नीट पेपर लीक मामले पर सुनवाई के दौरान सुप्रीम कोर्ट ने बेहद सख्त रुख अपनाते हुए कहा कि पेपर लीक कैसे हुआ, इसकी जवाबदेही तय होनी चाहिए और कोर्ट ने इस मामले की गंभीरता को रेखांकित करते हुए कहा कि जब तक जिम्मेदारी तय नहीं की जाएगी, तब तक सच्चाई सामने नहीं आएगी। सुनवाई के दौरान कोर्ट ने विशेषज्ञ समिति के अध्यक्ष से सीधे सवाल किए और पूछा कि कार्यान्वयन की निगरानी में कहां चूक हुई। कोर्ट ने टिप्पणी की कि यदि सभी सिफारिशों को लागू किया गया था, तो फिर यह घटना कैसे घटी? आखिर इस विफलता के पीछे की असलियत क्या है, यह स्पष्ट होना चाहिए।
निगरानी और कार्यान्वयन पर कोर्ट के तीखे सवाल
सुप्रीम कोर्ट ने समिति के अध्यक्ष डॉ. राधाकृष्णन से पूछा कि आप मूल रूप से विशेषज्ञ समिति के सदस्य थे, ऐसे में कार्यान्वयन की निगरानी कितनी हुई? कोर्ट ने कहा कि एचपीसी की सिफारिशों के आधार पर आपकी निगरानी के बावजूद यदि यह घटना घटी है, तो या तो सिफारिशों में ही कोई समस्या है या फिर निगरानी सही तरीके से नहीं की गई। सुप्रीम कोर्ट ने सॉलिसिटर जनरल (एसजी) तुषार मेहता से कहा कि यह बहुत ही संवेदनशील मामला है और युवाओं के भविष्य से जुड़ा है। कोर्ट ने जोर देकर कहा कि हकीकत सामने आनी चाहिए कि आखिर यह सब कैसे हुआ।
समिति की सिफारिशें और डॉ. राधाकृष्णन का पक्ष
सुनवाई के दौरान डॉ. राधाकृष्णन ने सुप्रीम कोर्ट को बताया कि समिति ने कुल 60 सुझाव दिए थे। उन्होंने जानकारी दी कि इन 60 में से अधिकतर सुझावों को लागू किया जा चुका है, जबकि कुछ अभी भी प्रक्रियाधीन हैं। उन्होंने यह भी कहा कि 2025 में नीट यूजी परीक्षा संतोषजनक ढंग से आयोजित की गई थी। हालांकि, कुछ केंद्रों में बिजली गुल होने जैसी छिटपुट घटनाएं हुईं, लेकिन इसके अलावा सिफारिशों को लागू किया गया और परीक्षा सफल रही और उन्होंने बताया कि समिति ने नेशनल टेस्टिंग एजेंसी (एनटीए) को और अधिक मजबूत करने की सिफारिश की थी।
री-नीट परीक्षा और जवाबदेही का मुद्दा
डॉ. राधाकृष्णन ने कोर्ट को आश्वासन दिया कि सवालिया कागजों में हेराफेरी को रोकने के लिए कई उपाय लागू किए जा चुके हैं और उन्होंने कहा कि अगले महीने होने वाली री-नीट परीक्षा के लिए इन सभी पहलुओं का पूरा ध्यान रखा गया है। इस पर जस्टिस नरसिम्हा ने सवाल किया कि क्या समिति नियमित रूप से बैठकें करती है, जिसका जवाब डॉ. राधाकृष्णन ने सकारात्मक दिया। हालांकि, जस्टिस नरसिम्हा ने स्पष्ट किया कि असली समस्या तब तक हल नहीं होगी जब तक वास्तविक जवाबदेही तय नहीं हो जाती। उन्होंने कहा कि जब तक जिम्मेदारी तय नहीं होगी, तब तक सही जानकारी और सुधार संभव नहीं है।
यूपीएससी से तुलना और संस्थागत क्षमता पर जोर
जस्टिस नरसिम्हा ने सुनवाई के दौरान संघ लोक सेवा आयोग (यूपीएससी) का उदाहरण देते हुए कहा कि वहां कभी भी इस तरह की समस्या नहीं रही है, और इस बात को समझना होगा। एसजी मेहता ने कहा कि सरकार युवाओं से जुड़े इन मामलों को लेकर बेहद गंभीर है और रेलवे परीक्षाओं की तरह यहां भी व्यवस्था को मजबूत किया जा रहा है। सुप्रीम कोर्ट ने एक महत्वपूर्ण टिप्पणी करते हुए कहा कि हमारी अधिकांश संस्थाओं की समस्या तदर्थवाद (एड-हॉकइज्म) है, जहां ज्ञान का सही प्रसार नहीं होता। कोर्ट ने कहा कि क्षमता किसी व्यक्ति विशेष में नहीं, बल्कि संस्था में होनी चाहिए। एसजी ने बताया कि 21 तारीख को होने वाली परीक्षा के लिए नई व्यवस्थाएं बनाई गई हैं, जिनकी निगरानी उच्चतम स्तर पर की जा रही है।
