राजधानी कीव के प्राधिकारियों ने रूस के कब्जे वाले क्षेत्रों में हो रहे इस मतदान को पूरी तरह से अवैध करार दिया है। उन्होंने विदेशी सरकारों से अपील की है कि वे इन चुनावों के परिणामों को मान्यता न दें और यूरोपीय संघ ने भी शुक्रवार को इस कदम की कड़ी आलोचना की और इसे अंतरराष्ट्रीय कानून का खुला उल्लंघन बताया। क्रेमलिन इन आलोचनाओं के बावजूद अपनी कार्रवाई को वैधता दिलाने के लिए इस चुनावी प्रक्रिया को एक महत्वपूर्ण उपकरण के रूप में देख रहा है।
संसदीय सीटों का गणित और राजनीतिक नियंत्रण
रूस के मतदाताओं ने इस चुनाव में दो अलग-अलग मतपत्रों के जरिए अपना वोट डाला। 450 सदस्यीय ड्यूमा की आधी सीटों के लिए मतदाताओं ने राजनीतिक दलों का चयन किया, जबकि बाकी आधी सीटों पर एकल-सीट निर्वाचन क्षेत्रों में व्यक्तिगत उम्मीदवारों के बीच मुकाबला हुआ। सरकारी मीडिया के बड़े पैमाने पर प्रचार और वास्तविक विपक्ष की अनुपस्थिति के कारण क्रेमलिन का रूसी राजनीति पर नियंत्रण और भी कड़ा होने की उम्मीद है। बढ़ती आर्थिक लागत और ड्रोन हमलों के बावजूद पुतिन की पकड़ मजबूत बनी हुई है।
विपक्ष की स्थिति और पाबंदियां
रूस में 'व्यवस्थित विपक्ष' कहलाने वाली कई छोटी पार्टियां भी चुनाव मैदान में थीं, लेकिन ये पार्टियां आमतौर पर सभी प्रमुख मुद्दों पर पुतिन के विचारों के अनुरूप ही मतदान करती हैं। उदारवादी याब्लोको पार्टी एकमात्र ऐसी पंजीकृत पार्टी थी जिसने सार्वजनिक रूप से युद्ध की आलोचना करने का साहस दिखाया था। हालांकि, रूस के सुप्रीम कोर्ट ने पिछले महीने ही उसे चुनाव से बाहर कर दिया था। अब केवल कुछ दर्जन उम्मीदवार ही एकल-सीट क्षेत्रों में मैदान में बचे हैं। कई युद्ध-विरोधी नेताओं को या तो जेल भेज दिया गया है या उन्हें देश छोड़ने पर मजबूर किया गया है।
पर्यवेक्षकों की कमी और ओएससीई का रुख
चुनाव की पारदर्शिता पर भी सवाल उठे हैं। याब्लोको और कम्युनिस्ट पार्टी ने आरोप लगाया कि उनके कई पर्यवेक्षकों को मतदान केंद्रों में प्रवेश नहीं करने दिया गया। रूस ने इस बार यूरोप में सुरक्षा और सहयोग संगठन (ओएससीई) के पर्यवेक्षकों को भी आमंत्रित नहीं किया। रूसी विदेश मंत्रालय ने संगठन पर दोहरा मापदंड अपनाने का आरोप लगाया है। वहीं, ओएससीई संसदीय सभा के अध्यक्ष पेरे जोआन पोंस ने कहा कि रूस का यह फैसला एक सदस्य के रूप में उसकी प्रतिबद्धताओं का उल्लंघन है।
