होर्मुज जलडमरूमध्य खुलने से कच्चे तेल के दाम धड़ाम, भारत के इन सेक्टर्स को मिलेगी बड़ी राहत

अमेरिका और ईरान के बीच शांति समझौते की सुगबुगाहट से स्ट्रेट ऑफ होर्मुज खुलने की उम्मीद जगी है। इससे वैश्विक तेल कीमतों में 3 फीसदी से अधिक की गिरावट आई है, जिससे भारत के आयात बिल और महंगाई पर सकारात्मक असर पड़ेगा।

अमेरिका और ईरान के बीच पिछले 3 महीनों से जारी तनाव अब जल्द ही समाप्त हो सकता है। ईरान ने अमेरिका के शांति प्रस्ताव पर अपनी सहमति व्यक्त की है, जिसमें सामरिक रूप से अत्यंत महत्वपूर्ण स्ट्रेट ऑफ होर्मुज को फिर से खोलने की बात शामिल है। राजनीतिक गलियारों में यह अनुमान लगाया जा रहा है कि दोनों देशों के बीच आगामी 14 जून को डोनाल्ड ट्रंप के जन्मदिन के अवसर पर एक औपचारिक संधि हो सकती है। जब से इस क्षेत्र में संघर्ष की स्थिति बनी है, तब से स्ट्रेट ऑफ होर्मुज वैश्विक चर्चा का केंद्र रहा है। ईरान द्वारा इसे बंद किए जाने से पूरी दुनिया की तेल अर्थव्यवस्था चरमरा गई थी, लेकिन अब इसके जल्द खुलने की उम्मीद ने वैश्विक बाजारों में नई जान फूंक दी है।

वैश्विक तेल बाजार पर प्रभाव

मध्य पूर्व में तनाव कम होने और स्ट्रेट ऑफ होर्मुज के खुले रहने की संभावना वैश्विक तेल बाजार के लिए एक बड़ी राहत भरी खबर है। फारस की खाड़ी को अरब सागर से जोड़ने वाला यह संकरा समुद्री रास्ता वैश्विक तेल आपूर्ति की जीवन रेखा माना जाता है। जब भी इस मार्ग पर संकट के बादल मंडराते हैं, कच्चे तेल की कीमतों में भारी उछाल आता है। वहीं, मार्ग के सामान्य होने की खबर मात्र से बाजार में स्थिरता लौटने लगती है। होर्मुज खुलने की खबरों के बीच कच्चे तेल के दामों में बड़ी गिरावट दर्ज की गई है और ट्रेड इकोनॉमिक्स के आंकड़ों के अनुसार, क्रूड ऑयल और ब्रेंट क्रूड की कीमतों में 3 फीसदी से ज्यादा की कमी आई है।

ऊर्जा सुरक्षा के लिए होर्मुज का महत्व

वैश्विक ऊर्जा कारोबार के लिए होर्मुज स्ट्रेट का महत्व आंकड़ों से समझा जा सकता है। 09 करोड़ बैरल तेल गुजरता है, जो पूरी दुनिया की पेट्रोलियम खपत का लगभग 20 प्रतिशत हिस्सा है। इसके अलावा, दुनिया के कुल एलएनजी (LNG) व्यापार का भी 20 प्रतिशत हिस्सा इसी रास्ते से होकर गुजरता है। सरल शब्दों में कहें तो दुनिया का हर पांचवां तेल बैरल और हर पांचवां एलएनजी कार्गो इसी जलडमरूमध्य से निकलता है। यही कारण है कि इस मार्ग में कोई भी रुकावट भारत जैसे बड़े आयातक देशों की अर्थव्यवस्था को सीधे तौर पर प्रभावित करती है।

प्रमुख उत्पादक देशों की भूमिका

सऊदी अरब, इराक, संयुक्त अरब अमीरात, कुवैत और कतर जैसे प्रमुख तेल उत्पादक देशों का निर्यात इसी मार्ग पर निर्भर है। इन देशों का तेल एशिया और यूरोप के बाजारों तक पहुंचाने में होर्मुज की भूमिका निर्णायक है। हालांकि, तेल विशेषज्ञों का मानना है कि यदि स्ट्रेट ऑफ होर्मुज अभी खुलता भी है, तो भी सप्लाई चेन को पूरी तरह से पहले जैसी स्थिति में लौटने में लगभग 1 साल का समय लग सकता है। इसके बावजूद, मार्ग खुलने से इन उत्पादक देशों को अपनी अर्थव्यवस्था को गति देने में मदद मिलेगी।

गैस और एलएनजी व्यापार पर असर

होर्मुज केवल कच्चे तेल का ही नहीं, बल्कि वैश्विक गैस व्यापार का भी प्रमुख केंद्र है। दुनिया की लगभग 20 प्रतिशत एलएनजी सप्लाई इसी रास्ते से होती है। विशेष रूप से कतर का विशाल गैस निर्यात पूरी तरह से होर्मुज पर टिका है। इस मार्ग में बाधा आने से वैश्विक गैस बाजार में कीमतों का दबाव बढ़ जाता है, जिससे बिजली उत्पादन और औद्योगिक लागत में वृद्धि होती है।

भारत के लिए क्यों है यह बड़ी खबर?

स्ट्रेट ऑफ होर्मुज का खुलना भारत के लिए अत्यंत लाभकारी है। भारत दुनिया का तीसरा सबसे बड़ा तेल आयातक है और अपनी जरूरत का लगभग 85-88 प्रतिशत कच्चा तेल विदेशों से मंगवाता है। भारत के कुल तेल आयात का करीब 35-40 प्रतिशत हिस्सा उन देशों से आता है जिनका माल होर्मुज से होकर गुजरता है। सप्लाई बाधित होने के कारण हाल के दिनों में भारत में घरेलू एलपीजी से लेकर कमर्शियल सिलेंडर और पेट्रोल-डीजल के दामों में बढ़ोतरी देखी गई थी। होर्मुज खुलने से कच्चे तेल के दाम गिरेंगे, जिससे भारतीय तेल विपणन कंपनियों पर वित्तीय दबाव कम होगा। इसके साथ ही, समुद्री जहाजों के लिए बीमा और शिपिंग लागत में भी कमी आएगी, जिससे अंततः भारत का आयात बिल कम होगा और चालू खाता घाटा (CAD) संभालने में मदद मिलेगी।

इन सेक्टर्स को होगा सीधा फायदा

तेल की कीमतों में गिरावट और स्थिरता का सबसे सकारात्मक असर एयरलाइंस, लॉजिस्टिक्स, केमिकल, पेंट और ट्रांसपोर्ट सेक्टर पर पड़ेगा और इन उद्योगों की परिचालन लागत सीधे तौर पर ईंधन और पेट्रोकेमिकल उत्पादों से जुड़ी होती है। लागत कम होने से इन कंपनियों के मुनाफे में सुधार होगा और आम उपभोक्ताओं को भी महंगाई से राहत मिल सकेगी। इसके अलावा, तेल की कीमतें नियंत्रित रहने से भारतीय रुपये की स्थिरता को भी वैश्विक बाजार में मजबूती मिलेगी।